दिल्ली : हाई कोर्ट ने लोकपाल के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया है, जिसमें लोकपाल ने लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 की धारा 20(7) के तहत संबंधित पक्षों से जवाब मांगने के बाद मामले में आगे की जांच का निर्देश दिया था। जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेणु भटनागर की खंडपीठ ने पूर्व आईएएस अधिकारी और उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (डीपीआईआईटी) के पूर्व सचिव रमेश अभिषेक की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, लोकपाल और सीबीआई को नोटिस जारी किया। मामले की अगली सुनवाई पांच अगस्त को होगी।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव कुमार विरमानी ने अदालत को बताया कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने अपनी जांच पूरी कर ली थी और सक्षम विशेष अदालत के समक्ष क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करने की सिफारिश की थी। सीबीआई ने अपनी पूरक जांच रिपोर्ट में भी यही निष्कर्ष दोहराया था कि मामले में अभियोजन चलाने लायक कोई आधार नहीं है।
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याचिकाकर्ता का कहना है कि दोनों जांच रिपोर्टों पर विचार करने के बाद लोकपाल ने अधिनियम की धारा 20(7) के तहत प्रक्रिया अपनाते हुए याचिकाकर्ता और सक्षम प्राधिकारी से टिप्पणियां मांगी थीं। हालांकि, इन टिप्पणियों के प्राप्त होने के बाद वैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप आगे बढ़ने के बजाय लोकपाल ने सीबीआई को आगे की जांच करने का निर्देश दे दिया।
याचिका में कहा गया है कि एक बार धारा 20(7) के तहत निर्धारित प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद लोकपाल के पास आगे की जांच का आदेश देने का अधिकार नहीं था। याचिकाकर्ता ने लोकपाल के आदेश को कानून के विपरीत बताते हुए उसे रद्द करने की मांग की है। याचिका में यह अहम कानूनी सवाल उठाया गया है कि धारा 20(7) के तहत पूरी प्रक्रिया पूरी होने के बाद लोकपाल के अधिकार क्षेत्र की सीमा क्या है और संबंधित पक्षों की टिप्पणियां प्राप्त करने के बाद आगे की जांच का निर्देश देना कितना वैध है।
रमेश अभिषेक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव कुमार विरमानी ने पैरवी की। उनके साथ संदीप कपूर, ताहिरा करंजावाला, निहारिका करंजावाला, अर्जुन सुरजेवाला, सृष्टि अग्रवाल और राहुल अग्रवाल भी मौजूद रहे। वहीं, लोकपाल की ओर से केंद्र सरकार की वकील लावण्या कौशिक ने पक्ष रखा, जबकि सीबीआई की ओर से स्थायी वकील विक्रांत पचनंदा अदालत में पेश हुए।
लोकपाल की शक्तियों के दायरे को लेकर बेहद अहम है सुनवाई
इस मामले की सबसे बड़ी कानूनी अहमियत यह है कि दिल्ली हाई कोर्ट को यह तय करना है कि लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 की धारा 20(7) के तहत एक बार जांच रिपोर्ट आने और संबंधित पक्षों से जवाब मांगने की प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद क्या लोकपाल के पास दोबारा जांच का आदेश देने की शक्ति बचती है या नहीं। याचिकाकर्ता का कहना है कि धारा 20(7) एक अंतिम चरण है, जिसमें लोकपाल को उपलब्ध रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारियों की टिप्पणियों के आधार पर फैसला लेना होता है। ऐसे में इस स्तर पर सीबीआई को फिर से जांच का आदेश देना कानून के दायरे से बाहर हो सकता है।
इस सुनवाई का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इसका असर सिर्फ रमेश अभिषेक के मामले तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में लोकपाल की शक्तियों और उसकी अधिकार-सीमा को भी स्पष्ट करेगा। अगर अदालत यह मान लेती है कि धारा 20(7) के बाद भी लोकपाल अतिरिक्त जांच का आदेश दे सकता है, तो भ्रष्टाचार के मामलों में लोकपाल का दायरा और व्यापक हो जाएगा। वहीं, अगर अदालत याचिकाकर्ता की दलील से सहमत होती है, तो यह तय हो जाएगा कि वैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद लोकपाल को केवल कानून में तय विकल्पों के अनुसार ही आगे बढ़ना होगा और वह जांच एजेंसियों को अनिश्चितकाल तक दोबारा जांच के निर्देश नहीं दे सकेगा।
