Crude Price and Windfall Tax : सरकार ने महज दो हफ्ते के भीतर दूसरी बार पेट्रोलियम उत्पादों पर विंडफॉल टैक्स बढ़ा दिया है। डीजल, पेट्रोल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) के निर्यात पर लगने वाला टैक्स सोमवार से बढ़ा दिया गया है। एनर्जी बाजार के जानकारों का कहना है कि यह कदम घरेलू बाजार में ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने और वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में जारी उतार-चढ़ाव के बीच उठाया गया है।
क्या-क्या महंगा हुआ?
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक सरकार ने पेट्रोल के निर्यात पर शुल्क ₹2.5 से बढ़ाकर ₹3.5 प्रति लीटर कर दिया है। वहीं, डीजल के निर्यात पर कुल विंडफॉल टैक्स ₹15.5 से बढ़ाकर ₹25.5 प्रति लीटर कर दिया गया। इसके अलावा एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) पर शुल्क ₹14.5 से बढ़ाकर ₹22 प्रति लीटर कर दिया गया है। ये नई दरें सोमवार से लागू हो गई हैं।
दो हफ्ते पहले भी बढ़ाया था टैक्स
इससे पहले सरकार ने 16 जुलाई को भी डीजल और ATF के निर्यात पर विंडफॉल टैक्स बढ़ाया था। उस समय दोनों पर ₹7 प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई थी। अब सिर्फ दो हफ्ते बाद फिर टैक्स बढ़ा दिया गया है। इससे साफ है कि सरकार वैश्विक तेल बाजार की स्थिति पर लगातार नजर रख रही है और जरूरत पड़ने पर तेजी से फैसले ले रही है।
आखिर विंडफॉल टैक्स होता क्या है?
जब किसी कंपनी को वैश्विक परिस्थितियों की वजह से अचानक बहुत ज्यादा मुनाफा होने लगता है, तो सरकार उस अतिरिक्त कमाई के एक हिस्से पर विशेष टैक्स लगाती है। इसे विंडफॉल टैक्स कहा जाता है। तेल कंपनियों के मामले में ऐसा तब होता है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें काफी बढ़ जाती हैं और निर्यात से उन्हें घरेलू बिक्री की तुलना में कहीं ज्यादा कमाई होने लगती है।
तेल कंपनियों को झटका क्यों?
सरकार के इस फैसले का सबसे बड़ा असर उन रिफाइनिंग कंपनियों पर पड़ेगा, जो अपने उत्पादन का बड़ा हिस्सा विदेशों में बेचती हैं। इनमें
रिलायंस इंडस्ट्रीज, नायरा एनर्जी, इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम शामिल हैं। निर्यात पर ज्यादा टैक्स लगने से इन कंपनियों का प्रति लीटर मुनाफा घट सकता है। खासतौर पर निजी रिफाइनरियों पर इसका असर अधिक माना जाता है क्योंकि उनका निर्यात अनुपात ज्यादा है।
किसे फायदा होगा?
इस फैसले का सबसे बड़ा फायदा देश के उपभोक्ताओं और घरेलू बाजार को माना जा रहा है। क्योंकि, इससे देश में ईंधन की उपलब्धता बेहतर बनी रहेगी। घरेलू बाजार में सप्लाई पर दबाव कम होगा। अगर वैश्विक कीमतें और बढ़ती हैं, तब भी घरेलू बाजार में अचानक कमी आने का खतरा घटेगा।
