मौजूदा समय में हर महीने हम सभी कई सारे बिल और ईएमआई के जाल में फंसे हुए हैं। घर की EMI, कार की ईएमआई, बिजली बिल, सोसाइटी मेंटेनेंस बिल, वाई-फाई बिल, मोबाइल बिल आदि। इस चक्कर में कई दफा हम तय समय पर बिल भराना भुल जाते हैं और बाद में लेट फीस और पेनल्टी का भुगतान करना पड़ता है। इतना ही नहीं, लेट फीस, अतिरिक्त ब्याज, सर्विस बंद होने और कुछ मामलों में क्रेडिट हिस्ट्री पर भी असर होता है। अब सवाल होता है कि हम इससे बच कैसे सकते हैं। आइए आपको वो तरीका बताते हैं जिससे आप बिना भूले समय पर सभी जरूरी बिल का भुगतान कर पाएंगे।
पहला सवाल-बिल का पेमेंट क्यों छूट जाता है?
लोग अक्सर जानबूझकर बिल नहीं टालते। समस्या तब होती है जब अलग-अलग बिल अलग-अलग तारीखों और माध्यमों से आते हैं। बिजली या पानी का बिल ऐप पर आता है, क्रेडिट कार्ड का स्टेटमेंट ईमेल में और इंश्योरेंस प्रीमियम का रिमाइंडर मैसेज से मिल सकता है। ऐसे में अगर सभी बिलों का एक सिस्टम न हो तो कोई न कोई पेमेंट छूट सकता है।
समय पर बिल भरने के लिए क्या करें?
बिल का पेमेंट मिस होने से बचने का पहला कदम है सभी नियमित खर्चों की एक मास्टर लिस्ट बनाए। इसमें किराया, होम या पर्सनल लोन की EMI, क्रेडिट कार्ड, बिजली-पानी का बिल, मोबाइल-इंटरनेट, इंश्योरेंस प्रीमियम और डिजिटल सब्सक्रिप्शन शामिल करें। हर बिल के सामने उसकी रकम, ड्यू डेट और पेमेंट का तरीका लिखें। यह लिस्ट नोटबुक, एक्सेल शीट, मोबाइल नोट्स या बजटिंग ऐप में बनाई जा सकती है। इससे आपको एक नजर में पता रहेगा कि महीने में कब और कितना पैसा जाना है।
ड्यू डेट से पहले लगाएं रिमाइंडर
सिर्फ ड्यू डेट का रिमाइंडर लगाना पर्याप्त नहीं है। बेहतर तरीका है कि पेमेंट से करीब एक सप्ताह पहले पहला अलर्ट और डेडलाइन से एक-दो दिन पहले दूसरा रिमाइंडर सेट करें। इससे आपके पास बिल चेक करने, अकाउंट में पैसे रखने या पेमेंट से जुड़ी समस्या होने पर उसे ठीक करने का समय रहेगा। खासकर क्रेडिट कार्ड और EMI जैसे पेमेंट में यह आदत काफी उपयोगी हो सकती है।
किन बिलों के लिए ऑटो-पे बेहतर है?
किराया, इंश्योरेंस प्रीमियम और कई तरह की EMI के लिए ऑटो-पे बेहतर हो सकता है। इससे ड्यू डेट भूलने का जोखिम कम होता है। हालांकि, हर बिल को ऑटो-पे पर डालना जरूरी नहीं है। बिजली, पानी या गैस जैसे बिलों की रकम हर महीने बदल सकती है। क्रेडिट कार्ड में भी स्टेटमेंट चेक करने के बाद पेमेंट करना कई लोगों के लिए बेहतर विकल्प हो सकता है। ऑटो-पे चालू होने के बावजूद हर महीने स्टेटमेंट जरूर देखें, ताकि गलत या डुप्लीकेट चार्ज का पता चल सके।
पेमेंट अकाउंट में रखें कैश बफर
ऑटोमैटिक पेमेंट के लिए अकाउंट में पर्याप्त पैसा होना जरूरी है। सिर्फ बिल की रकम जितना बैलेंस रखने के बजाय थोड़ा अतिरिक्त कैश बफर रखना बेहतर है। इससे अचानक लगने वाले चार्ज या इनकम और पेमेंट की तारीख के बीच अंतर की स्थिति में पेमेंट फेल होने का जोखिम कम हो सकता है। बैंक में लो-बैलेंस अलर्ट भी चालू कर सकते हैं, ताकि अकाउंट में पैसे कम होने पर आपको समय रहते जानकारी मिल जाए।
हर महीने सब्सक्रिप्शन की समीक्षा करें
स्ट्रीमिंग सर्विस, ऐप और सॉफ्टवेयर के सब्सक्रिप्शन अक्सर अपने-आप रिन्यू हो जाते हैं। हर महीने एक बार ऐसे सभी पेमेंट की समीक्षा करें। जिन सर्विस का इस्तेमाल नहीं हो रहा है, उन्हें बंद कर दें। छोटी-छोटी रकम भी लंबे समय में आपके बजट पर असर डाल सकती है।
आपकी इनकम अगर रेगुलर नहीं है?
अगर आपकी इनकम हर महीने एक ही तारीख को नहीं आती है, तो सिर्फ ड्यू डेट का इंतजार न करें। पैसे मिलते ही जरूरी बिलों और EMI के लिए रकम अलग रखना बेहतर है। घर, यूटिलिटी, इंश्योरेंस और लोन जैसे जरूरी पेमेंट को गैर-जरूरी खर्चों से पहले प्राथमिकता दें। हर हफ्ते सिर्फ पांच मिनट निकालकर आने वाले बिल, अकाउंट बैलेंस और ऑटोमैटिक पेमेंट चेक करना भी काफी मददगार हो सकता है।
बिल पेमेंट मैनेज करने की आसान चेकलिस्ट
- सभी बिलों और EMI की मास्टर लिस्ट बनाएं।
- हर ड्यू डेट के लिए पहले से रिमाइंडर लगाएं।
- फिक्स्ड पेमेंट पर जरूरत के अनुसार ऑटो-पे इस्तेमाल करें।
- पेमेंट अकाउंट में थोड़ा अतिरिक्त बैलेंस रखें।
- हर महीने बैंक और क्रेडिट कार्ड स्टेटमेंट चेक करें।
- गैर-जरूरी सब्सक्रिप्शन बंद करें।
- हर हफ्ते पांच मिनट बिल और अकाउंट की समीक्षा करें।
आखिरकार, हर बिल की तारीख याद रखने की जरूरत नहीं है। बेहतर तरीका एक ऐसा सिस्टम बनाना है जो आपकी जगह काम करे। रिमाइंडर, चुनिंदा ऑटो-पे, पर्याप्त कैश बफर और नियमित स्टेटमेंट चेक की आदत से लेट फीस और पेमेंट मिस होने का जोखिम कम किया जा सकता है।
