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12 August History: इलाहाबाद की संधि क्या है? भारत में ब्रिटिश शासन की शुरुआत से क्या है इसका ताल्लुक

भारतीय इतिहास व्यापक है, इसमें कुछ ऐसी घटनाएं हुईं, जिन्होंने आने वाले कई दशकों की राजनीति और सत्ता का रास्ता तय कर दिया। इन्हीं में एक थी इलाहाबाद की संधि। जानें इसका भारत में ब्रिटिश शासन की नींव पड़ने से क्या है संबंध

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इलाहाबाद की संधि क्या है? (Image - ChatGPT)

भारत के इतिहास में कुछ ऐसी घटनाएं हुईं, जिन्होंने आने वाले कई दशकों की राजनीति और सत्ता का रास्ता तय कर दिया। इन्हीं में एक थी "इलाहाबाद की संधि"। यह कोई आम समझौता नहीं था, इसका सीधा संबंध भारत में ब्रिटिश शासन की नींव पड़ने से है। दरसअल, ईस्ट इंडिया कंपनी की भूमिका एक व्यापारिक संस्था से आगे बढ़कर एक बड़ी राजनीतिक और राजस्व शक्ति के रूप में बदलने लगी। खासतौर पर बंगाल, बिहार और उड़ीसा से राजस्व वसूलने का अधिकार मिलने के बाद कंपनी के पास अपनी सेना और प्रशासन को मजबूत करने के लिए बड़ा आर्थिक आधार आ गया। आइए विस्तार से समझते हैं इस संधि को, जानेंगे यूपीएससी या दूसरी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए यह जरूरी क्यों है?

इलाहाबाद की संधि क्या है?

इलाहाबाद की संधि 1765 में हुई एक ऐतिहासिक राजनीतिक संधि थी, जिसका संबंध मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय, अवध के नवाब शुजा-उद-दौला और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच बने नए सत्ता समीकरण से था। इतिहास में इसे अक्सर एक ही नाम से जाना जाता है, लेकिन 1765 में इलाहाबाद में दो समझौते हुए थे। एक समझौता मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय और कंपनी के बीच हुआ, जबकि दूसरा अवध के नवाब शुजा-उद-दौला के साथ हुआ।

इलाहाबाद की संधि

इलाहाबाद की संधि

इलाहाबाद की संधि कब हुई थी?

इलाहाबाद की संधि को लेकर कई स्रोतों में तारीख को लेकर अंतर दिखाई दे सकता है। शाह आलम द्वितीय और रॉबर्ट क्लाइव के बीच हुए समझौते की तारीख 12 अगस्त 1765 भी दर्ज मिलती है, जबकि 16 अगस्त 1765 को हुए समझौते को भी व्यापक रूप से Treaty of Allahabad के नाम से जाना जाता है। इसका कारण यह है कि 1765 में इलाहाबाद में कंपनी और उसके प्रतिद्वंद्वी पक्षों के बीच एक से अधिक समझौते हुए थे।

इसलिए परीक्षा की तैयारी के लिहाज से इसे सामान्य तौर पर 1765 की इलाहाबाद की संधि के रूप में याद करना उपयोगी है। इसका सीधा संबंध 1764 के बक्सर युद्ध के बाद बने राजनीतिक हालात से था। इस युद्ध में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय, अवध के नवाब शुजा-उद-दौला और बंगाल के पूर्व नवाब मीर कासिम की संयुक्त सेना को हरा दिया था। इस जीत ने कंपनी की राजनीतिक स्थिति को काफी मजबूत कर दिया।

इलाहाबाद की संधि क्यों हुई थी?

इस संधि के प्रमुख पक्ष मुगल सम्राट 'शाह आलम द्वितीय' और 'ईस्ट इंडिया कंपनी' थे। कंपनी की ओर से रॉबर्ट क्लाइव ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वहीं, अवध के नवाब शुजा-उद-दौला के साथ भी अलग समझौता किया गया था। बक्सर के युद्ध में हार के बाद मुगल सम्राट और अवध के नवाब दोनों की स्थिति कमजोर हो चुकी थी। दूसरी तरफ कंपनी के पास सैन्य शक्ति और राजनीतिक दबदबा बढ़ चुका था।

