बिजनेस

फिजिकल , ETF, SGB और पुश्तैनी कौन सा सोना पड़ता है महंगा, कहां देना पड़ता है ज्यादा टैक्स?

सोने में निवेश करते समय टैक्स नियम समझना जरूरी है। फिजिकल गोल्ड, गोल्ड ETF, सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड और विरासत में मिले सोने पर अलग टैक्स लगता है। सही विकल्प चुनकर निवेशक टैक्स बचत के साथ बेहतर रिटर्न और सुरक्षित दीर्घकालिक संपत्ति बना सकते हैं भविष्य के लिए मजबूत आधार भी।

Physical gold vs etf vs sgb vs jwellery

कौनसा सोना बेचना महंगा

Gold taxation: भारत में सोना निवेश और परंपरा दोनों का हिस्सा है, लेकिन हर फॉर्म में गोल्ड खरीदने और बेचने पर टैक्स नियम अलग हैं। सिर्फ सोने का रिटर्न ही नहीं, बल्कि निवेश का तरीका भी आपकी नेट कमाई तय करता है। जबकि, कई निवेशक सिर्फ रिटर्न पर ध्यान देते हैं, लेकिन टैक्स का असर असल कमाई को बदल देता है। इसलिए यह समझना जरूरी है कि फिजिकल गोल्ड, गोल्ड ETF, सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) या विरासत में मिले सोने पर टैक्स कैसे लगता है।

सोने के गहने, सिक्के या डिजिटल गोल्ड खरीदने पर 3% GST देना पड़ता है। अगर ज्वेलरी खरीद रहे हैं तो मेकिंग चार्ज पर अतिरिक्त 5% GST भी लगता है, जिससे कुल लागत और बढ़ जाती है। वहीं गोल्ड ETF और सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड खरीदते समय GST नहीं लगता, इसलिए एंट्री लेवल पर ये ज्यादा टैक्स एफिशिएंट विकल्प माने जाते हैं। इस तरह टैक्स एफिशिएंसी के लिहाज से गोल्ड ETF और SGB, पारंपरिक सोने की खरीद की तुलना में ज्यादा फायदेमंद विकल्प साबित हो सकते हैं। सही विकल्प चुनने से रिटर्न पर टैक्स का असर कम किया जा सकता है।

गोल्ड बेचने पर टैक्स नियम

अगर सोना खरीदने के 24 महीने के भीतर बेचते हैं तो मुनाफा शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन माना जाएगा और उस पर आपके इनकम टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स लगेगा। अगर होल्डिंग पीरियड दो साल से ज्यादा है तो इसे लॉन्ग टर्म गेन माना जाता है और इस पर 12.5% टैक्स देना होता है, जिसमें इंडेक्सेशन का फायदा नहीं मिलता।

गोल्ड ETF में टैक्स का फायदा कहां?

गोल्ड ETF के मामले में लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन की अवधि केवल 12 महीने है, जो फिजिकल गोल्ड से कम है। यानी एक साल से ज्यादा होल्डिंग के बाद बेचने पर केवल 12.5% LTCG टैक्स देना पड़ता है, जबकि एक साल से पहले बेचने पर मुनाफा स्लैब रेट के अनुसार टैक्सेबल होता है।

SGB पर कैसे लगता है टैक्स

सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड पर मिलने वाला सालाना ब्याज आपकी टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्सेबल रहता है। हालांकि, अगर निवेशक ने बॉन्ड को प्राइमरी इश्यू में खरीदा और मैच्योरिटी तक होल्ड किया, तो कैपिटल गेन पूरी तरह टैक्स फ्री रहता है। लेकिन सेकेंडरी मार्केट से खरीदे गए बॉन्ड या मैच्योरिटी से पहले बेचने पर कैपिटल गेन टैक्स देना पड़ता है।

निवेश का तरीकाखरीद पर टैक्सलॉन्ग टर्म की अवधिबेचने पर टैक्सखास टैक्स पॉइंट
फिजिकल गोल्ड / ज्वेलरी / डिजिटल गोल्ड3% GST, ज्वेलरी पर मेकिंग चार्ज पर 5% GST24 महीने2 साल के बाद 12.5% LTCG, उससे पहले स्लैब रेटएंट्री कॉस्ट ज्यादा
गोल्ड ETFGST नहीं12 महीने1 साल बाद 12.5% LTCG, पहले स्लैब रेटफिजिकल गोल्ड से जल्दी LTCG का फायदा
सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB)GST नहींमैच्योरिटी पर टैक्स फ्री (प्राइमरी खरीद पर)मैच्योरिटी से पहले बेचने पर कैपिटल गेन टैक्सब्याज स्लैब रेट से टैक्सेबल
विरासत / गिफ्ट में मिला सोनाप्राप्ति पर टैक्स नहीं (कुछ मामलों को छोड़कर)मूल मालिक की खरीद तारीख से गिना जाता हैबेचते समय कैपिटल गेन टैक्स50,000 रुपये से ज्यादा का नॉन-रिलेटिव गिफ्ट टैक्सेबल हो सकता है

पुश्तैनी या गिफ्ट में मिले सोने पर टैक्स नियम

वसीयत के जरिए मिला सोना इनहेरिटेंस टैक्स के दायरे में नहीं आता, लेकिन जब इसे बेचा जाता है तो कैपिटल गेन टैक्स लागू होता है। टैक्स की गणना मूल मालिक की खरीद कीमत और तारीख के आधार पर होती है। इसके साथ ही, गैर-रिश्तेदार से 50,000 रुपये से ज्यादा का गोल्ड गिफ्ट मिलने पर वह भी टैक्सेबल हो सकता है।

डिस्क्लेमर: TIMES NOW नवभारत किसी स्टॉक, म्यूचुअल फंड, आईपीओ या कमोडिटी में निवेश की सलाह नहीं देता है। यहां पर केवल जानकारी दी गई है। निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार की राय जरूर लें।

देश और दुनिया की ताजा ख़बरें (Hindi News) पढ़ें हिंदी में और देखें छोटी बड़ी सभी न्यूज़ Times Now Navbharat Live TV पर। बिज़नेस (Business News) अपडेट और आज का सोने का भाव (Gold Rate Today), आज की चांदी का रेट (Silver Rate Today) की ताजा समाचार के लिए जुड़े रहे Times Now Navbharat से।

यतींद्र लवानिया
यतींद्र लवानिया author

प्रिंट और डिजिटल मीडिया में बिजनेस एवं इकोनॉमी कैटेगरी में 10 वर्षों से अधिक का अनुभव। पिछले 7 वर्षों से शेयर बाजार, कॉरपोरेट सेक्टर और आर्थिक नीतियों... और देखें

End of Article