Fixed Deposit: फिक्स्ड डिपॉजिट यानी एफडी को आमतौर पर सबसे सुरक्षित और आसान निवेश विकल्प माना जाता है। ज्यादातर लोग इसमें एक तय समय के लिए पैसा जमा करते हैं, ब्याज कमाते हैं और मैच्योरिटी के समय पूरा पैसा निकाल लेते हैं। हालांकि, इस आसान से दिखने वाले निवेश में भी कई बार लोग छोटी-छोटी गलतियां कर बैठते हैं। एफडी की अवधि, ऑटो-रिन्यूअल और समय से पहले पैसा निकालने जैसे फैसलों पर सही ध्यान न देने से निवेशकों को उम्मीद से बहुत कम रिटर्न मिलता है। आज के समय में जब बैंक लगातार अपनी एफडी की ब्याज दरों में बदलाव कर रहे हैं, ऐसे में पुराने एफडी को ऑटोपायलट मोड पर छोड़ने के बजाय समय-समय पर उनकी समीक्षा करना बेहद जरूरी हो गया है। आइए जानते हैं एफडी से जुड़ी उन 5 बड़ी गलतियों के बारे में, जिनसे हर निवेशक को बचना चाहिए।
ऑटो-रिन्यूअल पर न छोड़ें अपनी एफडी
एफडी मैच्योर होने पर उसे अपने आप रिन्यू होने देना सुविधाजनक तो लगता है, लेकिन यह घाटे का सौदा भी साबित हो सकता है। जब आपकी एफडी रिन्यू होती है, तो उस समय बैंक जो नई ब्याज दर ऑफर कर रहा होता है, उसी दर पर पैसा लॉक हो जाता है। यह जरूरी नहीं कि पुरानी ब्याज दर ही आपको दोबारा मिले। इसके अलावा, हो सकता है कि ऑटो-रिन्यूअल के कारण आपका पैसा ऐसे समय के लिए लॉक हो जाए जिसकी आपको जरूरत ही न हो। इसलिए, एफडी मैच्योर होने से पहले ही अपने बैंक की नई ब्याज दरों और अपनी वित्तीय जरूरतों की जांच जरूर कर लें।
बिना पेनल्टी जाने समय से पहले न तोड़ें एफडी
किसी भी इमरजेंसी में लोग सबसे पहले अपनी एफडी तोड़ने की सोचते हैं, लेकिन बिना पेनल्टी और नियमों को समझे ऐसा करना नुकसानदेह होता है। बैंक अपने नियमों के अनुसार प्री-मैच्योर विड्रॉल पर जुर्माना वसूलते हैं। समय से पहले एफडी बंद करने पर आपको शुरुआत में तय की गई ब्याज दर नहीं मिलती, बल्कि पैसा जितने समय तक बैंक में रहा है, उस अवधि के लिए लागू ब्याज दर में से पेनल्टी काटकर भुगतान किया जाता है। इससे आपका कुल रिटर्न काफी कम हो जाता है।
सिर्फ ज्यादा ब्याज देखकर लंबी अवधि न चुनें
अक्सर देखा जाता है कि लंबी अवधि वाली एफडी पर बैंक थोड़ा ज्यादा ब्याज दर देते हैं। इस लालच में आकर कई निवेशक 5 से 10 साल तक के लिए पैसा लॉक कर देते हैं। लेकिन अगर आपको बीच में ही पैसों की जरूरत पड़ गई, तो आपको नुकसान उठाकर एफडी तोड़नी पड़ेगी। वित्तीय सलाहकारों का मानना है कि केवल उच्चतम ब्याज दर देखने के बजाय, एफडी की अवधि को अपने वित्तीय लक्ष्यों और जरूरतों के साथ मैच करके ही चुनना चाहिए।
एक ही एफडी में सारा पैसा जमा करने की भूल
अपनी पूरी बचत को एक ही बड़ी एफडी में लगाने से तरलता यानी लिक्विडिटी की समस्या खड़ी हो जाती है। अगर आपको अचानक कम पैसों की जरूरत पड़ती है, तो भी आपको पूरी एफडी तोड़नी पड़ सकती है। इससे बचने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि एक ही बड़ी एफडी बनाने के बजाय अलग-अलग मैच्योरिटी समय वाली कई छोटी-छोटी एफडी बनाएं। इसे वित्तीय भाषा में 'एफडी लैडरिंग' कहा जाता है। इससे आपको समय-समय पर पैसे मिलते रहते हैं और इमरजेंसी में पूरी एफडी भी नहीं तोड़नी पड़ती।
केवल ब्याज दर पर न दें ध्यान, अन्य नियमों को भी समझें
एफडी चुनते समय सबसे ज्यादा ब्याज दर देने वाला बैंक ही हमेशा सही विकल्प नहीं होता। ब्याज दर के अलावा आपको एफडी की अवधि, प्री-मैच्योर विड्रॉल के नियम, न्यूनतम जमा राशि, ब्याज भुगतान के विकल्प (मासिक, तिमाही या मैच्योरिटी पर) और टैक्स के नियमों (TDS) पर भी ध्यान देना चाहिए। इसके साथ ही, पुराने एफडी को रिन्यू करने से पहले बाजार में चल रही दूसरी बैंकों की दरों की तुलना कर लेना समझदारी होती है।
फिक्स्ड डिपॉजिट को कभी भी 'पैसा जमा करो और भूल जाओ' जैसा प्रोडक्ट नहीं समझना चाहिए। इसे अपनी पूरी वित्तीय योजना का एक अहम हिस्सा मानकर सही रणनीति के साथ प्रबंधित करना चाहिए। मैच्योरिटी से पहले अपनी एफडी की नियमित जांच करने से आप न केवल नुकसान से बच सकते हैं, बल्कि अपनी बदलती जरूरतों और ब्याज दरों के हिसाब से बेहतर रिटर्न भी प्राप्त कर सकते हैं।
