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GK: न सोना, न चांदी... 19वीं शताब्दी में ईंटों से होता था लेन-देन, जानें किस चीज से बनी थीं ये खास ईंटें

GK: आज हम नोट्स का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन 19 शताब्दी में नोट्स नहीं हुआ करते थे। मुद्रा या करेंसी इतिहास में कई बार बदली है। हैरान करने वाली बात यह है कि 19वीं शताब्दी मे सोना-चांदी नहीं ईटों से लेन-देन होता था। आइए उनके बारे में जानते हैं।

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19वीं शताब्दी में ईंटों से होता था लेन-देन (Photo - AI)

GK: इतिहास के पन्नों को पलटें और पीछे जाएं तो हमे पता लगता है कि मुद्रा या करेंसी का रूप समय-समय पर बदलता रहा है। आज हम कागजी नोटों, सिक्कों और डिजिटल पेमेंट का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन अगर हम अभी आपसे पूछे कि 19वीं शताब्दी में लेनदेन के लिए किसका इस्तेमाल किया जाता था, तो झट से उत्तर आएगा कि सोना-चांदी। लेकिन नहीं, एक दौर ऐसा था जब लेन-देन के लिए सोने और चांदी के बजाय एक अनोखी चीजों का इस्तेमाल किया जाता था।

19वीं शताब्दी में एशिया और यूरोप के कुछ हिस्सों में व्यापार के लिए किसी धातु या पत्थर के बजाय ईंटों को मुद्रा माना गया था। जी हां, आपने सही पढ़ाई। उस दौरान में ईंटों को लेन-देन के लिए अधिक इस्तेमाल किया जाता था। बता दें कि लेन-देन के लिए इस्तेमाल होने वाली ईंटें लाल मिट्टी या गारे से बनी इमारत बनाने वाली ईंटें नहीं होती थी। यह खास तरह की होती थी। यूपीएससी परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्र हो या किसी अन्य प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करने वाले उम्मीदवार हो, तो जनरल नॉलेज का यह सवाल उनके लिए बहुत जरूरी है। आइए आपको इसके बारे में विस्तार से बताएं।

19वीं शताब्दी में लेनदेन के लिए होता था ईंटों का इस्तेमाल

19वीं शताब्दी में सोने-चांदी की बजाए एक खास किस्म की ईंटों का इस्तेमाल लेन-देन के लिए किया जाता था। आपकी क्यूरोसिटी खत्म करने के लिए बता दें कि उस दौरान जिन ईंटों का इस्तेमाल किया जाता था, वह चाय की ईंटें होती थी। जी हां, उस दौरान चाय की ईंटों का इस्तेमाल व्यापार और लेन-देन के लिए किया जाता था।

चाय की ईंटें क्या थी?

19वीं शताब्दी और उससे भी पहले चीन, तिब्बत, मंगोलिया, साइबेरिया और मध्य एशिया के व्यापारिक मार्गों पर 'टी ब्रिक्स' (Tea Bricks) यानी चाय की ईंटों का उपयोग मुद्रा (Currency) के रूप में किया जाता था। यह ब्रिक्स चाय की पत्तियों को दबाकर बनाई गई ईंटें थी। इन्हें चाय की पत्तियों, डंठलों और कभी-कभी चावल के पानी या गोबर के घोल को मिलाकर एक सांचे में अत्यधिक दबाव के साथ कसकर दबाकर बनाया जाता था। सूखने के बाद ये लकड़ी या पत्थर जैसी सख्त ईंट का रूप ले लेती थीं। इन ईंटों पर अक्सर चीनी अक्षरों या विभिन्न प्रकार की मोहरों के डिजाइन उकेरे जाते थे, जिससे उनकी प्रामाणिकता और मूल्य तय होता था।

मुद्रा के रूप में चाय की ईंटों के उपयोग के मुख्य नियम

व्यापारिक लेन-देन में इन ईंटों के इस्तेमाल के लिए कुछ नियम और मानक भी तय किए गए थे। जो इस प्रकार है-

- गुणवत्ता और वजन के आधार पर मूल्य निर्धारण

- चाय की ईंट का मूल्य उसकी गुणवत्ता पर निर्भर करता था

- काली चाय (Black Tea) से बनी ईंटें सबसे अधिक मूल्यवान मानी जाती थीं क्योंकि वे लंबे समय तक खराब नहीं होती थीं।

