अहमदाबाद : गरीब बांग्लादेशी परिवार को रोजगार दिलाने के वादे से शुरू हुई कहानी आखिरकार अंतरराष्ट्रीय मानव तस्करी, नाबालिगों के यौन शोषण और देह व्यापार के एक संगठित नेटवर्क तक पहुंची। करीब दो साल की जांच के बाद अहमदाबाद की स्पेशल POCSO कोर्ट ने इस मामले में दो आरोपियों को दोषी करार देते हुए गुजरात के चर्चित मानव तस्करी मामलों में से एक का निपटारा किया है।
31 जुलाई 2026 को अहमदाबाद की स्पेशल POCSO कोर्ट ने पश्चिम बंगाल मूल के और अहमदाबाद के वस्त्राल में रहने वाले सागर मिलन मंडल और बांग्लादेशी नागरिक मोहम्मद फारूक उर्फ हारुन मोहम्मद करीम मंडल को भारतीय न्याय संहिता (BNS), पॉक्सो एक्ट और इम्मोरल ट्रैफिक (प्रिवेंशन) एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी ठहराया। यह फैसला अहमदाबाद क्राइम ब्रांच की ओर से 21 अगस्त 2024 को दर्ज की गई FIR के करीब एक साल बाद आया। जांच टीम ने लगातार कार्रवाई करते हुए मामले को अंजाम तक पहुंचाया।
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एक सूचना से खुला बड़ा नेटवर्क
अभियोजन पक्ष के अनुसार, क्राइम ब्रांच को सूचना मिली थी कि दो लोग बांग्लादेश की गरीब महिलाओं और नाबालिग लड़कियों को अच्छी नौकरी दिलाने का झांसा देकर भारत ला रहे हैं और बाद में उन्हें जबरन देह व्यापार में धकेल रहे हैं।
सूचना के आधार पर क्राइम ब्रांच की टीम वस्त्राल स्थित गंगा अपार्टमेंट के फ्लैट नंबर 405 पहुंची। 21 अगस्त 2024 को इंस्पेक्टर आई.एन. घासुरा के नेतृत्व में पुलिस टीम ने पंच गवाहों, महिला पुलिसकर्मियों और बंगाली अनुवादक के साथ छापेमारी की। फ्लैट के अंदर दो नाबालिग बहनें, जिनकी उम्र 15 और 17 साल थी, उनकी मां, एक आरोपी की पत्नी और दो साल का बच्चा मिला। पूछताछ में सामने आया कि सभी बांग्लादेशी नागरिक थे और कथित तौर पर अवैध तरीके से भारत आए थे। जांच आगे बढ़ी तो पता चला कि यह सिर्फ एक परिवार का मामला नहीं बल्कि एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा था।
रोजगार का वादा बना जाल
अभियोजन के मुताबिक, मोहम्मद फारूक बांग्लादेश में आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को निशाना बनाता था और उन्हें भारत में नौकरी व बेहतर जिंदगी का भरोसा देता था। पीड़ित मां ने जांच अधिकारियों को बताया कि गरीबी के कारण वह इस झांसे में आ गई। बेटियों के बेहतर भविष्य की उम्मीद में वह उनके साथ भारत आ गई। लेकिन जांच में आरोप लगाया गया कि भारत पहुंचने के बाद परिवार को अहमदाबाद लाया गया और सागर मंडल के घर पर रखा गया, जहां धीरे-धीरे उनका नियंत्रण आरोपियों के हाथ में चला गया।
कोर्ट रिकॉर्ड के मुताबिक, छोटी बेटी ने आरोप लगाया कि सागर मंडल ने कई बार उसका यौन शोषण किया। दोनों बहनों ने आरोप लगाया कि उन्हें अलग-अलग ग्राहकों के पास भेजा जाता था और उनसे होने वाली कमाई का बड़ा हिस्सा आरोपी खुद रख लेते थे। अभियोजन ने यह भी आरोप लगाया कि सागर मंडल की पत्नी भी इस पूरे नेटवर्क में शामिल थी। वह पीड़ितों को स्पा सेंटर तक ले जाती थी, ग्राहकों से संपर्क करती थी और पैसे इकट्ठे करती थी।
FIR में सामने आई पूरी कहानी
FIR के अनुसार, गोपनीय सूचना मिलने के बाद क्राइम ब्रांच ने विशेष टीम बनाई थी। चूंकि पीड़ित बांग्लादेशी थे, इसलिए पूछताछ के लिए बंगाली अनुवादक की मदद ली गई। रेड के दौरान पुलिस ने सागर मंडल के पास से दो मोबाइल फोन बरामद किए। फ्लैट में दोनों नाबालिग लड़कियां और उनकी मां मिलीं। जांच में सागर मंडल की पत्नी ने कथित तौर पर बताया कि उसे भी पहले नौकरी का लालच देकर बांग्लादेश से भारत लाया गया था और बाद में वह भी देह व्यापार में धकेली गई थी।
पीड़ित मां ने आरोप लगाया कि मोहम्मद फारूक ने नौकरी दिलाने का भरोसा देकर उन्हें भारत लाया और करीब साढ़े तीन महीने पहले अवैध तरीके से भारत में प्रवेश करवाकर सागर मंडल को सौंप दिया।
