Gold ETF vs Physical Gold vs NSE EGR : सोना सिर्फ गहनों तक सीमित नहीं रहा। अब निवेशक Gold ETF, डिजिटल गोल्ड और फिजिकल गोल्ड के बीच चुनाव कर रहे हैं। इसी बीच NSE ने Electronic Gold Receipt यानी EGR ट्रेडिंग शुरू कर दी है। यह ऐसा मॉडल है जिसमें ETF जैसी ट्रेडिंग और फिजिकल गोल्ड जैसी डिलीवरी दोनों का फायदा मिल सकता है।
आखिर क्या है EGR?
EGR यानी इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट एक डिजिटल सर्टिफिकेट है, जो असली सोने के बदले जारी किया जाता है। यह सोना SEBI रेगुलेटेड वॉल्ट में रखा जाता है और उसका इलेक्ट्रॉनिक रिसीट निवेशक के डिमैट अकाउंट में दिखाई देता है। ठीक वैसे ही जैसे शेयर या ETF होल्डिंग दिखती है। इसमें 100 मिलीग्राम से लेकर 1 किलो तक के यूनिट उपलब्ध हैं। यानी छोटे निवेशक भी इसमें एंट्री ले सकते हैं।
कैसे EGR दोनों हाथों में लड्डू?
EGR को बाजार में इसलिए खास माना जा रहा है क्योंकि यह Gold ETF और फिजिकल गोल्ड के बीच का गैप भरने की कोशिश करता है। Gold ETF में आपको सिर्फ गोल्ड की कीमत का एक्सपोजर मिलता है। आप चाहें तो ETF यूनिट को असली सोने में बदल नहीं सकते। वहीं फिजिकल गोल्ड में मेकिंग चार्ज, स्टोरेज और शुद्धता का जोखिम रहता है। लेकिन, EGR में आप पहले डिजिटल तरीके से ट्रेड कर सकते हैं और बाद में चाहें तो उसे असली गोल्ड बार या कॉइन में कन्वर्ट भी करा सकते हैं।
ETF से बाहर क्यों नहीं आ रहे?
असल चुनौती EGR की लोकप्रियता है। पिछले कुछ सालों में Gold ETF का AUM 1.78 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है और अप्रैल 2026 में ही इसमें 3,040 करोड़ रुपये का निवेश आया। दूसरी तरफ EGR अभी शुरुआती दौर में है और ट्रेडिंग वॉल्यूम काफी कम है। कम लिक्विडिटी की वजह से इसमें Bid-Ask Spread ज्यादा रहता है। यानी खरीद और बिक्री कीमत में अंतर ज्यादा हो सकता है। यही वजह है कि कई निवेशक अभी भी ETF को ज्यादा आसान और सस्ता विकल्प मानते हैं।
GST में बड़ा फर्क
फिजिकल गोल्ड खरीदने पर सीधे 3% GST देना पड़ता है। EGR में एक्सचेंज पर खरीदारी करते समय यह GST नहीं लगता। यही इसकी बड़ी ताकत मानी जा रही है। हालांकि, इसमें ब्रोकरेज, डिमैट और स्टोरेज चार्ज लग सकते हैं। अगर बाद में आप फिजिकल गोल्ड की डिलीवरी लेते हैं, तब 3% GST और डिलीवरी चार्ज देना होगा।
टैक्स नियम भी समझ लें
EGR को टैक्स के लिहाज से लिस्टेड सिक्योरिटी (Listed Security) माना गया है। अगर 12 महीने से पहले बेचते हैं तो शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन (STCG) लगेगा और आपकी टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स देना होगा। 12 महीने बाद बेचने पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) टैक्स 12.5% लगेगा, लेकिन इसमें इंडेक्सेशन का फायदा नहीं मिलेगा। अच्छी बात यह है कि EGR को फिजिकल गोल्ड में बदलने पर कैपिटल गेन नहीं लगता।
क्या बदल जाएगा गोल्ड निवेश का खेल?
EGR भारत के गोल्ड मार्केट को ज्यादा रेगुलेटेड, ट्रांसपेरेंट और स्टैंडर्डाइज्ड बनाने की कोशिश है। खासकर उन निवेशकों के लिए जो डिजिटल तरीके से गोल्ड रखना चाहते हैं लेकिन जरूरत पड़ने पर फिजिकल डिलीवरी का विकल्प भी चाहते हैं। हालांकि, इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि आने वाले समय में इसमें लिक्विडिटी कितनी बढ़ती है और कितने ब्रोकर्स इसे बड़े स्तर पर उपलब्ध कराते हैं। फिलहाल जिन निवेशकों को सिर्फ गोल्ड की कीमत में निवेश चाहिए, उनके लिए Gold ETF अब भी ज्यादा आसान और कॉस्ट-इफेक्टिव विकल्प माना जा रहा है।
डिस्क्लेमर: TimesNow Navbharat किसी स्टॉक, म्यूचुअल फंड, आईपीओ में निवेश की सलाह नहीं देता है। यहां पर केवल जानकारी दी गई है। निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार की राय जरूर लें।