- खराब या डंठल वाली चाय से बनी ईंटों का मूल्य कम होता था।

ईंट तोड़कर छोटा लेन-देन

बता दें कि उस दौरान यदि किसी वस्तु की कीमत पूरी ईंट से कम होती थी, तो ईंट को टुकड़ों में तोड़ दिया जाता था और उसके आधार पर भुगतान किया जाता था। ईंटों पर पहले से ही कट के निशान या लाइनें बनी होती थीं, ताकि उन्हें आसानी से निश्चित टुकड़ों में तोड़ा जा सके, ठीक वैसे ही जैसे आज हम छुट्टा पैसा या सिक्के इस्तेमाल करते हैं।

दोहरा लाभ - मुद्रा भी और पेय पदार्थ भी

इन ईंटों का सबसे बड़ा नियम और लाभ यह था कि यह केवल कागजी या धातु का टुकड़ा नहीं थीं। यदि किसी व्यापारी या यात्री को सफर के दौरान खाने-पीने की समस्या होती या कोई बीमारी होती, तो वह ईंट का एक टुकड़ा तोड़कर उसे पानी में उबालकर चाय के रूप में पी सकता था। इसमें औषधीय गुण भी मौजूद होते थे।

टैक्स और व्यापारिक भुगतानों में स्वीकार्यता

मंगोलिया और साइबेरिया जैसे अत्यंत ठंडे इलाकों में सोने-चांदी से ज्यादा चाय की उपयोगिता थी। यही वजह थी कि वहां की सरकारों और स्थानीय शासकों द्वारा कर (Tax) वसूली और सैनिकों के वेतन भुगतान तक के लिए चाय की ईंटों को आधिकारिक रूप से स्वीकार किया जाता था।

ईंट मुद्रा की लोकप्रियता और इसके लाभ

आसान परिवहन: सोने या चांदी की तुलना में इन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाना आसान था। इन्हें घोड़े, ऊंटों और नावों पर लादकर दूर-दराज के इलाकों में आसानी से भेजा जाता था।

लंबी शेल्फ लाइफ: अत्यधिक दबाव से बनी होने के कारण ये ईंटें सालों तक खराब नहीं होती थीं और नमी से बची रहती थीं।

ठंडे इलाकों में अत्यधिक मांग: साइबेरिया और मंगोलिया के भीषण ठंडे मौसम में चाय न केवल शरीर को गर्मी देती थी, बल्कि विटामिन की कमी से होने वाली बीमारियों से भी बचाती थी।

कैसे समाप्त हुई चाय की ईंटों की यह करेंसी?

19वीं शताब्दी के अंत और 20वीं शताब्दी की शुरुआत तक आते-आते परिवहन सुविधाओं के विकास, आधुनिक बैंकिंग प्रणाली और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कागजी नोटों तथा सिक्कों के प्रचलन से चाय की ईंटों का मुद्रा के रूप में इस्तेमाल धीरे-धीरे कम हुआ और फिर समाप्त हो गया। आज के समय में चाय की ये पुरानी ईंटें केवल एंटीक (Antique) वस्तुओं के रूप में संग्रहालयों या प्राचीन वस्तुओं के कलेक्टर के पास ही देखने को मिलती हैं, जो हमें इतिहास के इस अनोखे और व्यावहारिक लेन-देन के दौर की याद दिलाती हैं।

Varsha Kushwaha
वर्षा कुशवाहाauthor

वर्षा कुशवाहा टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की एजुकेशन डेस्क पर बतौर कॉपी एडिटर कार्यरत हैं और पिछले 5 वर्षों से मीडिया में सक्रिय हैं। जर्नलिज़्म में पोस्ट ग्रेजुएशन डिप्लोमा पूरा करने के बाद उन्होंने न्यूज रूम में तेजी, सटीकता और गहराई के साथ काम करते हुए अपनी मजबूत संपादकीय पहचान बनाई है। वर्षा की विशेषज्ञता हाइपर-लोकल खबरों, इवेंट कवरेज और स्टेट पॉलिटिक्स से जुड़ी रिपोर्टिंग में भी है। अब तक वर्षा कुशवाहा 8,000 से अधिक खबरें लिख चुकी हैं, जिनमें कई अहम लोकल रिपोर्ट्स, एजुकेशन और करियर की खबरें तथा फीचर-आधारित स्टोरीज शामिल हैं।

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