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चाय की चुस्की में बसा भारत का भूगोल, यहां मौसम के मिजाज से तय होता है चाय का स्वाद

जब मौसम बदलता है, तो इंसान की जरूरतें बदलती हैं और यही जरूरतें रसोई की हांडी से लेकर चाय की केतली तक का मिजाज तय करती हैं।

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भारत में चाय का अनोखा संसार (AI Generated and newsroom verified image)

आज नेशनल चाय डे है। भारत में हर साल यह खास दिन 21 सितंबर को सेलिब्रेट किया जाता है। दरअसल चाय हम भारतीयों के जीवन का बेहद खास हिस्सा है। हमारे लिए चाय एक जज्बात है, थकान मिटाने का नुस्खा है और अजनबियों को दोस्त बनाने की जादुई तरकीब भी है। मौक जो भी हो, चाय हमारी हर छोटी बड़ी खुशी में शामिल है। यहां चाय का संसार भी बेहद अनूठा है।

आम तौर पर जब भी हम चाय की बात करते हैं, तो हमारे जेहन में वही एक तस्वीर उभरती है- अदरक, इलायची, दूध और चीनी का संगम। पर जरा ठहरिए..अगर आप सोचते हैं कि भारत में चाय का दायरा सिर्फ इसी मीठे खांचे तक सीमित है, तो आप मुगालते में हैं। हमारे देश का मानचित्र जैसे-जैसे बदलता है, चाय का रंग, रूप और मिजाज भी बिल्कुल बदल जाता है। आइए, आपको भारत के सुदूर कोनों की एक ऐसी तिलिस्मी और गुमनाम सफर पर ले चलते हैं, जहां चाय का मतलब मिठास से बेहद परे है।

कश्मीर की नून चाय

कश्मीर की किसी पुरानी गली में सुबह-सुबह की चहल-पहल शुरू हो रही हो, चारों तरफ हल्की धुंध छाई हो और डल झील की लहरें अलसाई सी हों। ऐसे में कश्मीर का हर घर एक खास खुशबू से महक उठता है। यह खुशबू किसी इत्र की नहीं, वहां की मशहूर नून चाय की होती है।

आप पहली बार नून चाय देखेंगे, तो शायग हैरान रह जाएंगे। इसका रंग गहरा मरून या कड़क भूरा नहीं होता। इसकी रंगत बेहद खूबसूरत गुलाबी होती है। इसे बनाने का अंदाज भी किसी शहंशाह की फुरसत का तकाजा मांगता है। खास हरी चाय की पत्तियों को पानी, इलायची और चुटकी भर बेकिंग सोडा के साथ घंटों तक धीमी आंच पर खौलाया जाता है। बेकिंग सोडा और पत्तियों की इस जुगलबंदी से जो गहरा गाढ़ा अर्क निकलता है, उसमें जब दूध मिलाया जाता है, तो चाय का रंग खिलकर गुलाबी हो जाता है।

इस चाय की सबसे खास बात ये है कि इसमें चीनी की जगह डाला जाता है नमक। नमक को कई जगह नून भी कहा जाता है। इसी कारण से इस चाय का नाम नून चाय पड़ा। गर्म कांगड़ी को अपनी फेरन के नीचे छिपाए, कांदुर (कश्मीरी बेकरी) की कड़क बाकरखानी या लावासा ब्रेड को इस नमकीन, मलाईदार गुलाबी चाय में डुबोकर खाना कश्मीरियों के लिए कड़ाके की ठंड से मुकाबला करने की सदियों पुरानी ढाल है।

कश्मीर की नून चाय (Photo: Canva)

कश्मीर की नून चाय (Photo: Canva)

लद्दाख की गुर-गुर टी

अब कश्मीर से थोड़ा आगे बढ़ते हैं और चलते हैं लद्दाख की उन बुलंद चोटियों पर, जहां हवा भी सांसों में जमने लगती है और चारों तरफ सिर्फ नीले आसमान और सफेद बर्फ से ढके बंजर पहाड़ों का सन्नाटा होता है। लद्दाख की वादियों में इंसान को जिंदा रखने और हड्डियों में गर्मी फूंकने का काम करती है वहां की खास'गुर-गुर टी'। इसे स्थानीय भाषा में पो चा भी कहा जाता है।

