किसी पक्षी के एरोप्लेन के फ्लाई विंग्स या पंखे से टकराने पर हादसा होने का डर बना रहता है। इस आशंका को खत्म करने के लिए प्लेन का इंजन स्टार्ट करके उसमें मुर्गे फेंके जाते हैं। और देखा जाता है कि लैंडिंग या टेकऑफ के वक्त कोई पक्षी जहाज से टकराए तो जहाज को नुकसान न हो। यह 'चिकन गन टेस्ट' या 'बर्ड स्ट्राइक टेस्ट' कहलाता है। हवाई जहाज के इंजन पर मुर्गे इसलिए फेंके जाते हैं क्योंकि ये टेस्ट साबित करता है कि इंजन असली उड़ान में पक्षी टकराने पर भी सुरक्षित रहेगा।
हवाई जहाज उड़ते समय असली पक्षियों के टकराने (Bird Strike) से इंजन और विंडशील्ड को कितना नुकसान होगा, यह जांचना जरूरी होता है।
इंजनों और ग्लास को टेस्ट करने के लिए मृत मुर्गों या सिंथेटिक पक्षियों को एक विशेष मशीन से तेज़ गति पर फेंका जाता है, ताकि यह पता चले कि विंडशील्ड तड़कती है या टूट जाती है साथ ही इंजन के अंदर के ब्लेड कितनी ऊर्जा सहन कर सकते हैं।
इंजन पक्षी को चूसकर भी चलता रह सकता है या नही, विंडशील्ड तड़कती है या टूट जाती है साथ ही इंजन के अंदर के ब्लेड कितनी ऊर्जा सहन कर सकते हैं, यह सब इसमें जांचा जाता है
चिकन गन टेस्ट टेस्ट इसलिए किया जाता है क्योंकि असली उड़ान में हर साल हजारों बर्ड स्ट्राइक होते हैं। इससे कोई नुकसान ना हो इस आशांका को खत्म करने के लिए ऐसा किया जाता है।
इसे चिकन गन या पोल्ट्री कैनन से किया जाता है इसके लिए मुर्गे को न्यूमैटिक या एयर कैनन में रखा जाता है। फिर 300–500 किमी/घंटा तक की गति से इंजन के घूमते ब्लेडों पर फेंका जाता है। उसके बाद मापा जाता है कि ब्लेड टूटे या नहीं? इंजन ने कितना झटका सहा आदि? बता दें कि छोटे पक्षियों से मामूली नुकसान होता है पर बड़े पक्षियों से इंजन फेल भी हो सकता है।
इंजन FAA/EASA सुरक्षा मानकों को पूरा करता है। बड़े व तेज पक्षी टकराने पर भी इंजन धमाके से नहीं टूटेगा। उड़ान सुरक्षित रहेगी। ज्यादातर जगह मृत मुर्गे और सिंथेटिक बायो-जेल 'फेक बर्ड' का उपयोग होता है।