मानसून अब देशभर में पहुंच चुका है। पिछले दिनों मुंबई-ठाणे से लेकर पूर्वोत्तर और उत्तर भारत में बादल जमकर बरसे। इस दौरान दिल्ली-एनसीआर में भी तीन दिन खूब बारिश हुई। गुरुग्राम में तो भारी बारिश के कारण सड़कें तालाब बन गईं और लंबा ट्रैफिक जाम लग गया। दिल्ली और एनसीआर के अन्य शहरों में भी हालात किसी से छिपे नहीं हैं। पहाड़ी इलाकों में भारी बारिश के साथ ही बादल फटने की घटनाएं भी हो रही थीं। फिर अचानक बारिश का दौर रुक गया। आखिर ऐसा क्या हुआ कि अचानक मानसूनी बारिश थम गई? क्या यह घटना सामान्य है? चलिए जानते हैं -
पिछले कुछ दिनों से भले ही बारिश न हो रही हो, लेकिन देश के अधिकांश हिस्सों में मानसून अब भी सक्रिय है। इस मौसम में बारिश का ऐसा ब्रेक सामान्य है। हर साल मानसून के दौरान कुछ ऐसे दिन आते हैं, जब बारिश अचानक लगभग थम जाती है। मौसम विज्ञान की भाषा में इसे मानसून विच्छेद (Monsoon Break) कहा जाता है। निश्चित तौर पर यह मानसून खत्म होने का संकेत नहीं, बल्कि एक अस्थायी विराम होता है। यह मानसूनी बारिश में यह विराम कुछ दिनों से लेकर कई हफ्तों तक का हो सकता है।
जानकारों के मुताबिक, मानसून ब्रेक के दौरान सेंट्रल इंडिया, उत्तर-पश्चिम भारत और प्रायद्वीपीय क्षेत्रों में बारिश सामान्य से बहुत कम हो जाती है। हालांकि, इसी दौरान हिमालय की तलहटी और पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य या उससे ज्यादा बारिश हो सकती है।
क्या होता है Monsoon Break? जानें IMD की आधिकारिक परिभाषा
जैसा कि हमने ऊपर बात की सामान्य रूप से भारत के ज्यादातर हिस्सों में मानसून जून से सितंबर तक सक्रिय रहता है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, हर साल जून से सितंबर के बीच दक्षिण-पश्चिम मानसून (Southwest Monsoon) के दौरान ऐसी स्थितियां आना पूरी तरह स्वाभाविक हैं। लगभग हर साल किसी न किसी अवधि में यह स्थिति देखने को मिलती है। लेकिन सिर्फ 2-4 दिन बारिश न होने को वैज्ञानिक रूप से 'मानसून ब्रेक' नहीं कहा जाता। IMD इसके लिए दो प्रमुख तकनीकी शर्तें देखता है:
मानसूनी ट्रफ का खिसकना (Shifting of Monsoon Trough): मानसून के दौरान मध्य भारत में कम दबाव का एक क्षेत्र (Trough) बनता है, जो बारिश कराता है। जब यह ट्रफ लाइन अपने सामान्य स्थान (मध्य भारत) से उत्तर की ओर खिसककर, हिमालय की तलहटी (Foothills of Himalayas) में पहुंच जाती है, तो देश के बाकी हिस्सों में मानसूनी बारिश पर ब्रेक लग जाता है।

मानसून ब्रेक के दौरान उत्तर की ओर खिसक जाती है ट्रफ लाइन
कोर बेल्ट में भारी कमी : ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे 'कोर मानसून जोन' में जब लगातार दो या दो से ज्यादा दिनों तक बारिश सामान्य से बहुत कम या शून्य हो जाती है, तब आधिकारिक रूप से 'ब्रेक मानसून' की घोषणा की जाती है।
एक दिलचस्प विरोधाभास (The Spatial Paradox): आपको जानकर हैरानी होगी कि जब पूरे देश में मानसून ब्रेक के कारण सूखा और उमस होती है। ठीक उसी समय नॉर्थ-ईस्ट और उत्तराखंड-हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्यों में मूसलाधार बारिश और फ्लैश फ्लड (अचानक बाढ़) का खतरा बढ़ जाता है, क्योंकि सारे मानसूनी बादल हिमालय की पहाड़ियों से जा टकराते हैं।
मानसून ब्रेक क्यों आता है? इसके पीछे के 4 वैज्ञानिक कारण
मानसून ब्रेक के लिए कोई एक कारण नहीं बल्कि इसके पीछे कई मौसम संबंधी कारण जिम्मेदार होते हैं। उन कारणों में से कुछ निम्न हैं -
लो-प्रेशर सिस्टम का न बनना
भारतीय मानसून को उसका असली रूप बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) में बनने वाले कम दबाव के क्षेत्र (Cyclonic Circulations or Depressions) देते हैं। ये सिस्टम नमी वाले बादलों को खींचकर मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत की ओर लाते हैं। जब बंगाल की खाड़ी में लंबे समय तक ऐसा कोई सिस्टम नहीं बनता, तो मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं और परिस्थितियां मानसून ब्रेक कहलाती हैं।
मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) का प्रभाव
मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के ऊपर भूमध्य रेखा के पास पूर्व की ओर बढ़ने वाला बादलों और हवाओं का एक वैश्विक चक्र है। जब MJO का एक्टिव फेज हिंद महासागर से हटकर प्रशांत महासागर की तरफ बढ़ जाता है, तो भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर हवा नीचे बैठने लगती है और बादलों का बनना बंद हो जाता है।
