रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध पिछले चार साल से ज्यादा समय से अब भी जारी है। इस बीच यूक्रेन ने हाल में रूस की तेल रिफायनरियों पर ताबड़तोड़ हमले किए, जिसके कारण रूस की रिफाइनिंग क्षमता 40 फीसद तक प्रभावित हुी है। इसके बाद Rosneft, Gazprom Neft, और Lukoil रूस की तीन सबसे बड़ी एकीकृत ऊर्जा और तेल कंपनियां ने भारत से संपर्क किया है। इन तीनों कंपनियों ने भारत की निजी और सरकारी रिफाइनरियों से ईंधन की आपूर्ति की मांग की है।
न्यूज एजेंसी रायटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार भारतीय मूल का कम से कम एक गैसोलीन कार्गो रूस की ओर भेजा जा चुका है और आगे भी भारत की तरफ से आपूर्ति बढ़ सकती है। यह स्थिति इसलिए और भी गौर करने लायक है क्योंकि रूस लंबे समय से भारत को कच्चा तेल आपूर्ति करने वाले प्रमुख देशों में से एक रहा है।
तेल आयातक से रिफाइनिंग हब तक का सफर
भारत में कच्चे तेल के डिपॉजिट बहुत कम ही हैं। देश अपनी तेल जरूरतों का 90 फीसद से ज्यादा हिस्सा दूसरे देशों से आयात करके पूरा करता है। लेकिन कच्चा तेल आयात करना और उसे पेट्रोल, डीजल, एटीएफ, एलपीजी तथा पेट्रोकेमिकल फीडस्टॉक में बदलना दो अलग-अलग चरण हैं। भारत ने पिछले तीन दशकों में इसी दूसरे चरण यानी रिफाइनिंग में बड़ी क्षमता विकसित की है।
देश में 23 रिफाइनरी की क्षमता 5.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन
आज भारत में 23 ऑयल रिफाइनरियां काम कर रही हैं और कुल रिफाइनिंग क्षमता भी लगभग 5.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन मानी जाती है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक स्थापित क्षमता लगभग 258 मिलियन टन प्रति वर्ष के आसपास है। अप्रैल 2014 में यह क्षमता करीब 215 MMTPA थी, जो अप्रैल 2024 तक बढ़कर लगभग 257 MMTPA से अधिक हो गई।
जामनगर और निजी निवेश ने बदली तस्वीर
1990 के दशक के आर्थिक उदारीकरण के बाद इस क्षेत्र में भी निजी निवेश तेजी से बढ़ा। इसके बाद बड़े और निर्यात को ध्यान में रखकर बनाई गए रिफाइनिंग प्रोजेक्ट सामने आए। Reliance Industries का जामनगर रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स इस बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है। इसकी क्षमता लगभग 1.24 मिलियन बैरल प्रतिदिन है। रिलायंस के जामनगर कॉम्पलेक्स को दुनिया के सबसे बड़े रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स में गिना जाता है।
न्यूज एजेंसी रायटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक Reliance Industries के साथ ही Nayara Energy और HPCL-Mittal Energy मिलकर भारत की कुल रिफाइनिंग क्षमता का बड़ा हिस्सा (लगभग 40 फीसद) नियंत्रित करते हैं। इन रिफाइनरियों की खासियत यह है कि वे घरेलू जरूरतों के साथ-साथ निर्यात बाजारों को ध्यान में रखकर भी उत्पादन करती हैं।
कच्चा तेल आयात कर, पेट्रोलियम उत्पाद निर्यात कर रहा भारत (AI Image)
हल्का और भारी दोनों तरह के कच्चे तेल प्रोसेस करने की क्षमता
भारत की कई आधुनिक रिफाइनरियां हल्के और भारी दोनों तरह के कच्चे तेल को प्रोसेस कर सकती हैं। इससे भारतीय कंपनियां पश्चिम एशिया, रूस, अफ्रीका और अमेरिका से अलग-अलग ग्रेड का कच्चा तेल खरीद सकती हैं। भारी कच्चे तेल को प्रोसेस करने वाली इकाइयां ज्यादा मूल्य वाले ईंधन जैसे पेट्रोल, डीजल और जेट फ्यूल का उत्पादन बढ़ा सकती हैं। यही लचीलापन भारतीय रिफाइनरियों को वैश्विक बाजार के कॉम्पटीशन में आगे रखता है।
भारत से किन देशों को तेल उत्पाद निर्यात होते हैं?
