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DUSU चुनावों ने कैसे छात्रों को बनाया राष्ट्रीय नेता, क्यों राष्ट्रीय पार्टियां छात्र चुनावों पर देती हैं ध्यान? पढ़ें- कैंपस से संसद का सफर

Delhi University Politics: दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ (DUSU) केवल एक कैंपस चुनाव नहीं, बल्कि देश की राजनीति की नर्सरी है।

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DUSU चुनावों ने कैसे छात्रों को बनाया राष्ट्रीय नेता, क्यों राष्ट्रीय पार्टियां छात्र चुनावों पर देती हैं ध्यान? पढ़ें- कैंपस से संसद का सफर
Edited by: नितिन अरोड़ा
Updated Sep 21, 2026, 16:09 IST
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DUSU Elections: अरुण जेटली और अजय माकन से लेकर रेखा गुप्ता और अलका लांबा तक, दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन (DUSU) के चुनावों ने ऐसे नेता दिए हैं जिन्होंने बाद में राष्ट्रीय और राज्य की राजनीति को आकार दिया। लेकिन DUSU का सफर वैचारिक लड़ाइयों और छात्र आंदोलनों से आगे बढ़कर अब जबरदस्त कैंपेन तक पहुंच गया है, जिसमें राजनीतिक प्रतीकवाद, सोशल मीडिया की जंग, लग्जरी कारें और बड़ी-बड़ी रैलियां शामिल हैं।

कई दशकों से, दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन (DUSU) के चुनाव भारत के बदलते राजनीतिक मिजाज को दिखाते रहे हैं- इमरजेंसी के दौर की वैचारिक लड़ाइयों और मंडल राजनीति से लेकर आज पहचान, राष्ट्रवाद, छात्र कल्याण और सोशल मीडिया के असर को लेकर होने वाली लड़ाइयों तक।

समय के साथ, DUSU छात्र सक्रियता के एक मंच से बदलकर भारत के सबसे ज्यादा देखे जाने वाले यूनिवर्सिटी चुनावों में से एक बन गया है, जहां अक्सर राष्ट्रीय राजनीतिक नैरेटिव को पहली बार परखा जाता है।

DUSU चुनाव कैसे शुरू हुए?

दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन की स्थापना 1949 में हुई थी, जबकि पहला DUSU चुनाव 1954 में हुआ था। शुरू में, चुनाव का तरीका आज होने वाले सीधे चुनावों से अलग था। समय के साथ, छात्रों की ज्यादा भागीदारी की मांग के कारण चुनाव प्रक्रिया में बदलाव हुए।

सीधे चुनाव शुरू होने से हर योग्य छात्र को अपने प्रतिनिधियों के लिए वोट देने का मौका मिला, जिससे DUSU कॉलेज-स्तर की अंदरूनी प्रतियोगिता के बजाय एक बड़े छात्र आंदोलन में बदल गया।

1970 का दशक: जब DUSU विचारधारा की लड़ाई का मैदान बन गया

1970 के दशक ने DUSU की राजनीति का स्वरूप बदल दिया। यह दौर पूरे भारत में जबरदस्त छात्र सक्रियता का समय था। बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, लोकतांत्रिक अधिकार और सरकारी नीतियां जैसे मुद्दे कैंपेन के मुख्य विषय बन गए।

एक बड़ा मोड़ तब आया जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1975 और 1977 के बीच इमरजेंसी लगाई। छात्र राजनीति बड़े लोकतांत्रिक आंदोलन से गहराई से जुड़ गई, और नागरिक आजादी पर लगी पाबंदियों के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों से कई छात्र नेता उभरे।

इस दौर के सबसे मशहूर नामों में से एक अरुण जेटली थे, जो 1974 में ABVP उम्मीदवार के तौर पर DUSU अध्यक्ष बने।

इमरजेंसी के दौरान उनकी छात्र सक्रियता बाद में उनकी राजनीतिक पहचान का एक अहम हिस्सा बन गई। वे आगे चलकर BJP के सबसे प्रमुख नेताओं में से एक बने और भारत के वित्त मंत्री और रक्षा मंत्री के तौर पर काम किया। 1970 के दशक ने DUSU को एक ऐसे पॉलिटिकल लॉन्चपैड के तौर पर स्थापित किया, जहां युवा एक्टिविस्ट मुख्यधारा की राजनीति में आने से पहले संगठनात्मक अनुभव हासिल कर सकते थे।

ABVP बनाम NSUI: DUSU की राजनीति पर हावी रहने वाली दो ताकतें।

कई दशकों से, DUSU चुनावों में मुख्य रूप से इन दो संगठनों के बीच मुकाबला रहा है:

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP): राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ा छात्र संगठन।

नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI): कांग्रेस से जुड़ा छात्र संगठन।

हालांकि, वामपंथी विचारधारा वाले छात्र संगठनों और निर्दलीय उम्मीदवारों जैसे समूहों ने भी चुनाव लड़ा है और कैंपस की सोच, कार्य व अन्य चीजों को प्रभावित किया है।

छात्र राजनीति से निकलकर बड़े राजनीतिक पदों तक का सफर

छात्र राजनीति से निकलकर बड़े राजनीतिक पदों तक का सफर

DUSU की सबसे बड़ी राजनीतिक सफलता की कहानियां

DUSU की प्रतिष्ठा का सबसे बड़ा कारण उन नेताओं की संख्या है जिन्होंने छात्र राजनीति से निकलकर बड़े राजनीतिक पदों तक का सफर तय किया।

अरुण जेटली: DUSU अध्यक्ष से केंद्रीय वित्त मंत्री तक

अरुण जेटली DUSU के राजनीतिक प्रभाव के सबसे प्रमुख उदाहरणों में से एक हैं। 1974 में DUSU अध्यक्ष बनने के बाद, जेटली ने BJP में अपना करियर बनाया और अंततः पार्टी के प्रमुख रणनीतिकारों में से एक बने और केंद्रीय वित्त मंत्री के रूप में भी काम किया। उनके सफर ने दिखाया कि कैसे छात्र राजनीति राष्ट्रीय नेतृत्व का रास्ता बन सकती है।

अजय माकन: NSUI का प्रमुख चेहरा

अजय माकन, जो 1985 में NSUI उम्मीदवार के तौर पर DUSU अध्यक्ष बने, बाद में कांग्रेस के साथ सक्रिय राजनीति में आए। उन्होंने केंद्रीय आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्री और दिल्ली कांग्रेस प्रमुख के रूप में काम किया।

विजय गोयल: छात्र नेता जो केंद्रीय मंत्री बने

ABVP नेता विजय गोयल ने 1977 में DUSU अध्यक्ष के रूप में काम किया। बाद में वे सांसद और केंद्रीय राज्य मंत्री बने।

रेखा गुप्ता: DUSU अध्यक्ष से दिल्ली की मुख्यमंत्री तक

रेखा गुप्ता, जो 1996-97 में ABVP उम्मीदवार के तौर पर DUSU अध्यक्ष बनीं, बाद में BJP में आगे बढ़ती गईं। वे अंततः दिल्ली की मुख्यमंत्री बनीं, जिससे वे DUSU की लंबी राजनीतिक परंपरा का एक मजबूत उदाहरण बन गईं।

अलका लांबा: छात्र राजनीति से दिल्ली विधानसभा तक

अलका लांबा ने 1995 में NSUI उम्मीदवार के तौर पर DUSU अध्यक्ष का चुनाव जीता। बाद में वे दिल्ली की विधायक बनीं और राजनीतिक दलों में संगठनात्मक पदों पर रहीं।

राजनीतिक दल DUSU के नतीजों पर करीबी नजर क्यों रखते हैं?

प्रमुख राजनीतिक संगठनों के लिए, DUSU में जीत का मतलब सिर्फ छात्र संगठन पर नियंत्रण पाना नहीं है। यह युवा वोटरों के बीच संगठन की मजबूती, समर्थकों को एकजुट करने की क्षमता, भविष्य के नेताओं की तैयारी और युवा वोटरों के बीच राजनीतिक संदेश पहुंचाने की क्षमता को दिखाता है।

DUSU का सफल कैंपेन युवा नेताओं को चुनावी राजनीति में आने से पहले ही कई सालों का राजनीतिक अनुभव दे सकता है।

डिजिटल दौर में DUSU की बदलती अहमियत

हालांकि DUSU का असर अभी भी बना हुआ है, लेकिन छात्र राजनीति से राष्ट्रीय नेतृत्व तक का सफर अब ज्यादा मुश्किल हो गया है। पहले के छात्र नेता अक्सर जल्दी ही पार्टी संगठनों और चुनावी राजनीति में आ जाते थे। आज, DUSU के कई पूर्व अध्यक्षों ने अलग-अलग रास्ते चुने हैं, जिनमें राजनीति से बाहर प्रोफेशनल करियर भी शामिल हैं। फिर भी, DUSU का प्रतीकात्मक महत्व बना हुआ है। दिल्ली यूनिवर्सिटी में जीत का राजनीतिक महत्व आज भी बरकरार है क्योंकि यह भारत के सबसे अहम राजनीतिक कैंपस में से एक में मिली सफलता को दर्शाता है।

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