स्पोर्ट्स डेस्क, नई दिल्ली। दीपा मलिक ने बताया कि कैसे एक सफाई कर्मचारी ने पैरालिसिस के बाद उनकी जिंदगी बदल दी। सफाई कर्मचारी से प्रेरणा लेकर दीपा मलिक ने इतिहास रचा और दूसरों के लिए उनकी प्रेरणा बन गईं। उन्होंने मुश्किलों को मौके में बदल दिया। उन्हें 29 साल की उम्र में स्पाइनल ट्यूमर का पता चला था और उन्हें तीन सर्जरी करवानी पड़ीं, जिससे उनकी कमर के नीचे का हिस्सा पैरालाइज हो गया।
हालांकि, वह 2016 में रियो डी जनेरियो गेम्स में शॉट पुट- F53 कैटेगरी में भारत की पहली पैरालिंपिक मेडलिस्ट बनने में कामयाब रहीं। इससे पहले वह 2010 में पैरा एशियन गेम्स में मेडल जीतने वाली भारत की पहली महिला एथलीट भी थीं और कॉन्टिनेंटल शोपीस इवेंट के लगातार तीन एडिशन में मेडल जीतने वाली अकेली एथलीट बनी हुई हैं।
दीपा ने मुश्किल दिनों की बताई कहानी
एक पैनल चर्चा के दौरान टाइम्स नाउ अमेजिंग इंडियन अवार्ड्स शो में दीपा ने बताया कि उन्हें हॉस्पिटल में काम करने वाले एक वर्कर ने प्रेरित किया था, जहां वह अपने ठीक होने के समय थीं। उन्होंने दावा किया कि उन्हें उनकी हेल्थ कंडीशन के बावजूद शांत और पॉजिटिव रहना सिखाया।
दीपा ने कहा, अपने शरीर और अपने पैरालिसिस को स्वीकार करने का सबसे बड़ा सबक मुझे एक बूढ़ी औरत से मिला, जिसने मेरे ऑपरेशन के बाद मेरी देखभाल की। वह न्यूरोलॉजिकल वार्ड में सफाई कर्मचारी थी और वह काम करती थी जो कोई नहीं करना चाहता था- मुझे बेडपैन देने से लेकर कैथेटर लगाने और मेरे डायपर बदलने तक। एक दिन, उसके बच्चे उससे मिलने आए। वे दोनों सरकारी कर्मचारी के तौर पर बहुत अच्छा कर रहे थे, और मैंने उससे कहा कि उसे अब यह काम करने की जरूरत नहीं है। उसने मुझसे कहा, 'यही वह काम है जिसने मुझे एक सिंगल मदर के तौर पर अपने बच्चों को पढ़ाने और उन्हें बेहतर जिंदगी देने की ताकत दी।
सफाई कर्मचारी ने दी प्रेरणा
दीपा ने कहा, वह कभी स्कूल नहीं गई थीं, लेकिन 35 साल से ज्यादा न्यूरोलॉजिकल वार्ड में काम करने के बाद, उन्होंने मुझसे कहा, 'बेटा, मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूं, लेकिन मुझे इतना पता है कि इसके बाद आप चलोगे नहीं। आप जिंदा रहोगे, लेकिन इसी शरीर में।' उन्होंने मुझे सिखाया कि जो चीज आपको जिंदगी में आगे बढ़ने का रास्ता देती है, उस पर गर्व और शुक्रगुजार रहो और तुम जैसे हो, उसे स्वीकार करो और उससे प्यार करो। वह हमेशा कहती थीं, 'सर पे बर्फ और मुंह में चीनी रखना, जिंदगी गुजर जाएगी'
उन्होंने आगे कहा, उसका मतलब था, शांत, पॉजिटिव और शांतिपूर्ण रहें और लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करें। शिकायत करते रहें या बुरा न बोलें क्योंकि जब आपको मदद की जरूरत हो, तो आपके आस-पास के लोगों को आपके लिए वहां होना चाहिए। इस शरीर को स्वीकार करना और फिर कुछ अच्छे काम करना, यह सबसे बड़ा सबक मैंने उस महिला की वजह से सीखा जिसने मेरा ख्याल रखा।
दीपा ने कहा, मुझे वहीं अपनी मंजिल मिली। मुश्किलों के बीच मैंने खुद से पूछा था 'मैं इसे बेहतर बनाने के लिए क्या कर सकती हूं?' वहां से, मैंने ऐसे काम किए जो अलग थे- ऊंचे दर्रों पर गाड़ी चलाना, सीने के नीचे पैरालिसिस होने पर भी बहाव के खिलाफ यमुना में तैरना और 40 साल की उम्र में खेल शुरू करना। मैं पुरानी सोच को तोड़ना चाहती थी और भारत को ज्यादा सबको साथ लेकर चलने वाला बनाना चाहती थी, ताकि हर भारतीय बराबर मौके और बराबरी का सही मतलब समझे, और कमियों से परे अपनी काबिलियत को सेलिब्रेट करे।
