POJK यानी पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में हालात काफी चिंताजनक बने हुए हैं। पाकिस्तानी सेना की तरफ से यहां शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों पर खुलेआम गोलियां चलाई जा रही हैं। पाकिस्तान का सेनाध्यक्ष असीम मुनीर 'जनरल डायर' बनने पर आमादा है। उसके सैनिक निर्दोष कश्मरियों को खुलेआम मार रहे हैं। POJK में कश्मीरियों की खुलेआम हो रही इन हत्याओं की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आलोचना हो रही है। UK के बर्मिंघम में पाकिस्तानी वाणिज्य दूतावास के बाहर ब्रिटिश कश्मीरियों ने जूते-चप्पल रखकर POJK के रावलकोट में हुई हत्याओं और हिंसा के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने पाकिस्तानी सेना विरोधी नारे लगाए और POJK में कश्मीरियों के खिलाफ हो रही हिंसा तुरंत बंद करने की मांग की। ऐसा पहली बार नहीं है, जब पाकिस्तानी सेना नागरिकों के खिलाफ इस तरह की हिंसात्मक कार्रवाई कर रही है। अभी POJK में प्रदर्शनकारियों को गोलियों से भूना जा रहा है, यह वही पाकिस्तान है जिसने अपने ही देश में जनता के खिलाफ टैंक उतार दिए थे। चलिए जानते हैं -
बातचीत फेल हुई तो आम लोगों पर गोलियां चला दीं
पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तानी सेना की दमनकारी नीति जारी है। मुजफ्फराबाद में ज्वाइंट आवामी एक्शन कमेटी (JAAC) और प्रशासन के बीच बातचीत फेल हो गई। रावलकोट में प्रदर्शनकारियों पर पाकिस्तानी सेना ने खुलेआम गोलियां चला दीं। पाकिस्तान और उसकी सेना की यह दमनकारी नीति नई नहीं है। पाकिस्तान में सरकार और सेना के खिलाफ उठने वाली आवाज को हमेशा ही इस तरह से जबरन दबाया जाता रहा है। पाकिस्तानी सेना अपने ही नागरिकों पर गोलियां और यहां तक कि मिसाइल और टैंक चलाने से भी बाज नहीं आती। POJK ताजा उदाहरण जरूर है, लेकिन इतिहास में पाकिस्तान और उनके सैन्य हुकमरानों ने ऐसा पाप कई बार किया है। पाकिस्तान के इतिहास में पूर्वी पाकिस्तान, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे क्षेत्रों में ऐसे कई दौर रहे हैं, जहां राजनीतिक अधिकारों, स्वायत्तता या सुरक्षा को लेकर लोगों ने आवाज उठाई, तो पाकिस्तान ने उन आवाजों को जबरन दबा दिया।
पूर्वी पाकिस्तान में Operation Searchlight
पाकिस्तानी सेना की अपने ही नागरिकों के खिलाफ हिंसात्मक दमन की नीति का सबसे बड़ा उदाहरण 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में चलाया गया ऑपरेशन सर्चलाइट है। 25 मार्च 1971 को पाकिस्तानी सेना ने बंगाली राष्ट्रवादी आंदोलन और राजनीतिक असहमति को दबाने के लिए वहां ऑपरेशन सर्चलाइट की शुरुआत की। अभियान में राजनीतिक कार्यकर्ताओं, छात्रों और बुद्धिजीवियों सहित बड़ी संख्या में लोगों को निशाना बनाया गया। सरकार से प्रश्न पूछने की हिम्मत करने वाले लोगों को गोली खाकर इसकी कीमत चुकानी पड़ी। पाकिस्तानी सेना के जवानों ने हजारों बंगाली महिलाओं के साथ बलात्कार किया। विरोध में उठने वाली हर आवाज को ढूंढ-ढूंढकर हमेशा के लिए बंद कर दिया गया। हालांकि, बाद में मुक्ति संग्राम तेज हुआ और भारत के सहयोग से 16 दिसंबर 1971 को बांग्लादेश अलग देश बना।

पाकिस्तान की दमनकारी नीति बहुत पुरानी है
बलूचिस्तान में सैन्य कार्रवाई
बलूचिस्तान में लंबे समय से अलग राष्ट्र की मांग करने वाले आंदोलनकारियों और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के बीच संघर्ष चला आ रहा है। मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि सुरक्षा अभियानों के दौरान बड़ी संख्या में अलग राष्ट्र की मांग करने वाले बलोच राष्ट्रवादियों को जबरन गायब कर दिया जाता है। 1973-74 में पाकिस्तानी सेना ने बलूचिस्तान में अलग राष्ट्रवादी आंदोलन को कुचलने के लिए बड़ी सैन्य कार्रवाई की। हालांकि, पाकिस्तान की तरफ से 1948 से ही ऐसी दमनकारी नीति बलूचिस्तान में अपनाई जाती रही है। 2004 से अब तक पाकिस्तानी सेना बलूचिस्तान में लगातार लोगों की आवाज दबाने की कोशिशों में जुटी हुई है। इस दौरान कई बलोच नेताओं को मौत के घाट उतार दिया गया, जबकि कई को हमेशा के लिए गायब कर दिया गया। साल 2026 में भी स्थानीय मानवाधिकार समूहों ने बड़ी संख्या में कथित जबरन गुमशुदगी और हत्याओं के मामले दर्ज किए हैं।
पश्तून इलाकों में पाकिस्तान के सैन्य अभियान
खैबर पख्तूनख्वा और पूर्व FATA क्षेत्रों में भी पाकिस्तानी सेना ने अपने अभियानों के दौरान बड़ी संख्या में आम नागरिकों को निशाना बनाया। ऑपरेशन Zarb-e-Azb और अन्य अभियानों के बाद बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े। अमेरिकी विदेश विभाग की रिपोर्ट में भी इन अभियानों से विस्थापित परिवारों और उनके पुनर्वास का जिक्र मिलता है। अकेले उत्तरी वजीरिस्तान से ही जुलाई 2014 तक 9 लाख, 29 हजार से ज्यादा लोगों के विस्थापित होने की रिपोर्ट्स हैं। 140 आम लोगों, जिनमें ज्यादातर बच्चे थे भी पाकिस्तान सेना की ज्यादती की भेंट चढ़ गए।
POJK में भी विरोध प्रदर्शनों पर सवाल
हाल के वर्षों में पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर में महंगाई, बिजली और बुनियादी सुविधाओं जैसे मुद्दों को लेकर बड़े स्तर पर प्रदर्शन हुए हैं। इन आंदोलनों के दौरान पाकिस्तानी पुलिस और सेना की बर्बर कार्रवाई को लेकर स्थानीय लोगों में भारी गुस्सा है।