छोटी पीड़िता ने यौन शोषण के आरोप लगाए, जबकि दोनों बहनों ने ग्राहकों के पास भेजे जाने की बात कही। पुलिस के अनुसार, जांच के दौरान सागर मंडल ने कथित तौर पर स्वीकार किया कि वह और मोहम्मद फारूक मिलकर गरीब बांग्लादेशी महिलाओं और लड़कियों को भारत लाते थे और उनसे देह व्यापार करवाते थे।
जांच में सामने आया बड़ा सिंडिकेट
क्राइम ब्रांच अधिकारियों के मुताबिक, यह मामला अहमदाबाद में संगठित मानव तस्करी के खिलाफ बड़ी कार्रवाई साबित हुआ। अधिकारियों ने बताया कि चांदोलिया-दाणिलिमडा क्षेत्र में नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण और अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ से जुड़े नेटवर्क का यह पहला बड़ा मामला सामने आया।जांच के दौरान कथित तौर पर नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों के खिलाफ छह अतिरिक्त आपराधिक मामले दर्ज किए गए। क्राइम ब्रांच के इंस्पेक्टर एस.जे. जाडेजा और आई.एन. घासुरा सहित उनकी टीमों ने जांच को आगे बढ़ाया और लगातार फॉलोअप के बाद मामला कोर्ट में पहुंचा।
कोर्ट में पेश किए गए सबूत
ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष ने नौ गवाह पेश किए। इनमें दोनों पीड़ित बहनें, उनकी मां, जांच अधिकारी, मेडिकल विशेषज्ञ, पंच गवाह और रेड टीम के सदस्य शामिल थे। अभियोजन ने मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज बयान, मेडिकल रिपोर्ट, फॉरेंसिक सबूत, बांग्लादेशी स्कूल जन्म प्रमाण पत्र, उम्र जांच रिपोर्ट और अन्य दस्तावेज पेश किए।
कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट की धाराओं 29 और 30 के तहत मिलने वाले कानूनी प्रावधानों पर भी विचार किया, जिनके तहत शुरुआती तथ्य साबित होने के बाद आरोपी पर अपनी बेगुनाही साबित करने की जिम्मेदारी आती है।
बचाव पक्ष की दलील खारिज
आरोपियों ने सभी आरोपों से इनकार किया। बचाव पक्ष ने गवाहों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए और कहा कि एक सामान्य रिहायशी फ्लैट से इतना बड़ा नेटवर्क चलना संभव नहीं है। हालांकि कोर्ट ने मौखिक गवाही, दस्तावेजी सबूत, मेडिकल रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों के आधार पर माना कि अभियोजन पक्ष ने आरोपों को संदेह से परे साबित किया है।
दोषियों को मिली सजा
सागर मिलन मंडल को पॉक्सो एक्ट के तहत गंभीर यौन अपराध और संबंधित धाराओं में 20 साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। साथ ही 20 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया। उसे मानव तस्करी के लिए 14 साल की कठोर कैद, नाबालिग पीड़िता के शोषण के लिए 5 साल की सजा और इम्मोरल ट्रैफिक एक्ट की अन्य धाराओं में भी सजा सुनाई गई।
मोहम्मद फारूक उर्फ हारुन मंडल को मानव तस्करी के मामले में 14 साल की कठोर कैद, नाबालिग के शोषण के लिए 5 साल की सजा और इम्मोरल ट्रैफिक एक्ट के तहत अलग-अलग सजाएं दी गईं। कोर्ट ने उसे यौन हमले की धाराओं में दोषी नहीं माना क्योंकि उसके खिलाफ ऐसा कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं था। सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी, यानी दोषियों को सबसे लंबी अवधि वाली सजा ही पूरी करनी होगी।
सिर्फ एक केस नहीं, एक बड़े नेटवर्क का खुलासा
यह मामला दिखाता है कि कैसे गरीबी, अवैध घुसपैठ और कमजोर सामाजिक परिस्थितियों का फायदा उठाकर मानव तस्करी के नेटवर्क काम करते हैं। दो नाबालिग लड़कियों के रेस्क्यू से शुरू हुई कार्रवाई ने एक बड़े क्रॉस-बॉर्डर तस्करी नेटवर्क का खुलासा किया, कई अन्य मामलों को जन्म दिया और जांच एजेंसियों के अनुसार अहमदाबाद में चल रहे एक संगठित शोषण तंत्र को तोड़ने में मदद की। FIR दर्ज होने के करीब एक साल के भीतर हुई यह सजा क्राइम ब्रांच के लिए मानव तस्करी और नाबालिगों के शोषण के खिलाफ एक बड़ी कानूनी सफलता मानी जा रही है।
