Viral News: एक रेडिट यूजर ने यह दावा करके सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी है कि भारतीय प्रवासी कनाडा की अर्थव्यवस्था को बचाए हुए हैं। रेडिट पर 'भारतीय कनाडाई लोगों के प्रति गहरा सम्मान' टाइटल से एक पोस्ट की गई है। इसमें यूजर द्वारा बताया गया है कि वे लगभग एक दशक बाद हाल ही में टोरंटो गए और उन्होंने देखा कि भारतीय मैकडॉनल्ड्स से लेकर वॉलमार्ट तक, विभिन्न व्यवसायों में काम कर रहे हैं। यूजर ने भारतीय कामगारों की तारीफ करते हुए लिखा, 'मैंने अब तक जितने भी लोगों से मुलाकात की है, उनमें ये सबसे मिलनसार और हनती लोग हैं।' यूजर ने अमेरिका में अपने अनुभव से भी तुलना करते हुए कहा कि, 'यह घमंडी हाई स्कूल के छात्रों का एक समूह है जो सोचते हैं कि वे इतने अच्छे हैं कि कोई मेहनत नहीं कर सकते।'
अपनी पोस्ट की शुरुआत यूजर ने ये बताने से की कि, वे लगभग एक दशक के बाद पिछले दो हफ़्तों से टोरंटो में थे। आगे वे बताते हैं कि, 'भारतीय सचमुच कनाडा की अर्थव्यवस्था को बचाए हुए हैं। मैकडॉनल्ड्स से लेकर वॉलमार्ट तक, हर एक व्यवसाय में भारतीय हैं। मैंने अब तक जितने भी लोगों से मुलाकात की है, उनमें से कुछ सबसे मिलनसार और मेहनती लोग हैं। उन राज्यों से यह बहुत बड़ा सुधार है जहां घमंडी हाई स्कूल के छात्रों का एक समूह है जो सोचते हैं कि वे बहुत अच्छे हैं और कोई भी प्रयास नहीं करना चाहिए।' अंत में वे ये भी लिखते हैं कि, 'यह स्पष्ट है कि श्वेत लोगों द्वारा किया जाने वाला नस्लवाद केवल इसलिए है क्योंकि वे इस बात से नाराज हैं कि ये लोग अभी-अभी कनाडा आए हैं और उनसे अधिक लाभ उठा रहे हैं तथा समाज में उनसे अधिक योगदान दे रहे हैं।' इस पोस्ट पर सोशल मीडिया यूज़र्स की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आई हैं। कुछ लोग मूल पोस्ट करने वाले से सहमत थे, तो कुछ ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया।
एक यूजर ने लिखा, 'मैं इस पोस्ट से 100% सहमत हूं। कोविड के दौरान, अगर भारत के लोग इन नौकरियों में काम नहीं करते, तो यह देश गंभीर संकट में होता।' दूसरे ने कहा कि, 'हां, वास्तव में, एक कनाडाई होने के नाते मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूं।' तीसरे ने कहा कि, 'यह बिल्कुल सच है।' एक अन्य यूजर ने कहा कि, 'अगर देश में बेरोज़गारी दर ज़्यादा है और सरकार/कंपनियां मज़दूरी कम रखने के लिए आप्रवासन का इस्तेमाल कर रही हैं, तो यह अच्छी बात नहीं है। कनाडा में यही हो रहा है। संसाधनों के बिना अनियंत्रित आप्रवासन या उसे समर्थन देने की अनिच्छा, सिर्फ़ दूसरी समस्याओं को जन्म देती है। यह आप्रवासियों की गलती नहीं है, बल्कि सरकार/व्यवसायों की गलती है, जो लोगों की समस्याओं का समाधान करने से इनकार करते हैं और इसके बजाय मुनाफ़ा कमाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं।'