यह चाय किसी आम पतीले में नहीं बनती। इसके लिए लकड़ी का एक लंबा, बेलनाकार बर्तन इस्तेमाल होता है जिसे 'चूर्न' कहते हैं। काली चाय की पत्तियों को घंटों उबालकर जब गाढ़ा अर्क तैयार होता है, तो उसे इस लकड़ी के चूर्न में उड़ेला जाता है। इसके बाद इसमें मिलाया जाता है चुटकी भर नमक, बेकिंग सोडा और सबसे खास चीज- याक का ताजा मक्खन।

जब लकड़ी के मथने से इस पूरे मिश्रण को जोर-जोर से मथा जाता है, तो उस बर्तन से गुर-गुर की आवाज निकलती है। इसी आवाज से इसका नाम पड़ा 'गुर-गुर टी'। याक का गाढ़ा मक्खन जब चाय में मिलता है तो यह लद्दाख की सूखी, बर्फीली हवाओं के सितम से भी बचाता है। वहां के वाशिंदों के लिए गुर-गुर टी चाय से ज्यादा एक सुरक्षा कवच का काम करती है।

हैदराबाद की ईरानी चाय

पहाड़ों की ठंडक से उतरकर अब चलते हैं दक्कन के दिल कहे जाने वाले नवाबों के शहर हैदराबाद में। यहां की हवाओं में बिरियानी की महक के साथ-साथ एक और खास खुशबू तैरती है। वो खुशबू है मशहूर ईरानी चाय की। 19वीं सदी में जब ईरान से पारसी और ईरानी व्यापारी भारत आए, तो अपने साथ चाय बनाने का एक ऐसा शाही और अनूठा अंदाज़ भी लाए जिसने हैदराबादी संस्कृति को हमेशा के लिए अपना दीवाना बना लिया।

आम तौर पर हम चाय बनाते वक्त दूध, पानी और पत्ती को एक ही बर्तन में उबाल देते हैं, लेकिन ईरानी चाय का कायदा बिल्कुल अलग है। यहां चाय पत्ती को पानी के साथ एक अलग बर्तन में रखकर भाप के ज़रिए उबाला जाता है। दूसरी तरफ, एक बड़े कड़ाहे में दूध को कई घंटों तक धीमी आंच पर कड़ाया जाता है, जब तक कि वह आधा और रबड़ी की तरह गाढ़ा न हो जाए।

जब आप चारमीनार के पास किसी पुराने कैफे में बैठकर ईरानी चाय मांगते हैं, तो प्याले में पहले गाढ़ा, मीठा दूध डाला जाता है और फिर ऊपर से कड़क चाय का डिक्शन उड़ेला जाता है। मस्का पाव को इस गाढ़ी चाय में डुबोकर खाना या उस्मानिया बिस्किट के साथ इसकी चुस्की लेना..आहा! ऐसा लगता है जैसे समय ठहर गया हो और आप किसी गुजरे हुए जमाने की तहजीब का हिस्सा बन गए हों।

नॉर्थ ईस्ट का सोंधा बांस

अब रुख करते हैं भारत के उस कोने का जहां से सूरज सबसे पहले भारत की धरती को छूता है- पूर्वोत्तर भारत। अरुणाचल प्रदेश और असम के हरे-भरे, घने जंगलों में बसने वाले जनजातीय समुदायों के लिए प्रकृति ही उनका घर है और प्रकृति ही उनकी रसोई। यहां चाय बनाने का जो तरीका ईजाद हुआ, वह किसी अजूबे से कम नहीं है। इसे स्थानीय लोग फालप या बंबू टी कहते हैं।

इस अनूठी चाय को बनाने के लिए चाय की ताजा पत्तियों को सुखाकर ताजे, हरे बांस के खोखले तनों के भीतर ठूंस-ठूंस कर भर दिया जाता है। इसके बाद बांस के तने को दोनों तरफ से बंद करके रसोई के चूल्हे की धीमी राख या सुलगती लकड़ी के धुएं के ठीक ऊपर हफ्तों के लिए लटका दिया जाता है।

अरुणाचल का फालप (AI Generated and newsroom verified image)

अरुणाचल का फालप (AI Generated and newsroom verified image)

बांस के भीतर मौजूद प्राकृतिक नमी और लकड़ी का धुआं धीरे-धीरे चाय की पत्तियों में समा जाता है। जब कई दिनों बाद बांस को छीलकर भीतर से जमी हुई चायपत्ती की गिट्टी निकाली जाती है और उसे पानी में उबाला जाता है, तो उससे जो खुशबू आती है उसमें सोंधी मिट्टी, ताजे बांस और सुलगती लकड़ी का एक ऐसा दुर्लभ स्मोकी फ्लेवर होता है, जो दुनिया के बड़े से बड़े फाइव स्टार होटल के टी-बैग्स को चुटकियों में मात दे दे।

