Pellet Gun: जंतर मंतर पर छात्र आंदोलन के दौरान छात्रों और पुलिस के बीच जमकर झड़प हुई थी। बताया जा रहा है कि इसी दौरान सुरक्षाकर्मियों की ओर से पैलेट गन भी चलाई गई जिसकी चपेट में एक युवक आया। लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने इस युवक के साथ मुलाकात कर दावा किया कि पैलेट गन से ही वह घायल हुआ है। कहा जा रहा है कि इस सुरक्षाकर्मी की पहचान भी हो गई है। यह जवान रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) का है जिसने प्रदर्शन के दौरान छात्रों की ओर पैलेट गन चलाई थी। बहरहाल, पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर सियासी संग्राम मचा हुआ है और संसद में इसे लेकर विपक्ष ने हंगामा भी किया। पैलेट गन कश्मीर में पत्थरबाजों पर इस्तेमाल को लेकर खूब चर्चा में रही थी। इससे पत्थरबाजों पर काबू बनाने में खासी सफलता भी मिली। क्या है पैलेट गन, कैसे काम करती है और कितनी घातक होती है, जानने की कोशिश करते हैं।
क्या होती है 'पैलेट गन'?
पैलेट गन एक विशेष प्रकार का शॉटगन (Shotgun) हथियार है, जिसका उपयोग सुरक्षा बल मुख्य रूप से हिंसक भीड़ को तितर-बितर करने और दंगों पर नियंत्रण पाने के लिए करते हैं। यह एक 'कम-घातक' श्रेणी का हथियार माना जाता है, जिसका उद्देश्य जान लेना नहीं, बल्कि उपद्रवियों को चोट पहुंचाकर या डराकर पीछे हटने पर मजबूर करना होता है।
कैसे करती है काम?
जब पैलेट गन से फायर किया जाता है, तो इसके कारतूस के फटने पर धातु (आमतौर पर सीसा या लेड) के सैकड़ों छोटे-छोटे छर्रे (Pellets) बहुत तेज गति से बाहर निकलते हैं। ये छर्रे हवा में एक बड़े दायरे में फैल जाते हैं, जिससे एक ही फायर में कई लोगों को चोट लग सकती है। इससे खास तौर पर आंखों को बहुत नुकसान पहुंचता है।
जंतर-मंतर पर तैनात रैपिड एक्शन फोर्स के जवान
किन हालातों में और कैसे किया जाता है इसका इस्तेमाल?
सुरक्षा बलों के नियमों के मुताबिक, पैलेट गन का इस्तेमाल अंतिम विकल्पों में से एक माना जाता है। इसके उपयोग के लिए सख्त मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तय होती है:
- भीड़ के बेकाबू होने पर: जब पानी की बौछारें, आंसू गैस (Tear Gas) और लाठीचार्ज जैसे शुरुआती उपाय हिंसक भीड़ को रोकने में पूरी तरह नाकाम साबित हो जाएं।
- आत्मरक्षा और सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा: जब भीड़ सुरक्षा बलों पर भारी पथराव कर रही हो, पुलिस थानों या सरकारी संपत्तियों को फूंकने की कोशिश कर रही हो, या सुरक्षाकर्मियों की जान को सीधा खतरा हो।
- कमर के नीचे फायर करने का नियम: एसओपी (SOP) के तहत पैलेट गन को हमेशा भीड़ के पैरों या कमर के नीचे के हिस्से को निशाना बनाकर चलाने की हिदायत होती है, ताकि शरीर के संवेदनशील अंगों पर गंभीर चोट न आए।
क्या है 'सियासी संग्राम' और विवाद?
पैलेट गन को लेकर भारत में हमेशा से तीखी राजनीतिक और सामाजिक बहस होती रही है। इसके पीछे मुख्य वजहें ये हैं:
- गंभीर चोटें और अंधापन: भले ही इसे 'कम-घातक' कहा जाए, लेकिन अगर इसके छर्रे चेहरे, गर्दन या आंखों में लग जाएं, तो इंसान हमेशा के लिए अंधा हो सकता है या उसकी जान भी जा सकती है।
- निशाना चूकना: चूंकि कारतूस से निकलने के बाद छर्रे हवा में फैल जाते हैं, इसलिए कई बार प्रदर्शनकारियों के बजाय वहां से गुजर रहे निर्दोष राहगीर या मीडियाकर्मी भी इसकी चपेट में आ जाते हैं।
- अधिकारों का उल्लंघन: मानवाधिकार संगठन और विपक्षी दल अक्सर इसे नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के अधिकार के खिलाफ एक क्रूर और अत्यधिक बल प्रयोग का जरिया बताते हैं।
जंतर-मंतर आंदोलन और पैलेट गन विवाद
हाल ही में नीट (NEET) पेपर लीक मामले को लेकर जंतर-मंतर से शुरू हुए देशव्यापी आंदोलन के दौरान, 20 जुलाई को संसद मार्च कर रहे छात्र प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई हुई थी। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और टीएमसी सांसद सागरिका घोष सहित विपक्ष का आरोप है कि 20 जुलाई को सुरक्षा बलों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों (जैसे 19 वर्षीय छात्र साहिल लोचब) पर पैलेट गन का इस्तेमाल किया, जिससे कुछ छात्रों की आंखों की रोशनी जाने का खतरा पैदा हो गया है। विपक्ष इसे लोकतंत्र में युवाओं पर "बर्बर हमला" करार दे रहा है। दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन चलाने के इन आरोपों को पूरी तरह से खारिज किया है, और इसे कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए की गई सामान्य पुलिसिया कार्रवाई बताया है।
