Who was Henry Kissinger: अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर नहीं रहे। बुधवार (29 नवंबर, 2023) को उनका निधन हो गया। वह 100 बरस के थे। उनकी परामर्श कंपनी ‘किसिंजर एसोसिएट्स’ की ओर से बताया गया कि कनेक्टिकट में उन्होंने अपने आवास पर प्राण त्यागे। हालांकि, मृत्यु का कारण नहीं बताया गया। वह अमेरिका की विदेश नीति की लड़ाई के अंतिम पुरोधा माने जाते थे। स्वतंत्र विश्व की भू-राजनीति पर उनके प्रभाव को कम करके नहीं आंका जा सकता। दूसरे विश्व युद्ध से लेकर (जब वह अमेरिकी सेना में सैनिक थे) शीत युद्ध के अंत तक और यहां तक कि 21वीं सदी में भी वैश्विक मामलों पर उनका महत्वपूर्ण निरंतर प्रभाव रहा। आइए, जानते हैं उनके बारे में विस्तार से:
किसिंजर ने अमेरिका के दो राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और गेराल्ड फोर्ड के कार्यकाल में सेवाएं दी थीं। उन्होंने वैश्विक मामलों पर असामान्य प्रभाव डाला था। यूएस के पूर्व विदेश मंत्री को वियतनाम युद्ध को खत्म करने और चीन के साथ अमेरिका के संबंध सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने को याद किया जाता है। वह राजनयिक रूप से खासा सक्रिय रहते थे और उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।
हेनरी को 1970 के दशक में भारतीय नेतृत्व के प्रति उनकी उपेक्षा के लिए जाना जाता है, पर बीते एक दशक से वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अमेरिका-भारत के मजबूत संबंधों की वकालत कर रहे थे। 2014 में मोदी के पीएम बनने के बाद पूर्व अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार किसिंजर भारत के संग रिश्तों की वकालत कर रहे थे। कुछ लोगों का मानना है कि वह पिछले कुछ साल में पीएम मोदी के बड़े प्रशंसक बन गए थे।
मोदी जब इस साल जून में आधिकारिक राजकीय यात्रा पर यूएस पहुंचे थे तो किसिंजर अच्छी सेहत नहीं होने के बावजूद उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस और विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन की संयुक्त मेजबानी में विदेश विभाग में आयोजित समारोह में मोदी का भाषण सुनने के लिए वाशिंगटन तक आए थे।
हेनरी तब विदेश विभाग के फॉगी बॉटम मुख्यालय में सातवीं मंजिल पर ऐतिहासिक बेंजामिन फ्रेंकलिन रूम तक व्हीलचेयर पर लाया गया था। भारत में अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी ने लिफ्ट में उनका अभिवादन किया। दोपहर के भोज पर आयोजित इस कार्यक्रम में बुजुर्ग अमेरिकी राजनेता ने प्रधानमंत्री मोदी के भाषण को पूरे धैर्य के साथ सुना और उनसे बातचीत भी की।
अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति पर किसिंजर का अत्यधिक प्रभाव रहा। उन्होंने जून 2018 में ‘यूएस इंडिया स्ट्रेटेजिक एंड पार्टनरशिप फोरम’ (यूएसआईएसपीएफ) के पहले स्थापना दिवस के मौके पर संस्थान से जुड़े जॉन चैंबर्स के साथ उपस्थित होकर भारत को लेकर अपने रुख को सार्वजनिक किया। उनकी बातचीत में मीडिया आमंत्रित नहीं था, लेकिन वहां उपस्थित अन्य लोग याद करते हुए बताते हैं कि किस तरह किसिंजर ने पुरजोर तरीके से भारत-अमेरिका संबंधों की वकालत की थी।
भारत के साथ उनके संबंध 1970 के दशक में तनावपूर्ण हो गए थे जब वह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और विदेश मंत्री के रूप में तत्कालीन अमेरिकी प्रशासन में थे। लेकिन चीन की ओर रुख करने से पहले उनकी पहली प्राथमिकता भारत को लेकर थी। उन्हीं के परामर्श पर यूएस चैंबर्स ऑफ कॉमर्स ने 70 के दशक में अमेरिका भारत व्यापार परिषद (यूएसआईबीसी) की स्थापना की थी। किसिंजर के 1972 के आसपास के एक कूटनीतिक संवाद के अभिलेखों से पता चलता है कि उन्होंने भारत और जापान को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने का समर्थन किया था।
इतिहासकार बताते हैं कि किसिंजर और तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ सौहार्दपूर्ण रिश्ते नहीं रख पाए थे। उनका ध्यान चीन की ओर था। कई जानकार कहते हैं कि फिर भी बाकी सब इतिहास है ही। शीत युद्ध के समापन के बाद और पिछले 10 दशक में भारत के मजबूती से उभरने के साथ भारत को लेकर किसिंजर के विचार बदल गए थे और बाद की सरकारों के संदर्भ में वह भारत के साथ मजबूत संबंधों की वकालत करते रहे।
किसिंजर ने करीब चार साल पहले यूएसआईएसपीएफ के एक और कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा था कि बांग्लादेश संकट ने दोनों देशों को ‘टकराव की कगार’ पर पहुंचा दिया था। किसिंजर ने इसके बाद नयी दिल्ली में कहा था, ‘‘भारत एक ऐतिहासिक विकासक्रम की शुरुआत में था और संबंधित सारी समस्याएं भारत के लिए समान महत्व की नहीं थीं। भारत अपने खुद के विकास क्रम में और तटस्थता की नीति में पूरी तरह शामिल था।’’
अमेरिकी विदेश विभाग की ओर से अब गोपनीयता के दायरे से बाहर किए जा चुके कुछ दस्तावेजों के अनुसार 16 दिसंबर, 1971 को बांग्लादेश के अलग देश बनने के बाद तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन को किसिंजर ने बताया था कि उन्होंने ‘पश्चिम पाकिस्तान को बचा लिया है’। किसिंजर ने भारत के पहले परमाणु परीक्षण के कुछ महीने बाद अक्टूबर 1974 में इंदिरा गांधी के साथ अपनी बैठक का विवरण तत्कालीन राष्ट्रपति गेराल्ड फोर्ड को दिया था। उन्होंने एक बार यह भी कहा था कि पूर्ववर्ती अमेरिकी रिपब्लिकन प्रशासन हमेशा कहता था कि काश! उसके पास गांधी जैसा मजबूत व्यक्ति होता।