काजीरंगा का जंगली नुस्खा

नॉर्थ ईस्ट की यात्रा तब तक अधूरी है जब तक हम असम के विश्व प्रसिद्ध काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की दलदली और सीलन भरी हवाओं का अनुभव न कर लें। गेंडे और हाथियों के इस गढ़ में मानसूनी सीलन और जंगलों की नमी से बचने के लिए स्थानीय लोग एक बेहद खास चाय पीते हैं। इस चाय को 'काजीरंगा स्पेशल टी' कहा जाता है।

यह चाय बाजार में मिलने वाली किसी मशीनी पत्ती से नहीं बनती। काजीरंगा की तलहटी में उगने वाले जैविक पौधों से हाथ से तोड़ी गई पत्तियों को बिना किसी दूध और चीनी के उबाला जाता है। लेकिन इसमें असली जादू डालती हैं जंगलों से चुनकर लाई गई जड़ी-बूटियां। इन बूटियों में जंगली तुलसी, अदरक, कड़क काली मिर्च, पिपली और सुगन्धित औषधीय पत्तियां शामिल होती हैं।

बिना दूध और चीनी की यह कड़क, तीखी और थोड़ी कड़वी चाय जब गले से नीचे उतरती है, तो पूरे शरीर में एक नई गर्माहट और ताजगी भर देती है। काजीरंगा के जंगलों में गश्त लगाने वाले वनकर्मियों के लिए यह चाय मौसमी बीमारियों, सर्दी और इंफेक्शन से लड़ने का कुदरती हथियार है।

भारत में चाय का अनूठा संसार

माना जाता है कि स्वाद कभी अचानक या हवा में पैदा नहीं होता। स्वाद तो उस मिट्टी की तासीर, उस इलाके की आबो-हवा और वहां के लोगों के जीने के अंदाज का आईना होता है। जब मौसम बदलता है, तो इंसान की जरूरतें बदलती हैं और यही जरूरतें रसोई की हांडी से लेकर चाय की केतली तक का मिजाज तय करती हैं।

जरा गहराई से सोचिए, लद्दाख और कश्मीर के जिन बर्फीले इलाकों में हाड़ कंपाने वाली ठंड पड़ती है, वहां शरीर को गर्मी के साथ कैलोरी और नमी की सख्त दरकार होती है। यही वजह है कि कुदरत की चुनौती से निपटने के लिए वहां की चाय में चीनी की जगह नमक, बेकिंग सोडा और याक का मक्खन घुल गया। वह मक्खन बर्फ में जमते खून को रवानी देने वाला ईंधन बना।

फोटो सोर्स: Canva

फोटो सोर्स: Canva

इसके ठीक उलट, जब आप दक्कन की तरफ बढ़ते हैं, तो हैदराबाद की गर्म और फुर्सत भरी हवाएं आपको धीमी जिंदगी का नशा चखाती हैं। वहां की ईरानी चाय में घंटों कढ़ा हुआ गाढ़ा दूध और भाप की मद्धम आंच पर पकती पत्ती चारमीनार की छांव में दोस्तों के साथ घंटों बैठने और गपशप लड़ाने का बहाना बनी।

पूर्वोत्तर के घने, नम और मानसूनी जंगलों में चले जाइए, तो वहां की सीलन भरे मौसम से लड़ने के लिए जनजातियों ने जंगलों के बांस और चूल्हे के धुएं को चाय में ढाल दिया। वहां धुएं का सोंधापन और जंगली जड़ी-बूटियां कुदरत के प्रकोप और बीमारियों के खिलाफ इंसानी शरीर की ढाल बनीं।

यही भारतीय चाय की दुनिया का असली सौंदर्य और तिलिस्म है। हमारी चाय भूगोल, मौसम और संस्कृति का बहता हुआ दस्तखत है। दुनिया भर में चाय शायद सिर्फ पत्तियों के उबलने का नाम हो, लेकिन भारत में यह एक ऐसी बहुरंगी कैनवास है जहां हर सौ किलोमीटर पर हवा के बदलने के साथ चाय की तासीर और तरीका भी बदल जाता है।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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