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महंगाई बिना शोर किए चुरा रही आम आदमी की खुशियां, थाली हुई छोटी, बचत सिकुड़ी और सपने हो रहे दूर

प्याज, चीनी, दूध और खाद्य तेल समेत तमाम जरूरी राशन के दाम चढ़ने से गरीब परिवारों पर बोझ बढ़ा है। सच तो यह है कि महंगाई की इस खामोश स्ट्राइक से देश का कोई भी वर्ग अछूता नहीं बचा है।

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आम आदमी पर महंगाई की मार
Authored by: Alok Kumar
Updated Aug 26, 2026, 15:57 IST
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दुनिया के दिग्गज निवेशक वॉरेन बफेट के अनुसार, "महंगाई एक ऐसा अदृश्य चोर है, जो आपकी जेब काटे बिना ही आपके पैसे चुरा लेता है।" यह बात मौजूदा समय के फिर मौजू है। इस समय महंगाई, बिना आहट किए आम इंसान की खुशियों पर डाका डाल रही है। एक बार फिर महंगाई का राक्षस अपना विकराल रूप दिखा रहा है। चीनी, प्याज, हरी सब्जियां और खाने के तेल जैसी चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं, जिसने गृहणियों के महीने भर के बजट का गणित पूरी तरह से बिगाड़ दिया है। सबसे ज्यादा दबाव उस गृहस्थी पर पड़ा है, जहां सीमित आय में महीने भर का खर्च चलाता है।

महंगाई की असली मार सिर्फ बढ़े हुए बिल में नहीं छिपी है। यह धीरे-धीरे खरीदारी की क्षमता घटा रही है, बचत को कम कर रही है और सपने तोड़ने का काम कर रही है। आइए समझते हैं कि महंगाई कैसे बिना कोई शोर मचाए आम इंसान की जिंदगी में दाखिल होती है और चुपके से सब कुछ लूटकर चली जाती है।

महंगाई हर घर में धीरे-धीरे लगा रही सेंध

1. खरीदने की ताकत घटी: महंगाई बढ़ने से आपकी खरीदने की क्षमता घट गई है। अभी तक जो सामान ₹100 में मिल रहा था, उसे खरीदने के लिए अब ₹110 खर्च करने पड़ेंगे। यानी आपकी खरीद क्षमता प्रभावित होगी।

2. निवेश पर कम रिटर्न: मान लीजिए बैंक खाते में आपके पैसे पर 3% ब्याज मिल रहा है, लेकिन महंगाई 6% की दर से बढ़ रही है। ऐसे में ब्याज मिलने के बावजूद आपके पैसे की असली कीमत कम होगी।

3. बिगड़ता घर का बजट: जरूरी सामान के दाम बढ़ने से महीने का खर्च बढ़ गया है। मजबूरी यह है कि इन पर कैंची चलाना भी मुमकिन नहीं।

4. बचत पर डाका: जब हर महीने की कमाई सिर्फ जरूरतों को पूरा करने में खत्म हो जाएगी, तो भविष्य के लिए पैसा बचाना कहां से संभव होगा?

'बचत स्वाहा, खुशियां आधी'

महंगाई बढ़ने का असर सिर्फ घर के बजट तक सीमित नहीं रहता। जब रोजमर्रा की चीजों पर खर्च बढ़ता है, तो इसका असर धीरे-धीरे लोगों जीवन पर दिखाई देने लगता है। परिवार को जरूरत और इच्छा के बीच चुनाव करना पड़ता है। कई बार छोटी-छोटी खुशियों से भी समझौता करना पड़ता है। महंगाई बढ़ने पर लोग पैसे बचाने के लिए महंगे फल, सब्जियां या बेहतर ब्रांड का राशन खरीदना कम कर देते हैं। उनकी जगह सस्ते विकल्प चुनने लगते हैं। यानी बजट संभालने के लिए सिर्फ मात्रा ही नहीं, कई बार सामान की गुणवत्ता से भी समझौता करना पड़ता है।

बाहर खाना, परिवार के साथ घूमने जाना, फिल्म देखना या नए कपड़े खरीदना जैसी छोटी-छोटी खुशियां सबसे पहले बजट से बाहर होती हैं। जरूरी खर्च बढ़ने के बाद लोग इन खर्चों को टालना शुरू कर देते हैं। धीरे-धीरे जिंदगी में जरूरतें बढ़ती जाती हैं और खुशियों के लिए जगह कम होती जाती है। जब कमाई से जरूरी खर्च पूरे करना मुश्किल होने लगता है, तो कर्ज एक मात्र सहारा बचता है। धीरे—धीरे लोग कर्ज के जाल में फंसते चले जाते हैं।

महंगाई का असर लंबे समय के लक्ष्यों पर भी पड़ता है। बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए बचत, अपना घर खरीदना, नई कार लेना या मेडिकल इमरजेंसी के लिए फंड तैयार करना जैसे लक्ष्य आगे खिसक सकते हैं। हर महीने बढ़ते खर्च और घटती बचत का असर मानसिक शांति पर भी पड़ता है। जब बार-बार यह सोचना पड़े कि किस खर्च को कम करें और किस जरूरत को अगले महीने तक टालें, तो आर्थिक चिंता में खुशियां खत्म होने लगती है।

बढ़ती महंगाई

बढ़ती महंगाई

मध्यवर्ग की कर्ज पर बढ़ती निर्भरता

आसमान छूती महंगाई से मिडिल क्लास पर दोहरी मार पड़ रही है। लोग लग्जरी के लिए नहीं, बल्कि रोजमर्रा के खर्च और EMI भरने के लिए क्रेडिट कार्ड और पर्सनल लोन ले रहे हैं। इस तरह वह कर्ज के जाल में फंसते चले जा रहे हैं। साल दर साल बढ़ती सैलरी के बावजूद भी जरूरी खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है।

दिहाड़ी मजदूर सबसे अधिक मार

बढ़ी हुई महंगाई की मार सबसे अधिक निम्न आय वर्ग और दिहाड़ी मजदूरों पर पड़ी है। आम आदमी न केवल दैनिक उपयोग की वस्तुओं की बढ़ती कीमतों से बल्कि एलपीजी, पेट्रोल और अन्य ईंधनों की बढ़ती कीमतों से भी प्रभावित है। लोगों का कहना है कि पैकेटबंद वस्तुओं की कीमतें 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं।

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