कंपनी का मुख्य उद्देश्य अपने सैन्य और राजनीतिक प्रभाव को मजबूत करना तथा बंगाल क्षेत्र से मिलने वाले राजस्व पर अधिकार हासिल करना था। मुगल सम्राट के लिए यह समझौता अपनी स्थिति और आर्थिक जरूरतों को संभालने का एक रास्ता था। इस समझौते के तहत शाह आलम द्वितीय ने कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी यानी राजस्व वसूली का अधिकार प्रदान किया।

अवध के मामले में भी कंपनी ने अपनी स्थिति मजबूत की। शुजा-उद-दौला को अवध वापस मिला, लेकिन उसे कंपनी के साथ ऐसी व्यवस्था स्वीकार करनी पड़ी जिससे भविष्य में उसकी निर्भरता बढ़ गई। इस तरह कंपनी ने केवल युद्ध जीतने के बजाय समझौतों के जरिए भी अपना प्रभाव बढ़ाया।

इलाहाबाद की संधि

इलाहाबाद की संधि

संधि की सबसे महत्वपूर्ण शर्त क्या थी?

इलाहाबाद की संधि की सबसे महत्वपूर्ण बात थी कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी (राजस्व या कर वसूलने का अधिकार) मिलना। आसान भाषा में समझें तो कंपनी को इन क्षेत्रों से राजस्व वसूलने का अधिकार मिल गया। उस समय राजस्व किसी भी शासक के लिए सबसे बड़ा आर्थिक संसाधन था। इसलिए यह अधिकार मिलना कंपनी के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी।

शाह आलम द्वितीय को कंपनी की ओर से सालाना भुगतान देने की व्यवस्था भी की गई थी। इसके अलावा इलाहाबाद व दूसरे क्षेत्रों को लेकर भी समझौते की शर्तें तय हुईं। दूसरी ओर अवध के नवाब को कंपनी के साथ ऐसी व्यवस्था स्वीकार करनी पड़ी जिसमें जरूरत पड़ने पर कंपनी की सैन्य सहायता लेना और उसके लिए भुगतान करना शामिल था। इससे अवध पर कंपनी का प्रभाव बढ़ने लगा।

इलाहाबाद की संधि और ब्रिटिश शासन की नींव में क्या संबंध है?

इस संधि से पहले कंपनी केवल व्यापार से कमाई करती थी, लेकिन समझौते के बाद उसे बंगाल, बिहार और उड़ीसा से राजस्व वसूलने का अधिकार आधिकारिक रूप से मिल गया, और इस पल को भारत में ब्रिटिश शासन की नींव के तौर पर देखा जाता है। अब कंपनी राजस्व से अपनी सेना का खर्च उठाने लगी थी। नए राजनीतिक अभियान चलाने लगी और दूसरे भारतीय राज्यों के मामलों में अपना प्रभाव बढ़ाने लगी।

यही वजह है कि इलाहाबाद की संधि को भारत में ब्रिटिश सत्ता के विकास की दिशा में एक बड़ा मोड़ माना जाता है। इसके बाद ईस्ट इंडिया कंपनी की भूमिका सिर्फ एक विदेशी व्यापारिक कंपनी की नहीं रही। वह धीरे-धीरे राजस्व वसूलने, प्रशासन चलाने और सैन्य शक्ति के सहारे क्षेत्रों पर प्रभाव जमाने वाली राजनीतिक शक्ति बनती गई।

Neelaksh Singh
नीलाक्ष सिंहauthor

नीलाक्ष सिंह 2021 से टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल से जुड़े हैं और एजुकेशन सेक्शन के लिए कंटेंट लिखते हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने प्रिंट मीडिया में इंटर्नशिप की, जहां फील्ड रिपोर्टिंग, स्टूडेंट-इश्यू बेस्ड ग्राउंड स्टोरीज और सटीक न्यूजराइटिंग की बुनियादी समझ हासिल की। प्रिंट के बाद डिजिटल मीडिया में भी वह एजुकेशन बीट पर ही लगातार काम करते रहे हैं। पत्रकारिता में 10 सालों से सक्रिय नीलाक्ष सिंह 12 हजार से अधिक खबरें लिख चुके हैं। वह एग्जाम अपडेट्स, एडमिशन प्रोसेस, करियर गाइडेंस, स्टूडेंट वेलफेयर, बोर्ड रिजल्ट्स और नीतिगत बदलावों पर गहन और बेहद उपयोगी कंटेंट तैयार करते हैं।

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