जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में पाकिस्तान के इशारे पर हुए आतंकवादी हमले के बाद दोनों देशों के बीच एक बार फिर रिश्ते रसातल में चले गए हैं। दोनों देशों के बीच सिंधु जल संधि से लेकर शिमला समझौता तक रद्द हो चुका है। लेकिन कभी दोनों देश एक ही थे। 1947 में अंग्रेजों की गुलामी से आजादी के साथ पाकिस्तान के रूप में एक नया देश उभरा, जबकि भारत तो पहले से ही मौजूद था। मौजूदा भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश कभी एक ही देश का हिस्सा थे और उस देश का नाम भारत या हिंदुस्तान था। इसी भारत में एक लंबी सड़क थी, जिसे कभी हिंदुस्तान पर राज करने वाले शेर शाह सूरी ने बनवाया था।
करीब 400 साल पहले, जब आज जैसी मौजूदा सड़कें बनाने का किसी के दिमाग में खयाल भी नहीं आया था, तब शेर शाह सूरी ने इस लंबे मार्ग का निर्माण करवाया था। मध्यकालीन भारत के दूरदर्शी राजा ने उस समय दक्षिण एशिया के सबसे महत्वकांक्षी परियोजना की नींव रखी। शेर शाह सूरी ने 1540 से 1545 तक राज किया। उस समय शेर शाह सूरी ने पश्चिम में काबुल (आज अफगानिस्तान में) से पूर्व में बंगाल तक इस मार्ग का निर्माण करवाया था।

एआई ने दिखाया शेर शाह सूरी ने कैसे बनवाई 4000 किमी लंबी सड़क
सड़क का नाम
उस समय समय इस सड़क का नाम सड़क-ए-आजम था, जिसे शाही सड़क भी कहते थे। 4000 किमी लंबी इस सड़क का नाम बाद में अंग्रेजों ने बदलकर ग्रांड ट्रंक रोड (GT Road) रख दिया। यह सड़क अंग्रेजों के समय मिलिट्री स्ट्रैटजी और अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी बनी रही।
उस समय इस सड़क को आज जैसी आधुनिक सुविधाओं और मैटेरियल के बिना और बिना किसी बाहरी मदद के बनाया गया था। इस सड़क को बनाने के लिए पत्थर, रोडियां और मिट्टी का इस्तेमाल किया गया था। इसे उस समय के हिसाब से काफी समतल बनाया गया, ताकि इस पर घोड़े और घोड़ा-बैल गाड़ियों के साथ ही शाही दूत तेजी से सफर कर सकें। शेर शाह सूरी द्वारा यह सड़क बनाने का मकसद सिर्फ कनेक्टिविटी से ज्यादा था। इस सड़क की वजह से शेर शाह सूरी की सेनाओं को तेजी से आगे बढ़ने में मदद मिली। इससे व्यापारियों, कारवां आदि को तेजी से अपने गंतव्य की ओर जाने में मदद मिली।
अकबरनामा में जिक्र
अबुल फजल द्वारा लिखित अकबरनाम में बताया गया है कि यह सड़क 4000 किमी लंबी थी। यह सड़क काबुल (अफगानिस्तान), पेशावर (पाकिस्तान), लाहौर (पाकिस्तान), अमृतसर, दिल्ली, आगरा, इलाहाबाद (प्रयागराज), बनारस (वाराणसी), मुंगेर और सोनारगांव (बांग्लादेश में) से गुजरती थी।

दिल्ली-अमृतसर रोड
शेर शाह सूरी ने इस पूरे रूट के आसपास कई सराय (रेस्ट हाउस), पानी के तालाब (Water Tanks) और घोड़ों के लिए अस्तबल की व्यवस्था भी की थी। उस समय यह व्यवस्था अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम की तरह थी।
शेर शाह ने करोड़ों रुपये खर्च किए
माना जाता है कि 15 से 20 हजार कर्मचारियों ने इस सड़क को बनाने में काम किया। जिसमें कारीगर, पत्थर तोड़ने वाले और मजदूर भी शामिल थे। अबुल फजल के अनुसार शेर शाह सूरी ने इस प्रोजेक्ट को बनाने में अपने राजस्व का एक बड़ा हिस्सा खर्च किया था। आज के हिसाब से उस समय शेर शाह सूरी ने इस रोड को बनाने में हजारों करोड़ रुपये खर्च किए थे।
बात आधुनिक दौर की करें तो ग्रांड ट्रेंक रोड की उपयोगिता बनी रही। 1947 में आजादी के बाद इस सड़क का एक हिस्सा पाकिस्तान में रह गया, जो अटारी को काबुल से जोड़ता है। जबकि अटारी से कोलकाता तक यह रोड भारत के नियंत्रण में रही। भारत और पाकिस्तान को यह सड़क अटारी-वाघा बॉर्डर के जरिए जोड़ती है। इस रोड के एतिहासिक महत्व और इसकी पहुंच को देखते हुए इस सड़क को राष्ट्रीय राजमार्ग-1 यानी नेशनल हाईवे-1 का दर्जा मिला। NH-1 अमृतसर को दिल्ली और कोलकाता से जोड़ता है और इसे देश की प्रमुख धमनी माना जाता है, जो डिफेंस और कॉमर्शियल मकसद दोनों के लिए अति महत्वपूर्ण है।
