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सुप्रीम कोर्ट की गाजियाबाद के दो अस्पतालों और डॉक्टरों को फटकार, कहा - ड्यूटी नहीं निभा सकते तो डॉक्टर मत लिखिए

गाजियाबाद में दुष्कर्म की शिकार चार साल की बच्ची का इलाज करने से मना करने पर सुप्रीम कोर्ट ने यहां के दो निजी अस्पतालों और डॉक्टरों को फटकार लगाई। कोर्ट ने उन्हें परिवार को मुआवजा देने का भी निर्देश दिया है।

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सुप्रीम कोर्ट की गाजियाबाद के दो अस्पतालों और डॉक्टरों को फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने आज यानी शुक्रवार 17 जुलाई को दो निजी अस्पतालों और उनके डॉक्टरों को फटकार लगाई। इन अस्पतालों ने मार्च में उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में दुष्कर्म की शिकार चार साल की बच्ची को समय पर डॉक्टरी सहायता नहीं दी थी, बाद में बच्ची की मौत हो गई।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने अस्पतालों से परिवार को उचित मुआवजा देने को कहा। CJI ने डॉक्टरों से कहा, 'अगर आप अपना फर्ज नहीं निभाते, तो आपको 'डॉक्टर' कहलाने का कोई हक नहीं है। अगर आपमें थोड़ी भी संवेदनशीलता होती, आपके पास सुविधा नहीं थी, तो आप उस बच्चे को दूसरे अस्पताल ले जाते... क्या आपने इसलिए नजरअंदाज किया, क्योंकि वह गरीब थी? आपकी फीस नहीं दे सकती थी?' इस मामले में अगले हफ्ते फिर सुनवाई होगी।

कथित तौर पर एक पड़ोसी 16 मार्च को पीड़िता को चॉकलेट दिलाने के बहाने बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया। जब बच्ची वापस नहीं लौटी, तो उसके पिता ने उसे खोजना शुरू किया और बेहोशी की हालत और खून से लथपथ पाया।

परिवार उसे दो निजी अस्पतालों में ले गया, जहां कथित तौर पर उसे भर्ती करने से मना कर दिया गया। उसे गाजियाबाद के एक सरकारी अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने बच्ची को मृत घोषित कर दिया। कोर्ट ने इस मामले में प्राथमिकी दर्ज करने और जांच को लेकर गाजियाबाद पुलिस की 'हिचकिचाहट' की ओर अप्रैल में इशारा किया था।

उसने कथित तौर पर पीड़िता का इलाज करने से मना करने वाले दो निजी अस्पतालों (खजान सिंह मानवी हेल्थ केयर और सेंट जोसेफ (मरियम) हॉस्पिटल) को भी निर्देश दिया था कि वे उन पर लगे आरोपों के जवाब में अपने हलफनामे दाखिल करें।

पीठ पीड़िता के पिता की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो दिहाड़ी मजदूर हैं और चाहते हैं कि इस मामले की जांच अदालत की निगरानी में विशेष जांच दल (SIT) या CBI करे। कोर्ट ने 10 अप्रैल को मामले की सुनवाई करते हुए जांच में गाजियाबाद पुलिस के 'संवेदनहीन रवैये' की कड़ी आलोचना की थी।

पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार, संबंधित पुलिस थाने के SHO, दो अस्पतालों और कार्यकारी मजिस्ट्रेट को नोटिस जारी किए थे। कोर्ट ने पुलिस और अस्पतालों को निर्देश दिया था कि वे यह सुनिश्चित करें कि पीड़िता और उसके परिवार के सदस्यों की पहचान उजागर न हो और उनके रिकॉर्ड से ऐसी कोई भी जानकारी हटा दी जाए।

पीठ ने राज्य पुलिस से यह भी कहा था कि वे पीड़िता के परिवार के सदस्यों को परेशान न करें। कोर्ट ने इस बात पर निराशा जताई थी कि दो निजी अस्पतालों ने खून से लथपथ लड़की को भर्ती करने से मना कर दिया था और आखिरकार एक सरकारी अस्पताल में उसे मृत घोषित कर दिया गया।

Digpal Singh
दिगपाल सिंहauthor

दिगपाल सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में सिटी टीम को लीड कर रहे हैं। शहरों से जुड़ी ताजाखबरें, लोकल मुद्दे, चुनावी कवरेज और एक्सप्लेनर फॉर्मेट पर उनकी मजबूत पकड़ है। 2006 से पत्रकारिता में सक्रिय दिगपाल सिंह को प्रिंट और डिजिटल दोनों माध्यमों में काम करने का अनुभव है। दोनों प्लेटफॉर्म्स पर काम करते हुए उन्होंने ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग से लेकर सेंट्रल डेस्क पर बड़ी खबरों की हैंडलिंग तक हर स्तर पर अनुभव हासिल किया है। अब तक 30,000 से अधिक खबरें लिख चुके दिगपाल हाइपर-लोकल न्यूज की बारीकियों, शहरों की समस्याओं और लोगों से जुड़े वास्तविक मुद्दों को समझने की विशेष क्षमता रखते हैं।

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