लद्दाख घूमने का प्लान बनाते ही ज्यादातर लोगों के दिमाग में सबसे पहले पैंगोंग त्सो का नाम आता है। नीला पानी, ऊंचे पहाड़ और चारों तरफ फैला सन्नाटा इसे बेहद खास बनाते हैं। वैसे लद्दाख में एक ऐसी झील भी है, जो खूबसूरती के मामले में पैंगोंग को कड़ी टक्कर देती है। खास बात यह है कि यहां पहुंचने वाले पर्यटकों की संख्या भी तुलनात्मक रूप से कम है। यह झील है त्सो मोरीरी।
पूर्वी लद्दाख के चांगथांग पठार में करीब 4,522 मीटर की ऊंचाई पर स्थित त्सो मोरीरी को देखकर पहली नजर में यकीन करना मुश्किल हो सकता है कि आप भारत में हैं। कई बार इसका नीला पानी और आसपास का सुनसान पहाड़ी इलाका किसी विदेशी जगह जैसा लगता है।
नीला पानी और सुनहरे पहाड़
त्सो मोरीरी की खूबसूरती का सबसे बड़ा आकर्षण इसका पानी है। मौसम और रोशनी के हिसाब से झील का रंग गहरे नीले से लेकर हल्के फिरोजी तक दिखाई दे सकता है। इसके आसपास भूरे और सुनहरे रंग के ऊंचे-नीचे पहाड़ हैं और ऊपर साफ नीला आसमान।
यहां पैंगोंग की तरह हर जगह पर्यटकों की भीड़ या तस्वीरें खिंचवाने के लिए लंबी कतारें देखने को नहीं मिलतीं। दूर तक फैली झील, पहाड़, तेज हवा और गहरा सन्नाटा मिलकर ऐसा माहौल बनाते हैं, जिसे महसूस करना किसी अनुभव से कम नहीं। त्सो मोरीरी करीब 26 किलोमीटर लंबी और 3 से 5 किलोमीटर चौड़ी है। इसकी सतह करीब 120 वर्ग किलोमीटर में फैली हुई है।
भारत में ही है पूरी झील
त्सो मोरीरी की एक खास बात यह भी है कि यह पूरी तरह भारत की सीमा के अंदर है। वहीं पैंगोंग त्सो का एक हिस्सा भारत में और दूसरा चीन में है। लेह से त्सो मोरीरी की दूरी करीब 220 किलोमीटर है। आम रास्ता चुमाथांग होते हुए करजोक गांव तक पहुंचता है। सड़क और ऊंचाई को देखते हुए यहां पहुंचने में करीब छह से सात घंटे लग सकते हैं।
हालांकि इसे लेह से एक दिन में जाकर वापस आने वाली जगह समझना ठीक नहीं है। रास्ता लंबा है, कुछ हिस्सों में सड़क खराब मिल सकती है और ऊंचाई भी काफी ज्यादा है। इसलिए यहां रात रुककर आराम से घूमना बेहतर रहता है।
सिर्फ खूबसूरत नहीं, पर्यावरण के लिहाज से भी खास
त्सो मोरीरी सिर्फ घूमने की जगह नहीं है। यह पर्यावरण के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण है। इसे अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि यानी रामसर स्थल का दर्जा मिला हुआ है।
झील और इसके आसपास का इलाका कई दुर्लभ पक्षियों का घर है। यहां काली गर्दन वाली सारस यानी ब्लैक-नेक्ड क्रेन देखी जा सकती है। इसके अलावा तिब्बती जंगली गधा, जिसे कियांग कहा जाता है, भी आसपास दिखाई दे सकता है। किस्मत अच्छी हो तो ऊंची पहाड़ियों पर हिम तेंदुए की झलक भी मिल सकती है।
करजोक गांव में रुक सकते हैं
झील के किनारे करजोक गांव इस इलाके की प्रमुख बस्ती है। यहां कुछ सामान्य ठहरने की जगहें और स्थानीय परिवारों द्वारा चलाए जाने वाले घर मिल जाते हैं। आसपास आपको चांगपा समुदाय के लोग भी दिखाई दे सकते हैं, जो पारंपरिक रूप से याक और पश्मीना बकरियां पालते हैं।
यहां की एक खास बात यह भी है कि झील के आसपास मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं रहता। आखिरी कनेक्टिविटी चुमाथांग के आसपास मिल सकती है, जो करीब 70 किलोमीटर दूर है। शायद यही वजह है कि त्सो मोरीरी उन लोगों को ज्यादा पसंद आएगी जो कुछ दिनों के लिए मोबाइल और लगातार आती सूचनाओं से दूर रहना चाहते हैं।
कब जाएं?
सर्दियों में त्सो मोरीरी पूरी तरह जम जाती है। इसलिए ज्यादातर पर्यटक मई से सितंबर के बीच यहां पहुंचते हैं। अगर पक्षियों को देखने में दिलचस्पी है तो जून से सितंबर का समय अच्छा माना जाता है। दिन में मौसम सुहावना हो सकता है, लेकिन रात में तापमान काफी नीचे चला जाता है। इसलिए गर्म कपड़े साथ रखना जरूरी है।
त्सो मोरीरी की असली खूबसूरती शायद इसी बात में है कि यहां पहुंचना थोड़ा मुश्किल है। रास्ता लंबा है, नेटवर्क नहीं है और चारों तरफ सन्नाटा है। लेकिन जब सामने नीले पानी की विशाल झील और उसके पीछे सुनहरे पहाड़ दिखाई देते हैं, तो शायद आपको लगेगा कि इतनी दूर आना बिल्कुल सही फैसला था।
लद्दाख की यात्रा में अगर पैंगोंग पहले से आपकी सूची में है, तो त्सो मोरीरी को भी उसमें जरूर शामिल कर लीजिए। हो सकता है लौटते वक्त आपकी सबसे खूबसूरत याद पैंगोंग नहीं, यही शांत और रहस्यमयी झील बन जाए।
