हैदराबाद सिटी सिविल कोर्ट ने ₹100 करोड़ के मानहानि मुकदमे में एक अहम अंतरिम आदेश पारित करते हुए मीडिया कवरेज की सीमाएं तय कर दी हैं। यह मामला यूरो एक्जिम बैंक द्वारा एक कारोबारी और मीडिया संस्थान के खिलाफ दायर किया गया है, जिसमें बैंक ने अपने खिलाफ प्रसारित कथित रूप से झूठे और अप्रमाणित आरोपों को चुनौती दी है।
यह आदेश में अदालत ने बैंक की याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि भविष्य में इस मामले से जुड़े किसी भी प्रकाशन या प्रसारण में तथ्यात्मक शुद्धता और पर्याप्त साक्ष्य होना अनिवार्य होगा।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि प्रतिवादियों द्वारा लगाए गए कई गंभीर आरोपों जैसे बैंक की नेट वर्थ मात्र ₹8 करोड़ होना के समर्थन में कोई ठोस दस्तावेज़ या विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं किया गया। इसके विपरीत,बैंक ने अपने प्रमाणित वित्तीय दस्तावेज़ (Ex.P11) प्रस्तुत किए, जिनमें वित्त वर्ष 2023-24 के लिए उसकी नेट वर्थ ₹1900 करोड़ से अधिक बताई गई है।
अदालत ने धोखाधड़ीपूर्ण गारंटियों, हवाला लेन-देन और कथित आरबीआई/फेमा उल्लंघनों जैसे आरोपों पर भी टिप्पणी की। न्यायालय के अनुसार, इस स्तर पर ऐसा कोई साक्ष्य सामने नहीं आया जिससे यह साबित हो सके कि इन आरोपों के आधार पर बैंक के खिलाफ कोई आपराधिक कार्यवाही शुरू हुई हो। अदालत ने कहा कि इन मुद्दों पर अंतिम निर्णय विस्तृत सुनवाई के बाद ही संभव होगा।
हालांकि अदालत ने यह माना कि बैंक ने अंतरिम राहत के लिए प्रथम दृष्टया मजबूत मामला पेश किया है और निराधार आरोपों से उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान हो सकता है, फिर भी पूर्ण प्रतिबंध लगाने से परहेज किया गया। इसके बजाय अदालत ने एक संतुलित रुख अपनाते हुए निर्देश दिया कि बिना सत्यापन योग्य साक्ष्य के बैंक के खिलाफ कोई भी आरोप प्रकाशित या प्रसारित न किया जाए।
साथ ही, अदालत ने यह भी कहा कि भविष्य में किसी भी रिपोर्टिंग में अपमानजनक या भ्रामक शीर्षकों से बचा जाए और यह स्पष्ट उल्लेख किया जाए कि मामला न्यायालय में विचाराधीन है। हालांकि, सार्वजनिक हित में सत्य और प्रमाणित जानकारी के प्रकाशन पर कोई रोक नहीं लगाई गई है।
वहीं, यूरो एक्जिम बैंक ने इस पूरी प्रक्रिया में न्यायिक प्रणाली पर भरोसा जताते हुए अपने दावों को दस्तावेज़ी साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़ाने की बात कही है।
