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Zomato का बड़ा झटका! LPG संकट के बाद अब ऑनलाइन खाना मंगाना हुआ महंगा

एलपीजी संकट के बीच जोमैटो ने अपने ग्राहकों को बड़ा झटका दिया है। जोमैटो ने 6 महीने में दूसरी बार प्लेटफार्म फीस में 19.2% की बढ़ोतरी की है। प्लेटफॉर्म फीस वह चार्ज होता है जो कंपनी ऐप के रखरखाव और अपनी सेवाओं को जारी रखने के लिए ग्राहकों से वसूलती है। यह चार्ज खाने की कीमत, जीएसटी और डिलीवरी पार्टनर फीस से अलग होता है।

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ऑनलाइन खाना ऑर्डर करने वालों के लिए एक बुरी खबर है। देश की दिग्गज फूड डिलीवरी कंपनी Zomato ने एक बार फिर अपने 'प्लेटफॉर्म शुल्क' (Platform Fee) में बढ़ोतरी कर दी है। कंपनी ने हर ऑर्डर पर ली जाने वाली इस फीस को ₹12.50 से बढ़ाकर ₹14.90 कर दिया है। यानी अब आपको हर बार खाना मंगाने पर ₹2.40 अतिरिक्त चुकाने होंगे। यह ध्यान देने वाली बात है कि यह कीमत 'प्री-जीएसटी' (Pre-GST) है, जिसका मतलब है कि टैक्स जुड़ने के बाद यह राशि और भी बढ़ जाएगी। सितंबर 2025 में हुई पिछली बढ़ोतरी के बाद यह कुछ ही महीनों के भीतर फीस में किया गया एक और बड़ा इजाफा है।

बता दें कि इस बढ़ोतरी के साथ 19.2% महंगी हुई है प्लेटफॉर्म फीस। प्लेटफॉर्म फीस वह चार्ज होता है जो कंपनी ऐप के रखरखाव और अपनी सेवाओं को जारी रखने के लिए ग्राहकों से वसूलती है। यह चार्ज खाने की कीमत, जीएसटी और डिलीवरी पार्टनर फीस से अलग होता है।

स्विगी पर कितना लग रहा चार्ज

दिलचस्प बात यह है कि जोमैटो की सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी कंपनी Swiggy भी इसी राह पर चल रही है। स्विगी फिलहाल टैक्स के साथ लगभग ₹14.99 का प्लेटफॉर्म शुल्क वसूल रही है। आमतौर पर देखा गया है कि जब भी इन दोनों में से कोई एक कंपनी फीस बढ़ाती है, तो दूसरी कंपनी भी जल्द ही अपनी कीमतें उसी स्तर पर ले आती है। प्लेटफॉर्म शुल्क वह चार्ज होता है जो रेस्टोरेंट के बिल और डिलीवरी पार्टनर की फीस के अलावा लिया जाता है। कंपनियां इसका इस्तेमाल अपने ऐप के रखरखाव, टेक्नोलॉजी को बेहतर बनाने और डिलीवरी नेटवर्क को सुचारू रूप से चलाने के नाम पर करती हैं। हालांकि, ग्राहकों के लिए यह किसी 'साइलेंट टैक्स' से कम नहीं है, क्योंकि छोटे ऑर्डर्स पर यह फीस बिल का एक बड़ा हिस्सा बन जाती है।

2.40 पैसे बढ़ने से कंपनी को कितना फायदा होगा?

जोमैटो द्वारा प्लेटफॉर्म फीस में की गई मामूली दिखने वाली ₹2.40 की बढ़ोतरी असल में कंपनी के लिए 'करोड़ों का खेल' है। अगर हम जोमैटो के रोजाना के औसतन 20 से 25 लाख ऑर्डर्स देखते हैं तो यह आंकड़ा हैरान कर देने वाला है। हर रोज ₹2.40 एक्स्ट्रा वसूलने का मतलब है कि कंपनी हर रोज ₹40 लाख से ₹50 लाख की अतिरिक्त कमाई कर रही है। यह वह पैसा है जो सीधे कंपनी के मुनाफे में जुड़ता है क्योंकि इसके लिए उसे कोई अलग से सर्विस नहीं देनी पड़ रही।

अगर इसी कैलकुलेशन को मासिक (Monthly) आधार पर देखें, तो यह आंकड़ा और भी बड़ा हो जाता है। महीने के 30 दिनों के हिसाब से जोमैटो केवल इस ₹2 की बढ़ोतरी से हर महीने ₹12 करोड़ से ₹15 करोड़ का एक्स्ट्रा रेवेन्यू (राजस्व) इकट्ठा कर रही है। साल भर में यह रकम ₹144 करोड़ से ₹180 करोड़ तक पहुंच सकती है।

क्यों बढ़ रही हैं लगातार कीमतें

लगातार बढ़ती इस फीस के कारण अब घर बैठे खाना मंगाना एक लग्जरी बनता जा रहा है। एक तरफ जहां पेट्रोल-डीजल और कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से रेस्टोरेंट्स अपने खाने के दाम बढ़ा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ डिलीवरी ऐप्स के ये 'एक्स्ट्रा चार्जेस' आम आदमी के बजट को बिगाड़ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जोमैटो और स्विगी जैसी कंपनियां अब डिस्काउंट देने के बजाय अपनी कमाई के नए जरिए ढूंढ रही हैं। जो ग्राहक रोजाना या अक्सर बाहर से खाना मंगाते हैं, उनके लिए महीने का कुल खर्च अब काफी ज्यादा बढ़ जाएगा।

Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठीauthor

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिचा, पर्सनल फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, टैक्स प्लानिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। अब तक 8,000 से अधिक कंटेंट लिख चुकी रिचा की विशेषता है—जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाना। वह ऐसी स्टोरीज तैयार करती हैं जो न केवल जानकारीपूर्ण होती हैं, बल्कि आम पाठक की वित्तीय समझ को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं।

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