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Explained: भारत का वो महान योद्धा, जिसने अमेरिका में गाड़ दिया था सनातन संस्कृति का ध्वज

Swami Vivekananda Birth Anniversary: इस बार भारतवर्ष स्वामी विवेकानंद की 163वीं जन्म जयंती मनाने जा रहा है। वह ना केवल एक महान सन्यासी या आध्यात्मिक गुरु थे, बल्कि एक ऐसे बहुआयामी व्यक्तित्व थे जिनकी विचारधारा ने भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व को नई दिशा दी।

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Swami Vivekananda Birth Anniversary 2026: इस बार स्वामी विवेकानंद जी की 163वीं जन्म जयंती

Swami Vivekananda Birth Anniversary: तीस बरस का ज्योति पुंज था, ज्ञान पुष्प का सुरभि कुंज था, मस्तक पर अरुणिम वो रेखा, चकित रह गया जिसने देखा...धर्म, दर्शन, इतिहास, कला, सामाजिक विज्ञान और साहित्य के ज्ञाता स्वामी विवेकानंद जी से तो आप सभी परिचित होंगे। स्वामी जी का नाम आते ही मन में एक ऐसे तेजस्वी युवा सन्यासी की छवि उतरती है, जिन्हें ज्ञान का भंडार कहा जाता था। वह ना केवल एक महान सन्यासी या आध्यात्मिक गुरु थे, बल्कि एक ऐसे बहुआयामी व्यक्तित्व थे जिनकी विचारधारा ने भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व को नई दिशा दी। उनका जीवन ज्ञान, आत्मविश्वास और राष्ट्रप्रेम का अद्भुत संगम था। ज्ञान परंपरा के शिखर पुरुष विवेकानंद ने पश्चिमी देशों के बड़े-बड़े विद्वानों को बौना साबित कर भारत को विश्वगुरु के रूप में पुनर्स्थापित किया और देश को एक नई पहचान दिलाई। उनकी सोच व दर्शन विश्व बंधुत्व की भावना से भरा हुआ था।

स्वामी विवेकानंद का पूरा नाम

स्वामी विवेकानंद का पूरा नाम नरेंद्र नाथ दत्त था। उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ। उनके पिता विश्वनाथ दत्त एक प्रतिष्ठित वकील थे और माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक प्रवृत्ति की थी। बचपन से ही स्वामी जी तीव्र बुद्धि, साहसी स्वभाव और सत्य को जानने की प्रबल जिज्ञासा रखते थे। कहा जाता है कि युवावस्था में नरेंद्रनाथ के मन में ईश्वर और जीवन के सत्य को लेकर अनेक प्रश्न उठते रहे। सत्य की खोज उन्हें श्रीरामकृष्ण परमहंस के पास ले गई। प्रारंभ में वे उनके विचारों से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे किंतु धीरे धीरे गुरु के सान्निध्य में उन्हें आध्यात्मिक अनुभव हुआ। गुरू के निधन के बाद नरेंद्रनाथ ने संन्यास ग्रहण किया और स्वामी विवेकानंद नाम धारण किया।

Swami Vivekananda

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सन्यास के बाद पूरे भारत का किया भ्रमण

बता दें सन्यास के बाद स्वामी विवेकानंद ने पैदल ही पूरे भारत का भ्रमण किया। इस यात्रा ने उनके विचारों को गहराई दी। उन्होंने गांव-गांव जाकर आम जनता का जीवन देखा। उन्हें देश की गरीबी, अशिक्षा, जातिवाद और सामाजिक विषमता ने भीतर तक झकझोर दिया।

इन पांच शब्दों ने गाड़ दिया था सनातन संस्कृति का ध्वज

स्वामी विवेकानंद जी की जब बात होती है तो अमेरिका के शिकागो के धर्म संसद में साल 1893 दिए गए भाषण की चर्चा जरूर होती है। इस भाषण में स्वामी जी के पांच शब्दों ने पांच हजार वर्षों तक सनातन संस्कृति का ध्वज गाड़ दिया। यह पांच शब्द पूरी दुनिया में विश्व बंधुत्व का संदेश बनकर गूंज उठे। यहां हम आपके लिए इन 5 शब्दों के साथ स्वामी विवेकानंद का अमेरिका में दिया गया भाषण लेकर आए हैं।

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शिकागो में दिया गया शानदार भाषण

सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका, अमेरिका की बहनों और भाइयों,

मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों आपके इस स्नेहपूर्ण और जोरदार स्वागत से मेरा हृदय अपार हर्ष से भर गया है। मैं आपको दुनिया की सबसे प्राचीन संत परंपरा की तरफ से धन्यवाद देता हूं। मैं दुनिया की सबसे पुरानी संत परंपरा और सभी धर्मों की जननी की तरफ से धन्यवाद देता हूं। सभी जातियों और संप्रदायों के लाखों करोड़ों हिंदुओं की तरफ से आपका आभार व्यक्त करता हूं। मैं इस मंच पर बोलने वाले कुछ वक्ताओं का भी धन्यवाद करना चाहता हूं जिन्होंने यह जाहिर किया कि दुनिया में सहिष्णुता का विचार पूरब के देशों से फैला है। मुझे गर्व है कि मैं उस धर्म से हूं जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ सार्वभौमिक सहिष्णुता पर ही विश्वास नहीं करते बल्कि हम सभी धर्मों को सच के रूप में स्वीकार करते हैं।

मुझे गर्व है कि मैं उस देश से हूं जिसने सभी धर्मों और सभी देशों के सताए गए लोगों को अपने यहां शरण दी। मुझे गर्व है कि हमने अपने दिल में इसराइल की वो पवित्र यादें संजो रखी हैं जिनमें उनके धर्मस्थलों को रोमन हमलावरों ने तहस नहस कर दिया था और फिर उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं जिसने पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और लगातार अब भी उनकी मदद कर रहा है। मैं इस मौके पर वो श्लोक सुनाना चाहता हूं जो मैंने बचपन से याद किया, जिसे रोज करोड़ो लोग दोहराते हैं। जिस तरह अलग अलग जगहों से निकली नदियां अलग अलग रास्तों से होकर आखिरकार समुद्र में मिल जाती हैं, ठीक उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा से अलग अलग रास्ते चुनता है। ये रास्ते देखने में भले ही अलग अलग लगते हैं, लेकिन ये सब ईश्वर तक ही जाते हैं।

मौजूदा सम्मेलन जो कि आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से है, वह अपने आप में गीता में कहे गए इस उपदेश का प्रमाण है। जो भी मुझ तक आता है, चाहे कैसा भी हो मैं उस तक पहुंचाता हूं। लोग अलग अलग रास्ते चुनते हैं, अलग अलग परेशानियां झेलते हैं, लेकिन आखिर में मुझ तक पहुंचते हैं।

रुचिनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव। यह श्लोक बोलते हुए स्वामी जी ने समझाने की कोशिश की सांप्रदायिकताएं, कट्टरताएं और इसके भयानक वंशज हठधमिर्ता लंबे समय से पृथ्वी को अपने शिकंजों में जकड़े हुए हैं। उन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है। कितनी बार ही यह धरती खून से लाल हुई है। कितनी ही सभ्यताओं का तबाह हुई हैं और न जाने कितने देश मिट गए हैं।

अगर ये भयानक राक्षस नहीं होते तो आज मानव समाज कहीं ज्यादा उन्नत होता, लेकिन अब उनका समय पूरा हो चुका है। मुझे पूरी उम्मीद है कि आज इस सम्मेलन का शंखनाद सभी हठधर्मिताओं, हर तरह के क्लेश, चाहे वे तलवार से हों या कलम से और सभी मनुष्यों के बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करेगा।

Aditya Singh
आदित्य सिंहauthor

आदित्य सिंह टाइम्स नाउ नवभारत की डिजिटल टीम में एजुकेशन सेक्शन पर लिखते हैं। मीडिया में 5 साल का अनुभव रखने वाले आदित्य सिंह स्कूली शिक्षा से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं, जॉब वैकेंसी, करियर ऑप्शन्स, बोर्ड रिजल्ट, एग्जाम टिप्स और करंट अफेयर्स—इन सभी पर उनकी पकड़ मजबूत है। तेजी से खबर ब्रेक करना और युवाओं को उपयोगी और प्रेरक जानकारी देना उनकी प्रमुख विशेषताओं में शामिल है। पांच साल से आदित्य सिंह लगातार एजुकेशन सेक्शन के लिए खबरें लिख रहे हैं और छह हजार से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। एक एजुकेशन राइटर के रूप में उनका फोकस हमेशा यही रहता है कि छात्रों और युवाओं तक सटीक, समय पर और उपयोगी जानकारी सबसे पहले पहुंचे।

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