अरब सागर की शाखा का कमजोर होना
भारत में मानसून की एक और बड़ी ताकत अरब सागर से आने वाली दक्षिण-पश्चिमी हवाएं हैं। इसे मानसून की अरब सागर शाखा कहा जाता है। ऊपरी वायुमंडलीय परिसंचरण (Upper Air Circulation) में बदलाव के कारण जब इन पश्चिमी हवाओं (Westerlies) की गति धीमी हो जाती है, तो भारत के पश्चिमी तट (मुंबई, कोंकण, गुजरात) पर भी बारिश थम जाती है।
अल नीनो (El Niño) का साया
जब प्रशांत महासागर की सतह का तापमान असामान्य रूप से बढ़ता है, तो उस स्थिति को 'अल नीनो' कहा जाता है। अल नीनो के वर्षों में मानसून ब्रेक की संख्या बढ़ जाती है और इसकी अवधि भी सामान्य (3 से 5 दिन) के मुकाबले बढ़कर कई हफ्तों तक खिंच जाती है। इस साल अल-नीनो का खतरा काफी ज्यादा है।
इन सभी परिस्थितियों में अधिकांश मानसूनी बादल उत्तर की ओर चले जाते हैं और देश के बड़े हिस्से में बारिश का दौर रुक जाती है।

मानसून ब्रेक का असर देश के कृषि क्षेत्र पर बहुत गंभीर पड़ता है
इतिहास के सबसे लंबे और खतरनाक Monsoon Break
मौसम विभाग के ऐतिहासिक आंकड़ों पर नजर डालें तो देश ने कई बार खतरनाक और लंबे मानसून ब्रेक का सामना किया है, इन मानसून ब्रेक ने देश को सूखे की कगार पर धकेल दिया था :
1. साल 1972 (सबसे लंबा ब्रेक): इस साल 18 जुलाई से 3 अगस्त तक (लगभग 18 दिन) देश में एक लंबा मानसून ब्रेक रहा था। इसके कारण देश के बड़े हिस्से में अकाल और गंभीर सूखे जैसे हालात पैदा हो गए थे।
2. साल 2002 (जुलाई का सूखा): इस साल जुलाई के महीने में लगातार दो हफ्तों से ज्यादा समय तक मानसूनी बारिश पूरी तरह ठप रही। इसके चलते देश में खरीफ फसलों को भारी नुकसान पहुंचा था और जुलाई महीने की कुल बारिश में करीब 49-51 फीसद की रिकॉर्ड कमी दर्ज की गई थी।
3. साल 2009: इस साल भी मानसून ब्रेक लंबा चला और इसके कारण भारत को पिछले कुछ दशकों के सबसे खराब सूखे का सामना करना पड़ा था।
मानसून ब्रेक का खेती पर कैसे पड़ता है असर?
चूंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है और देश के किसान मानसूनी बारिश पर ही ज्यादा निर्भर हैं। ऐसे में मानसून ब्रेक का सबसे बड़ा प्रभाव कृषि क्षेत्र पर ही दिखाई देता है। धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दालों जैसी खरीफ फसलें शुरुआती वृद्धि के दौरान नियमित बारिश पर निर्भर रहती हैं। अगर इस दौरान लगातार 10 से 15 दिन तक बारिश नहीं होती है, तो पौधों की ग्रोथ रुक सकती है, बुआई प्रभावित होती है और सिंचाई की अतिरिक्त जरूरत बढ़ जाती है, जबकि देश के बहुत से हिस्सों में सिंचाई की व्यवस्था ही नहीं है। कई क्षेत्रों में किसानों को दोबारा बुआई तक करनी पड़ सकती है, जिससे उनकी लागत बढ़ जाती है।
मानसून ब्रेक का भूजल और तालाब आदि पर असर
मानसून ब्रेक अगर लंबा चलता है तो इस दौरान नदियों में जल प्रवाह घटने लगता है। बांधों और जलाशयों में उम्मीद के अनुसार पानी जमा नहीं हो पाता है। इससे ग्राउंड वाटर रीचार्ज भी प्रभावित होता है, जिसका असर बाद के महीनों में पेयजल उपलब्धता और सिंचाई पर पड़ सकता है। अगर ब्रेक लंबा खिंच जाए तो कई ग्रामीण इलाकों और शहरों में भी जल संकट गहराने की आशंका बढ़ जाती है।
जलवायु और मौसम पर क्या प्रभाव होता है?
मानसून ब्रेक के दौरान आसमान में बादल कम हो जाते हैं। ऐसे में तापमान बढ़ने लगता है और उमस ज्यादा महसूस होती है। दूसरी तरफ, जब मानसून ब्रेक खत्म होता है तो कई बार कम समय में बहुत ज्यादा बारिश (Heavy Rainfall Events) हो जाती है। इससे बाढ़, जलभराव और भूस्खलन (Landslide) जैसी घटनाओं का जोखिम भी बढ़ जाता है।
क्या Monsoon Break सामान्य प्रक्रिया है?
विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून ब्रेक बिल्कुल सामान्य घटना है। यह भारतीय मानसून प्रणाली का एक बिल्कुल स्वाभाविक हिस्सा है। हालांकि, अगर इसकी अवधि सामान्य से ज्यादा लंबी हो जाए या बार-बार ब्रेक की स्थिति बने, तो इसका सीधा असर कृषि उत्पादन, जल संसाधनों, बिजली उत्पादन और देश की पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। यही कारण है कि मौसम विभाग लगातार मानसूनी गतिविधियों की निगरानी करता है और समय-समय पर राज्यों व किसानों के लिए पूर्वानुमान व सलाह जारी करता है।
