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क्या आपने भी अलग-अलग म्यूचुअल फंड्स के जरिए उन्हीं 10 शेयरों में लगा रखा है पैसा? म्यूचुअल फंड में अक्सर करते हैं ये गलतियां

अक्सर निवेशक यह सोचते हैं कि अगर उनके पास पांच अलग-अलग म्यूचुअल फंड हैं, तो उनका पोर्टफोलियो डाइवर्सिफाइड है। लेकिन सच्चाई यह है कि ज़्यादातर लोग अनजाने में उन्हीं 8-10 बड़ी कंपनियों के शेयरों में बार-बार निवेश कर रहे होते हैं। आइए आपको बताते हैं आप कैसे चेक कर सकते हैं आपके फंड्स डाइवर्सिफाइएड हैं या ओवरलैप्ड?

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Mutual Fund

पिछले कुछ सालों में म्यूचुअल फंड भारतीय निवेशकों की पहली पसंद बनते जा रहे हैं। पहले जहां लोग बैंक एफडी या सोने को सुरक्षित विकल्प मानते थे, अब वही निवेशक SIP के जरिए हर महीने म्यूचुअल फंड में पैसा डाल रहे हैं। आसान निवेश प्रोसेस, बेहतर रिटर्न और मार्केट की बढ़ती समझ ने लोगों को इस ओर आकर्षित किया है। लेकिन तेजी से बढ़ते इस ट्रेंड के साथ जरुरी है कि आप समझें हर म्यूचुअल फंड एक जैसा नहीं होता, और बिना समझे किए गए निवेश से नुकसान भी हो सकता है।

दरअसल, कई निवेशक यह सोचकर अलग-अलग म्यूचुअल फंड्स में पैसा लगाते हैं कि ऐसा करने से उनका पोर्टफोलियो ज्यादा डाइवर्सिफाइड और सुरक्षित हो जाएगा। लेकिन क्या आप जानते हैं, हो सकता है आपके सारे फंड मिलकर एक ही कंपनियों में पैसा लगा रहे हों? यानी आप समझ रहे हैं कि आपने रिस्क फैला दिया, जबकि असल में आपका निवेश बार-बार उन्हीं 8–10 शेयरों में घूम रहा है जैसे HDFC बैंक, रिलायंस, इंफोसिस या ICICI बैंक। अब जब इन कंपनियों के शेयर गिरते हैं, तो आपके सारे फंड एक साथ नीचे आ जाते हैं।

एक साथ गिर क्यों जाते हैं आपके सारे म्यूचुअल फंड

ऐसे में अगर मार्केट गिरे या किसी खास सेक्टर जैसे बैंकिंग को झटका लगे, तो आपके सारे फंड एक साथ नीचे आ जाएंगे। उदाहरण के लिए, अगर आपके तीनों फंड बैंकिंग सेक्टर में ज्यादा निवेशित हैं और इस सेक्टर में गिरावट आती है, तो सभी फंड्स की नेट एसेट वैल्यू (NAV) एक साथ गिरेगी। यही कहलाता है Contagion Effect, यानी एक ही स्टॉक का नुकसान आपके पूरे पोर्टफोलियो में फैल जाना।

अब सवाल है कि ऐसा होता क्यों है?

असल में ज्यादातर भारतीय इक्विटी फंड्स खासकर लार्ज-कैप, फ्लेक्सी-कैप और मल्टी-कैप फंड Nifty 50 या BSE 100 को बेंचमार्क मानते हैं। इन इंडेक्स में वही बड़ी कंपनियां शामिल होती हैं, इसलिए फंड मैनेजर भी इन्हीं में निवेश करते हैं ताकि उनका प्रदर्शन इंडेक्स से बहुत पीछे न रहे। इसे निवेश की भाषा में “इंडेक्स-हगिंग” कहा जाता है। नतीजा यह होता है कि अलग-अलग नाम और फंड हाउस वाले फंड्स की टॉप होल्डिंग्स लगभग एक जैसी होती हैं।

कैसे पता करें कितना ओवरलैप है?

