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छात्रों को मोबाइल की लत से बचाएगी कर्नाटक सरकार की नई 'डिजिटल पॉलिसी', 1 घंटा स्क्रीन टाइम और शाम 7 बजे के बाद इंटरनेट बंद

Karnataka Government New Digital Policy: बढ़ते इंटरनेट और मोबाइल फोन के इस दौर में कर्नाटक सरकार ने छात्रों के लिए एक बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने मोबाइल फोन के दुष्प्रभावों से बच्चों को सुरक्षित करने की दिशा में मोबाइल फोन के सीमित उपयोग के साथ रात में इंटरनेट बंद करने की सलाह दी है। इस संबंध में माता-पिता और स्कूल को महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में भी जिक्र किया है।

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छात्रों को मोबाइल की लत से बचाएगी कर्नाटक सरकार की नई 'डिजिटल पॉलिसी'

Karnataka Government New Digital Policy: इंटरनेट और डिजिटल के इस दौर में मोबाइल फोन बड़ों से लेकर बच्चों तक के जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बन गया है। भले ही मोबाइल फोन के कई लाभ हैं, लेकिन यह कहना गलत नहीं है कि यह इसके दुष्प्रभाव भी बहुत है। अत्यधिक मोबाइल फोन के इस्तेमाल से बच्चों में नींद की कमी देखी जा रही है। मानसिक तनाव भी एक बड़ी समस्या बन गई है। बच्चों पर पड़ रहे मोबाइल फोन के दुष्प्रभावों को देखते हुए कर्नाटक सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने कक्षा 9 से 12 तक के छात्रों के लिए 'जिम्मेदार डिजिटल उपयोग' को बढ़ावा दिया है। इसके संबंध में एक ड्राफ्ट पॉलिसी जारी की गई है।

क्या है इस पॉलिसी का मुख्य उद्देश्य

कर्नाटक सरकार की इस नीति का मुख्य उद्देश्य छात्रों को मोबाइल की लत, मानसिक तनाव और नींद की कमी जैसी समस्याओं से बचाना है। यह पहल न केवल छात्रों के स्वास्थ्य के लिए है, बल्कि उन्हें एक संतुलित जीवन जीने के लिए प्रेरित करने का प्रयास भी है।

मनोरंजन के सीमित होगा समय

इस पॉलिसी की सबसे महत्वपूर्ण सिफारिश यह है कि छात्रों का मनोरंजन के लिए स्क्रीन टाइम को सीमित कर दिया गया है। पॉलिसी के अनुसार, रोजाना केवल 1 घंटे तक ही छात्र मोबाइल फोन का इस्तेमाल मनोरंजन के लिए कर सकेंगे। इसके अलावा, नींद की क्वालिटी में सुधार के लिए सोने से 1 घंटे पहले स्क्रीन से दूर रहने की सलाह दी गई है। इसमें सबसे कड़ा सुझाव मोबाइल फोन के लिए 'चाइल्ड प्लान' का है, जिसमें रात 7 बजे के बाद इंटरनेट डेटा बंद करने और केवल ऑडियो कॉल की सुविधा देने की बात कही गई है। कर्नाटक सरकार का मानना है कि इससे किशोरों में इंटरनेट की लत के लक्षणों को कम किया जा सकेगा।

स्कूलों में होगा 'डिजिटल वेल-बीइंग' और 'नो टेक्नोलॉजी डे' मनाने की सलाह

घर के साथ स्कूलों के लिए भी इस नीति में बड़े बदलावों का सुझाव दिया गया है। अब छात्रों से संपर्क के लिए व्हाट्सएप के बजाय पारंपरिक डायरी सिस्टम को प्राथमिकता दी जाएगी। स्कूल के पाठ्यक्रम में 'डिजिटल वेल-बीइंग' और ऑनलाइन सुरक्षा को शामिल किया जाएगा। इससे बच्चे साइबर बुलिंग और प्राइवेसी के खतरों को समझ सकें और इससे बच पाएंगे। साथ ही, स्कूलों में 'डिजिटल डिटॉक्स डे' या 'नो टेक्नोलॉजी डे' जैसे कार्यक्रमों का आयोजित समय-समय पर किया जाएगा। इसके साथ ही टाइम टेबल में 'टेक-फ्री पीरियड' रखने की सिफारिश भी की गई है। हर स्कूल में एक डिजिटल सेफ्टी और वेलनेस कमेटी बनाई जाएगी जो बच्चों की निगरानी करेगी।

AI का नियंत्रित उपयोग

यह नीति केवल स्कूलों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें अभिभावकों की भूमिका को भी महत्वपूर्ण माना गया है। माता-पिता को घर में 'नो फोन जोन' बनाने और खुद अनुशासन का उदाहरण पेश करने की सलाह दी गई है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के उपयोग पर भी गाइडलाइन बनाने के लिए भी प्रस्ताव रखा गया है, ताकि होमवर्क के लिए AI गलत इस्तेमाल न किया जा सके और नकल को रोका जा सके। सरकार इस पूरी मुहिम को एक 'सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट' की तरह देख रही है, जिससे निपटने के लिए स्कूल, अभिभावक और सरकार का साझा प्रयास अनिवार्य है।

Varsha Kushwaha
वर्षा कुशवाहाauthor

वर्षा कुशवाहा टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की एजुकेशन डेस्क पर बतौर कॉपी एडिटर कार्यरत हैं और पिछले 5 वर्षों से मीडिया में सक्रिय हैं। जर्नलिज़्म में पोस्ट ग्रेजुएशन डिप्लोमा पूरा करने के बाद उन्होंने न्यूज रूम में तेजी, सटीकता और गहराई के साथ काम करते हुए अपनी मजबूत संपादकीय पहचान बनाई है। वर्षा की विशेषज्ञता हाइपर-लोकल खबरों, इवेंट कवरेज और स्टेट पॉलिटिक्स से जुड़ी रिपोर्टिंग में भी है। अब तक वर्षा कुशवाहा 8,000 से अधिक खबरें लिख चुकी हैं, जिनमें कई अहम लोकल रिपोर्ट्स, एजुकेशन और करियर की खबरें तथा फीचर-आधारित स्टोरीज शामिल हैं।

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