कच्चे तेल को रिफाइन करने के बाद भारत मुख्य रूप से पेट्रोल, डीजल, एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF), फ्यूल ऑयल और कुछ पेट्रोकेमिकल उत्पादों का निर्यात करता है। भारतीय रिफाइनरियों से उनके उत्पाद एशिया, अफ्रीका, यूरोप, पश्चिम एशिया और ऑस्ट्रेलिया तक भी भेजे जाते हैं।
भारत के पारंपरिक ग्राहक देश
- सिंगापुर
- यूएई
- सऊदी अरब
- श्रीलंका
- नेपाल
- बांग्लादेश
- अफ्रीकी देश
- यूरोप के कई देश
- ऑस्ट्रेलिया
- अमेरिका
हाल के वर्षों में इन देशों में बढ़ा निर्यात
रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद वैश्विक ऊर्जा व्यापार में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। इस दौरान भारत ने रूस से रियायती कच्चा तेल खरीदा, उसे रिफाइन किया और पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात बढ़ाया। हाल के वर्षों में भारतीय उत्पाद यूरोप, अफ्रीका, एशिया और पश्चिम एशिया के बाजारों में भी पहुंचे। अब रूस को भी भारतीय गैसोलीन की आपूर्ति की खबरें सामने आ रही हैं, जो भारत के लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं।
रूसी कच्चे तेल से बढ़ा कॉम्पटीशन
साल 2022 के बाद रूस की तरफ से रियायती दरों पर कच्चा तेल मिलने से भारतीय रिफाइनरियों की लागत कम हुई। चूंकि, कच्चा तेल रिफाइनिंग लागत का सबसे बड़ा हिस्सा होता है, इसलिए कम कीमत पर खरीदे गए तेल से बने पेट्रोल और डीजल को अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी दरों पर बेचना भी आसान हो गया।
तेल निर्यात से भारत को कितनी विदेशी मुद्रा मिलती है?
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के आंकड़ों के मुताबिक, भारत ने साल 2024-25 में लगभग 64.7 मिलियन टन पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात किया। यह मात्रा एक मिलियन बैरल प्रतिदिन से अधिक के बराबर है। भारत जिन चीजों का निर्यात करता है, उनमें पेट्रोलियम उत्पाद प्रमुख हैं। अंतरराष्ट्रीय कीमतों के अनुसार इसमें उतार-चढ़ाव होता रहता है, लेकिन इससे हर साल अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा की आमदनी होती है। हाल के वर्षों में भारत के पेट्रोलियम उत्पाद निर्यात का मूल्य कई बार 40 से 60 अरब डॉलर के दायरे में रहा है।
2030 तक और बढ़ेगी भारत की रिफाइनिंग क्षमता
भारत सरकार ने साल 2030 तक रिफाइनिंग क्षमता को लगभग 309.5 MMTPA तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। देश की प्रमुख तेल कंपनी Indian Oil Corporation गुजरात रिफाइनरी के विस्तार सहित कई परियोजनाओं पर काम कर रही है। इसका मतलब है कि भारत सिर्फ घरेलू ईंधन मांग पूरी करने वाला देश नहीं रहना चाहता, बल्कि वैश्विक रिफाइनिंग और पेट्रोलियम उत्पाद निर्यात के बड़े केंद्र के रूप में अपनी भूमिका और मजबूत करना चाहता है। रूस से गैसोलीन मांग की खबर इसी बदलती स्थिति की ओर इशारा करती है।