अगर आप यह जानना चाहते हैं कि आपके फंड्स में कितना ओवरलैप है, तो इसका पता लगाना आसान है। हर म्यूचुअल फंड अपनी फैक्टशीट में हर महीने टॉप 10 कंपनियों की जानकारी देता है। अगर दो फंड्स में एक ही कंपनियां बार-बार दिखें, तो समझिए कि ओवरलैप है। उदाहरण के तौर पर, अगर Fund A में HDFC बैंक का हिस्सा 9.6% है और Fund B में 9.2%, तो दोनों फंड्स का पैसा एक ही कंपनी में लगा है। आप चाहें तोअक्सर निवेशक यह सोचते हैं कि अगर उनके पास पांच अलग-अलग म्यूचुअल फंड हैं, तो उनका पोर्टफोलियो डाइवर्सिफाइड है। लेकिन सच्चाई यह है कि ज़्यादातर लोग अनजाने में उन्हीं 8-10 बड़ी कंपनियों के शेयरों में बार-बार निवेश कर रहे होते हैंइसे एक्सेल पर खुद जांच सकते हैं या फिर ऑनलाइन टूल्स जैसे AdvisorKhoj Overlap Tool, PrimeInvestor Overlap Checker या Dezerv Portfolio Overlap Tool का इस्तेमाल कर सकते हैं।

अगर फंड्स में 25% से कम ओवरलैप है, तो इसे अच्छा माना जाता है। 25–33% के बीच का ओवरलैप बताता है कि डाइवर्सिफिकेशन बहुत मजबूत नहीं है, जबकि 33% से ज्यादा ओवरलैप का मतलब है कि आपके फंड्स लगभग “क्लोन” हैं यानी अलग-अलग नामों में एक ही निवेश।

कैसे बचें इस ओवरलैप से?

ओवरलैप से बचने के लिए जरूरी है कि हर कैटेगरी जैसे लार्ज-कैप, मिड-कैप और स्मॉल-कैप में सिर्फ एक फंड रखें। एक ही कैटेगरी के कई फंड्स में पैसा लगाने से फायदा नहीं, सिर्फ दोहराव होता है। कोशिश करें कि फंड्स अलग-अलग यूनिवर्स से हों — जैसे HDFC Large Cap Fund और Nippon India Small Cap Fund में लगभग कोई ओवरलैप नहीं है। साथ ही, ध्यान रखें कि किसी एक कंपनी में आपके कुल पोर्टफोलियो का 8% से ज्यादा हिस्सा न हो।

हर साल अपने निवेश की समीक्षा करें, क्योंकि फंड्स समय के साथ बदलते हैं मैनेजर बदलते हैं, रणनीतियां बदलती हैं, और ओवरलैप बढ़ सकता है। अगर दो फंड्स एक जैसे दिखने लगें, तो उनमें से एक को हटा दें।

ये है सबसे समझदारी वाला तरीका

सबसे समझदारी भरा तरीका है “कोर और सैटेलाइट” स्ट्रैटेजी अपनाना। कोर फंड्स आपके पोर्टफोलियो का स्थिर हिस्सा होते हैं जैसे Flexi-cap या Large-cap फंड्स। वहीं, सैटेलाइट फंड्स छोटे या थीमैटिक फंड होते हैं, जो थोड़ा एक्स्ट्रा एक्सपोज़र देते हैं। ध्यान रखें कि सैटेलाइट फंड्स, कोर की कॉपी न हों, बल्कि उसे पूरक बनाएं।

डाइवर्सिफिकेशन का मतलब सिर्फ ज्यादा फंड रखना नहीं है, बल्कि जोखिम को सही तरह से अलग-अलग जगह बांटना है। इसलिए नया फंड खरीदने से पहले उसका ओवरलैप जरूर चेक करें, अनावश्यक दोहराव हटाएं और असली डाइवर्सिफिकेशन करें ताकि जब मार्केट गिरे, तो आपका पोर्टफोलियो मजबूती से खड़ा रहे।

Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठीauthor

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिचा, पर्सनल फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, टैक्स प्लानिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। अब तक 8,000 से अधिक कंटेंट लिख चुकी रिचा की विशेषता है—जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाना। वह ऐसी स्टोरीज तैयार करती हैं जो न केवल जानकारीपूर्ण होती हैं, बल्कि आम पाठक की वित्तीय समझ को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं।

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