साल 2020 में दिल्ली में हुए दंगों से जुड़े मामले में अदालत ने हत्या,दंगा और डकैती समेत कई आरोपों का सामना कर रहे 12 लोगों को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को केवल इस आधार पर आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता कि वह किसी गैरकानूनी भीड़ या जमावड़े का हिस्सा था। इसके लिए उसके व्यक्तिगत कृत्य और अपराध में भूमिका को साबित करना जरूरी है।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीण सिंह ने 25 अगस्त को दिए अपने आदेश में लोकश सोलंकी, पंकज शर्मा, अंकित चौधरी, प्रिंस, जतिन शर्मा, हिमांशु ठाकुर, विवेक पंचाल, ऋषभ चौधरी, सुमित चौधरी, टिंकू अरोड़ा, संदीप और साहिल को इस मामले में बरी किया।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला मुर्सलीन की हत्या से जुड़ा था। 28 फरवरी 2020 को उत्तर-पूर्वी दिल्ली के जोहरीपुर तिराहे के पास एक नाले से उसका शव बरामद हुआ था। अभियोजन पक्ष ने इन 12 लोगों पर दंगों के दौरान हत्या, दंगा, डकैती और अन्य अपराधों में शामिल होने के आरोप लगाए थे।अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष को प्रत्येक आरोपी के खिलाफ उन विशिष्ट कृत्यों को साबित करना था, जिनके आधार पर उस पर अपराध का आरोप लगाया गया था। केवल किसी कथित भीड़ का सदस्य होना अपने आप में दोष साबित नहीं करता।
कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि गैरकानूनी जमावड़े में शामिल व्यक्ति पर उसी स्थिति में संबंधित आपराधिक जिम्मेदारी डाली जा सकती है,जब उसके व्यक्तिगत कृत्य या अपराध में उसकी भूमिका का पर्याप्त सबूत हो। इस दौरान कोर्ट ने साफ कहा कि केवल भीड़ का हिस्सा होने के आधार पर किसी व्यक्ति पर ऐसी जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती,खासकर जब उसके खिलाफ कोई विशिष्ट आपराधिक कृत्य साबित न हो।
मुख्य गवाह ही मुकर गया
मामले में अभियोजन पक्ष को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब उसका प्रमुख गवाह दिवेश राजपूत,जिसे मुर्सलीन की हत्या का प्रत्यक्षदर्शी बताया गया था, वो अपने बयान से मुकर गया। अभियोजन पक्ष ने जिरह के दौरान उससे पूछताछ की,लेकिन अदालत के मुताबिक उसकी गवाही से ऐसा कोई ठोस संबंध स्थापित नहीं हो सका,जिससे आरोपियों को कथित गैरकानूनी भीड़ या मुर्सलीन की हत्या से जोड़ा जा सके।
सिर्फ नाम पुकारे जाने से पहचान साबित नहीं होती
अदालत ने पुलिस के एक गवाह की गवाही पर भी भरोसा नहीं किया। यह गवाह भीड़ में मौजूद लोगों की पहचान नहीं कर सका था। कोर्ट ने कहा कि भीड़ में किसी आरोपी का नाम पुकारे जाने की बात सुन लेना सकारात्मक पहचान का पर्याप्त आधार नहीं है। सिर्फ नाम सुने जाने से यह साबित नहीं होता कि संबंधित व्यक्ति ही मौके पर मौजूद था या उसने अपराध किया था।
हिमांशु ठाकुर को एक मामले में दोषी ठहराया
हालांकि,अदालत ने हिमांशु ठाकुर को पूरी तरह बरी नहीं किया। उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 411 के तहत दोषी ठहराया गया। अदालत ने पाया कि मुर्सलीन का मोबाइल फोन हिमांशु ठाकुर के कब्जे से बरामद हुआ था और वह उस फोन में सिम कार्ड का इस्तेमाल कर रहा था। इस आधार पर उसे चोरी की संपत्ति रखने से संबंधित अपराध में दोषी करार दिया गया।
