New Trump Tariffs : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के प्रशासन ने भारत समेत 16 प्रमुख व्यापारिक साझेदार देशों की व्यापार नीतियों की नई जांच शुरू की है। इस जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या ये देश ऐसी नीतियां अपना रहे हैं जो अमेरिकी व्यापार के लिए अनुचित मानी जा सकती हैं। अगर जांच में ऐसे संकेत मिलते हैं कि किसी देश की नीतियां अमेरिकी उद्योग को नुकसान पहुंचा रही हैं, तो अमेरिका उन देशों पर अतिरिक्त टैरिफ (आयात शुल्क) या अन्य व्यापारिक प्रतिबंध लगा सकता है। इस कदम से आने वाले महीनों में वैश्विक व्यापार संबंधों पर असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।
किस कानून के तहत हो रही है जांच
यह जांच अमेरिका के व्यापार कानून के तहत की जा रही है जिसे Section 301 of the Trade Act of 1974 कहा जाता है। यह प्रावधान अमेरिकी सरकार को यह अधिकार देता है कि वह दूसरे देशों की व्यापार नीतियों की जांच करे और यदि वे नीतियां अमेरिकी व्यापार के लिए हानिकारक पाई जाती हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई कर सके। इस कानून के तहत अमेरिका उन नीतियों को चुनौती दे सकता है जो व्यापार समझौतों का उल्लंघन करती हैं या अमेरिकी कंपनियों के लिए अनुचित प्रतिस्पर्धा पैदा करती हैं।
कौन करेगा जांच और कैसे चलेगी प्रक्रिया
इस जांच को अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय यानी Office of the United States Trade Representative (USTR) द्वारा संचालित किया जाएगा। जांच की प्रक्रिया में कई चरण होते हैं। सबसे पहले जांच की औपचारिक शुरुआत की जाती है। इसके बाद संबंधित देशों की सरकारों से बातचीत की जाती है। साथ ही उद्योग जगत और अन्य हितधारकों से सार्वजनिक टिप्पणियां मांगी जाती हैं। इस मामले में 15 अप्रैल तक लोगों से राय मांगी जाएगी और 5 मई के आसपास सार्वजनिक सुनवाई होने की उम्मीद है। इसके बाद समिति अपनी सिफारिश तैयार करेगी और अंतिम फैसला लिया जाएगा। आमतौर पर ऐसी जांच को पूरा होने में लगभग एक साल तक का समय लग सकता है।
जांच के दायरे में कौन-कौन से देश
इस नई जांच में कुल 16 अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। इनमें प्रमुख रूप से चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और मेक्सिको शामिल हैं। इसके अलावा यूरोपीय संघ, वियतनाम, थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, ताइवान और कंबोडिया भी इस लिस्ट में हैं। अमेरिका इन देशों में औद्योगिक उत्पादन क्षमता, सरकारी सब्सिडी, मुद्रा नीति, श्रम मानकों और पर्यावरण से जुड़ी नीतियों की जांच करेगा।
जांच शुरू करने की वजह क्या है
इस जांच के पीछे एक अहम वजह हाल ही में अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय का फैसला है। अमेरिका की सर्वोच्च अदालत ने फरवरी में ट्रंप प्रशासन के एक बड़े टैरिफ कार्यक्रम के हिस्से को रद्द कर दिया था। यह कार्यक्रम आपातकालीन शक्तियों के तहत लागू किया गया था। अदालत के फैसले के बाद प्रशासन ने वैकल्पिक कानूनी रास्ते तलाशने शुरू किए, जिनमें सेक्शन 301 भी शामिल है। इसी के तहत अब नए सिरे से यह व्यापक जांच शुरू की गई है।
अगर उल्लंघन मिला तो क्या होगा
अगर जांच में यह पाया जाता है कि किसी देश की नीतियां अमेरिकी व्यापार के लिए अनुचित हैं या व्यापार को नुकसान पहुंचाती हैं, तो अमेरिका कई तरह की कार्रवाई कर सकता है। इसमें आयात पर अतिरिक्त टैरिफ लगाना, व्यापारिक रियायतें खत्म करना या नए समझौते के लिए दबाव बनाना शामिल हो सकता है। कई मामलों में जांच के बाद संबंधित देशों के साथ बातचीत भी होती है और समझौते के जरिए विवाद को सुलझाने की कोशिश की जाती है।
पहले भी इस्तेमाल हो चुका है सेक्शन 301
सेक्शन 301 का इस्तेमाल पहले भी कई बार किया जा चुका है। खास तौर पर 2018 में ट्रंप प्रशासन ने चीन के खिलाफ इसी प्रावधान के तहत कार्रवाई की थी। उस समय लगभग 370 अरब डॉलर के चीनी सामान पर 25 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया गया था। यह कदम तकनीक हस्तांतरण और बौद्धिक संपदा से जुड़े विवादों के कारण उठाया गया था। इसके अलावा 2020 में यूरोपीय संघ के साथ विमान सब्सिडी विवाद के मामले में भी अमेरिका ने टैरिफ लगाए थे।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला
भारत के लिए यह जांच इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका उसका एक बड़ा व्यापारिक साझेदार है। अगर जांच के बाद भारत की किसी नीति को अनुचित माना जाता है तो भारतीय उत्पादों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाया जा सकता है। इसका असर खास तौर पर भारत के निर्यात और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर पड़ सकता है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि अक्सर ऐसी जांच के बाद देशों के बीच बातचीत होती है और कई मामलों में समझौते के जरिए समाधान निकाल लिया जाता है। इसलिए आने वाले महीनों में अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक वार्ताओं पर भी नजर रहेगी।
