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अरावली पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, छह महीने की मोहलत देने से इनकार; 30 नवंबर तक रिपोर्ट देने का आदेश

अरावली को लेकर विवाद की जड़ सुप्रीम कोर्ट के 20 नवंबर 2025 के फैसले में है। तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने खनन गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए विशेषज्ञ समिति की ओर से सुझाए गए ऊंचाई आधारित मानदंड को मंजूरी दी थी।

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सुप्रीम कोर्ट

Photo : टाइम्स नाउ डिजिटल

अरावली पहाड़ियों की परिभाषा और उनके संरक्षण को लेकर चल रही सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को हाई-पावर्ड कमेटी (एचपीसी) को बड़ा झटका दिया। अदालत ने समिति की अंतिम रिपोर्ट दाखिल करने के लिए छह महीने की अतिरिक्त मोहलत देने से इनकार कर दिया और 30 नवंबर तक रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने समिति को स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि उसे तेजी से काम करना होगा। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे।

मुख्य न्यायाधीश ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर समिति दो महीने में रिपोर्ट तैयार नहीं कर पाती है तो अदालत पूरी समिति का पुनर्गठन कर सकती है। उन्होंने कहा, “पैनल दिन-रात काम करे। अगर वह दो महीने में रिपोर्ट नहीं दे पाता है तो हम पूरी समिति का पुनर्गठन कर देंगे।” अदालत ने समिति को यह भी निर्देश दिया कि वह मामले से जुड़े अलग-अलग मुद्दों पर अंतरिम रिपोर्ट दाखिल कर सकती है, ताकि जरूरी सवालों पर अदालत अलग-अलग फैसला ले सके।

'रिटायरमेंट का इंतजार कर रहे हैं?'

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने समिति की ओर से मांगी गई छह महीने की मोहलत पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि समिति ने पहली कलम चलाते ही समय बढ़ाने की मांग कर दी और ऐसा लग रहा है कि वह उनके सेवानिवृत्त होने का इंतजार कर रही है। समिति ने अपनी याचिका में कहा था कि अरावली पर्वतमाला का व्यापक और वैज्ञानिक आकलन करने के लिए उसे अतिरिक्त समय की जरूरत है। उसका कहना था कि अंतिम रिपोर्ट को व्यापक और बचाव योग्य बनाने के लिए कई स्तरों पर अध्ययन पूरा करना जरूरी है। समिति ने 31 अगस्त को दाखिल अनुपालन रिपोर्ट में अंतिम रिपोर्ट की समयसीमा बढ़ाकर 28 फरवरी 2027 करने का अनुरोध किया था।

आदिवासी समुदायों समेत सभी पक्षों को सुनने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान समिति को अरावली से जुड़े सभी हितधारकों को सुनने का निर्देश दिया। इनमें राजस्थान और गुजरात के आदिवासी समुदाय भी शामिल हैं। अदालत ने कहा कि समिति अलग-अलग विषयों पर अंतरिम रिपोर्ट दाखिल कर सकती है, ताकि जिन मुद्दों पर तत्काल निर्णय जरूरी है, उन्हें बाकी विषयों से अलग करके निपटाया जा सके। मामले की अगली सुनवाई 2 दिसंबर को होगी।

आखिर क्यों अहम है अरावली की परिभाषा?

बता दें कि अरावली को लेकर विवाद की जड़ सुप्रीम कोर्ट के 20 नवंबर 2025 के फैसले में है। तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने खनन गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए विशेषज्ञ समिति की ओर से सुझाए गए ऊंचाई आधारित मानदंड को मंजूरी दी थी।

इस मानदंड के मुताबिक, अरावली जिले में आसपास की स्थानीय भूमि से कम से कम 100 मीटर ऊंची भू-आकृति को अरावली पहाड़ी माना जाना था। वहीं, 500 मीटर के दायरे में आने वाली दो या उससे अधिक ऐसी पहाड़ियों को अरावली रेंज का हिस्सा माना गया था।

90 फीसदी से ज्यादा क्षेत्र के संरक्षण से बाहर होने की आशंका

यही परिभाषा बाद में विवाद का केंद्र बन गई। पर्यावरणविदों और दूसरे हितधारकों ने तर्क दिया कि केवल ऊंचाई के आधार पर अरावली की पहचान करने से पर्वतमाला का बड़ा हिस्सा कानूनी संरक्षण से बाहर हो सकता है। आशंका जताई गई कि अरावली का 90 फीसदी से ज्यादा क्षेत्र प्रभावी तौर पर सुरक्षा दायरे से बाहर हो सकता है और वहां खनन का खतरा बढ़ सकता है।

विवाद बढ़ने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर दोबारा विचार किया। 29 दिसंबर 2025 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने 20 नवंबर के फैसले पर रोक लगा दी और पूर्व विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के क्रियान्वयन को भी स्थगित कर दिया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे विवाद की नए सिरे से जांच के लिए एक नई विशेषज्ञ समिति गठित की, जिसे अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला की पहचान तथा परिभाषा तय करने के लिए उचित वैज्ञानिक तरीका सुझाने की जिम्मेदारी दी गई।

Shiv Shukla
शिव शुक्लाauthor

शिव शुक्ला टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में कार्यरत एक अनुभवी न्यूज राइटर हैं। छह वर्षों के पेशेवर अनुभव के साथ वे डिजिटल पत्रकारिता में तेज, सटीक और प्रभावी कंटेंट तैयार करने के लिए पहचाने जाते हैं। वह राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खबरों, राजनीतिक घटनाक्रमों और गहन विश्लेषण पर विशेष पकड़ रखते हैं। ब्रेकिंग न्यूज कवरेज, लाइव ब्लॉग, एक्सप्लेनर और एनालिसिस आर्टिकल तैयार करने में उन्हें विशेषज्ञता हासिल है। शिव शुक्ला 8,000 से अधिक न्यूज रिपोर्ट प्रकाशित कर चुके हैं। मजबूत न्यूज सेंस, विश्लेषण क्षमता और स्पष्ट लेखन शैली उनकी खासियत है। उन्हें नए स्थानों की यात्रा करना और किताबें पढ़ने का शौक है, जो उनकी लेखन शैली एवं दृष्टिकोण को और समृद्ध बनाता है।

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