बिहार के सारण जिले के मढ़ौरा प्रखंड के जवईनियां गांव से एक ऐसी खबर सामने आई है, जो इंसानियत को भी झकझोर देने वाली है। यहां एक गरीब महिला की मौत के बाद उसकी अर्थी को कंधा देने और श्मशान पहुंचाने न कोई रिश्तेदार आया,न पड़ोसी और न ही गांव के लोग। आखिरकार उनकी बेटियों ने मां की अर्थी उठाई और मुखाग्नि दी। इस मामले ने इंसानियत पर एक सवाल खड़ा कर दिया है और सोंचने पर मजबूर कर दिया है कि हम किस तरह के समाज का निर्माण कर रहे हैं। अब सवाल है कि क्या गरीबी इंसान को इतना अकेला कर देती है कि मृत्यु के समय भी कोई साथ न दे? क्या समाज की संवेदना केवल सुख और समृद्धि तक सीमित रह गई है?
डेढ़ साल पहले पिता और अब मां का निधन
बताया जाता है कि कुछ दिन पहले बबीता देवी का निधन हो गया। डेढ़ साल पहले ही उनके पति रविंद्र सिंह की मौत हो चुकी थी। पति के जाने के बाद से ही परिवार आर्थिक तंगी में डूबा हुआ था। रोजमर्रा की जरूरतों के लिए संघर्ष कर रही बबीता देवी किसी तरह बेटियों को पाल रही थीं। लेकिन गरीबी ऐसी कि समाज ने धीरे-धीरे इस परिवार से दूरी बना ली।जब बबीता देवी की मौत हुई,तो गांव में सन्नाटा छा गया। न कोई मदद के लिए आया,न किसी ने पूछना जरूरी समझा कि अब घर में कौन बचा है। इसके बाद बेटियां ही मां की अर्थी उठा कर श्मशान पहुंची और कांपते हाथों से उन्होंने मुखाग्नि दी।
मां की तेरहवीं के लिए दर-दर भटक रही हैं बेटियां
अंतिम संस्कार के बाद भी बेटियों की मुश्किलें खत्म नहीं हुईं। वे अब मां की तेरहवीं के लिए दर-दर भटक रही हैं। घर में पैसे नहीं, कोई सहारा नहीं और कोई मदद करने वाला भी नहीं। अब उनकी उम्मीद प्रशासन और समाज की ओर है, ताकि वे मां का श्राद्ध कर सकें। अब उन्हें प्रशासन से ही मदद की दरकार है।
