भारतीय निवेशकों के लिए सिर्फ घरेलू बाजार पर निर्भर रहना हमेशा फायदेमंद नहीं हो सकता। First Global की फाउंडर दिग्गज निवेशक देविना मेहरा ने एक उदाहरण के जरिए बताया कि लंबे समय में ग्लोबल निवेश को नजरअंदाज करने से संपत्ति में बड़ा अंतर पैदा हो सकता है। उनके मुताबिक, ₹1 लाख की रकम एक स्थिति में करीब ₹1.5 करोड़ बनती, जबकि बेहतर ग्लोबल एक्सपोजर के साथ यही रकम ₹6.8 करोड़ तक पहुंच सकती थी। सवाल सिर्फ रिटर्न का नहीं, बल्कि पोर्टफोलियो में विविधता का भी है।
1. सिर्फ भारत में निवेश से बढ़ा सकता है रिस्क
देविना मेहरा के मुताबिक किसी एक देश के बाजार पर ज्यादा निर्भरता निवेशक के जोखिम को बढ़ा सकती है। भारतीय शेयर बाजार में भी कुछ खास सेक्टर और चुनिंदा बड़ी कंपनियों का दबदबा रहता है। ऐसे में अगर किसी समय इन कंपनियों या सेक्टर का प्रदर्शन कमजोर रहता है तो पूरे पोर्टफोलियो पर इसका असर पड़ सकता है। यही वजह है कि निवेशकों को दूसरे देशों और अलग-अलग बाजारों में भी निवेश के विकल्प तलाशने चाहिए। इससे किसी एक अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन पर पूरी तरह निर्भरता कम की जा सकती है।
2. ग्लोबल निवेश का मतलब सिर्फ US Stocks नहीं
मेहरा ने एक अहम बात साफ की है कि Global Investing का मतलब केवल अमेरिका की कंपनियों में पैसा लगाना नहीं है। कई निवेशक ग्लोबल डायवर्सिफिकेशन के नाम पर सिर्फ US Stocks या Nasdaq जैसे इंडेक्स तक सीमित रह जाते हैं। उनका तर्क है कि सही मायने में ग्लोबल पोर्टफोलियो में अलग-अलग देशों, क्षेत्रों और सेक्टर का संतुलित एक्सपोजर होना चाहिए। इसके लिए Global Indices और ETFs एक आसान तरीका हो सकते हैं। इनसे निवेशक को अलग-अलग कंपनियां चुनने के बजाय एक व्यापक बाजार में हिस्सेदारी मिलती है।
3. रुपये की कमजोरी भी बन सकती है फायदा
लंबी अवधि में भारतीय रुपये में अमेरिकी डॉलर जैसी प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले कमजोरी आई है। ऐसे में विदेशी संपत्तियों में निवेश सिर्फ शेयर बाजार के रिटर्न तक सीमित नहीं रहता, बल्कि Currency Diversification भी देता है। इसका मतलब यह नहीं है कि विदेशी निवेश हमेशा ज्यादा रिटर्न देगा। बल्कि फायदा यह है कि निवेशक की पूरी संपत्ति एक ही Currency और Economy से जुड़ी नहीं रहती। यही संतुलन लंबे समय में Portfolio Risk को कम करने में मदद कर सकता है।
कैसे करें ग्लोबल निवेश?
मेहरा के मुताबिक निवेशकों को हर विदेशी कंपनी के शेयर खुद चुनने के बजाय Diversified Global Funds और ETFs जैसे विकल्पों पर विचार करना चाहिए। इसका उद्देश्य किसी एक देश या कंपनी पर दांव लगाना नहीं, बल्कि अलग-अलग बाजारों में व्यवस्थित तरीके से निवेश करना है। यह भी जरूरी है कि ग्लोबल निवेश को भारत से पैसा निकालकर विदेश भेजने की रणनीति न समझा जाए। असल मकसद Portfolio Diversification है, ताकि निवेशक के पास भारत के साथ-साथ दुनिया की दूसरी अर्थव्यवस्थाओं की Growth में भी हिस्सेदारी हो।
निवेशकों के लिए क्या है बड़ा संदेश?
देविना मेहरा का मानना है कि Home Bias यानी अपने देश के निवेश को जरूरत से ज्यादा महत्व देना पोर्टफोलियो को सीमित कर सकता है। भारत में निवेश जरूरी है, लेकिन पूरी संपत्ति को सिर्फ भारतीय बाजार तक सीमित रखना भी समझदारी नहीं हो सकती। लंबी अवधि के निवेश में सबसे अहम बात सिर्फ यह नहीं कि पैसा कहां बढ़ सकता है, बल्कि यह भी है कि जोखिम कितनी जगहों पर फैला हुआ है। यही वजह है कि Global Indices, ETFs और दूसरे International Investment options को पोर्टफोलियो में जगह देने पर विचार किया जा सकता है।
डिस्क्लेमर: TIMES NOW नवभारत किसी स्टॉक, म्यूचुअल फंड, आईपीओ या कमोडिटी में निवेश की सलाह नहीं देता है। यहां पर केवल जानकारी दी गई है। निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार की राय जरूर लें।
