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क्या सच में टूटता है इंसान का दिल? जानिए 'दिल टूटने' पर क्या कहता है मेडिकल साइंस

मेडिकल साइंस और कार्डियोलॉजी इस बात की तस्दीक करता है कि दिल टूटना सिर्फ भावनाओं का आहत होना भर नहीं है। दिल टूटने का असर इंसान के शरीर में मौजूद हृदय पर भी पड़ता है।

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जब दिल टूटता है तो क्या शरीर में क्या होता है (Photo: iStock)

हम अपने आसपास अकसर लोगों से दिल टूटने जैसी बातें सुनते हैं। किसी का प्यार में दिल टूटता है तो किसी का दोस्ती में तो किसी का दिल उसके परिवार के लोग तोड़ देते हैं। शायरी और साहित्य की दुनिया में तो इस 'दिल टूटने' को बखूबी बयां किया जाता रहा है। यहां दिल टूटने का मतलब इंसान का भावनात्मक तौर पर बुरी तरह से बिखर जाना होता है। वैसे क्या दिल टूटने का असर सिर्फ भावनात्मक होता है या इसका असर सच में हमारे शरीर या फिर हृदय पर भी पड़ता है?

मेडिकल साइंस और कार्डियोलॉजी इस बात की तस्दीक करता है कि दिल टूटना सिर्फ भावनाओं का आहत होना भर नहीं है। दिल टूटने का असर इंसान के शरीर में मौजूद हृदय पर भी पड़ता है। चिकित्सा विज्ञान की दुनिया में इसे ताकोत्सुबो कार्डियोमायोपैथी (Takotsubo Cardiomyopathy) या आम बोलचाल में ब्रोकन हार्ट सिंड्रोम कहा जाता है।

दिल से जुड़ी हैं भावनाएं

जब कोई इंसान किसी बहुत बड़े भावनात्मक सदमे से गुजरता है या फिर दिल टूट जाना महसूस करता है तो उसका दिमाग इस तनाव को एक बड़े खतरे के रूप में देखता है। तनाव के इस चरम क्षण में उसका शरीर अचानक फ्लाइट मोड में चला जाता है। इस परिस्थिति में एड्रेनालाईन और कॉर्टिसोल जैसे स्ट्रेस हार्मोन्स हमारे खून में तेजी से बहने लगते हैं।

इन स्ट्रेस हार्मोन्स का यह अचानक उछाल दिल की मांसपेशियों के लिए जहर की तरह काम करता है। इसके कारण दिल का मेन पंपिंग चैंबर (बायां वेंट्रिकल) अचानक गुब्बारे की तरह फूल जाता है और उसका निचला हिस्सा अस्थायी रूप से काम करना बंद या धीमा कर देता है। नतीजा ये होता है कि उस इंसान को ठीक वैसा ही भयानक दर्द महसूस होता है जैसा कि असली हार्ट अटैक में होता है।

ऑक्टोपस के बर्तन से मिला ताकोत्सुबो नाम

इस बीमारी का नाम ताकोत्सुबो कैसे पड़ा, इसकी कहानी भी बेहद दिलचस्प है। साल 1990 में जापान के प्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. हिकारू सातो और उनकी टीम ने पहली बार इस स्थिति की पहचान की थी।

उन्होंने रिसर्च में पाया कि बहुत ज्यादा तनाव के बाद मरीजों के दिल का बायां हिस्सा एक खास आकार में सूज जाता था। यह आकार जापान में ऑक्टोपस पकड़ने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले एक मिट्टी के बर्तन जैसा दिखता था, जिसे जापानी भाषा में ताकोत्सुबो कहा जाता है।

जापानी शोधकर्ताओं ने पाया कि दिल की धमनियों में कोई ब्लॉकेज न होने के बावजूद, केवल मानसिक आघात के कारण दिल का आकार बदल गया और उसकी पंपिंग एबिलिटी घट गई थी। इस रिसर्च के बाद से ही दिल टूटने का मानव हृदय पर पड़ने वाले असर को ताकोत्सुबो कहा जाने लगा।

ब्रोकन हर्ट सिंड्रोम (Photo: iStock)

ब्रोकन हर्ट सिंड्रोम (Photo: iStock)

क्या कहते हैं वैज्ञानिक शोध और विशेषज्ञ?

अमेरिकी कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. स्टीफन सिनात्रा ने अपनी फेमस बुक 'द हार्ट फाइट' और अपने शोध पत्रों में मनोहृदय रोग विज्ञान (साइको कार्डियोलॉजी) पर विस्तार से लिखा है। डॉ. सिनात्रा के अनुसार:

'हमारा दिल केवल खून पंप करने वाली कोई मोटर नहीं है। यह शरीर का सबसे संवेदनशील भावनात्मक अंग है। जब मन गहरे दुख या भय का अनुभव करता है, तो नर्वस सिस्टम के माध्यम से दिल को सीधे रासायनिक संदेश भेजे जाते हैं। भावनाएं सीधे तौर पर बायोकेमिस्ट्री में बदल जाती हैं।'

इसके अलावा, 'न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन' (NEJM) में प्रकाशित एक लैंडमार्क स्टडी में भी यह बात सामने आई थी कि अत्यधिक भावनात्मक तनाव के बाद स्ट्रेस हार्मोन्स का स्तर सामान्य हार्ट अटैक के मरीजों की तुलना में 7 से 34 गुना तक अधिक पाया गया। यह साबित करता है कि गहरा मानसिक आघात से दिल की मांसपेशियां कुछ समय के लिए स्तब्ध हो जाती हैं।

दिल टूटना और दिल का दौरा पड़ने में होता है अंतर (Photo: iStock)

दिल टूटना और दिल का दौरा पड़ने में होता है अंतर (Photo: iStock)

हार्ट अटैक और ताकोत्सुबो में अंतर

ऊपरी तौर पर दोनों के लक्षण बिल्कुल एक जैसे लगते हैं। सीने में तेज जकड़न और दर्द, सांस लेने में भारी तकलीफ, अचानक ठंडा पसीना आना और चक्कर आना। हालांकि एंजियोग्राफी में सब साफ हो जाता है। सामान्य हार्ट अटैक में दिल की नसों में थक्का या कोलेस्ट्रॉल का ब्लॉकेज मिलता है, जबकि ब्रोकन हार्ट सिंड्रोम में नसें बिल्कुल साफ होती हैं। इससे भी ये साबित होता है कि समस्या ब्लॉकेज के साथ ही स्ट्रेस हार्मोन्स से मांसपेशी के अस्थायी रूप से पंगु हो जाने की भी होती है।

राहत की बात यह है कि ज्यादातर मामलों में ताकोत्सुबो या ब्रोकन हार्ट सिंड्रोम जानलेवा नहीं होता। सही माहौल, अपनों का साथ और थोड़ी सी डॉक्टरी देखभाल से दिल की मांसपेशियां कुछ हफ्तों में धीरे-धीरे अपने पुराने आकार और व्यवहार में लौट आती हैं।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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