खेल की एक खासियत होती है कि वह खिलाड़ी वापसी करने के लिए प्रेरित करती है। कभी हार ना मानने का जुनून अपने आप खिलाड़ियों में आ जाता है। चाहे वो कोई भी खेल हो खिलाड़ी अंतिम क्षण तक बाजी पलटने की उम्मीद में लगा रहता है। ग्लासगो 2026 में जब 57 किलोग्राम भारवर्ग में भिवानी की रहने वाली जैस्मिन लंबोरिया ने गोल्ड मेडल जीता तो पूरा देश उनके इस उपलब्धि पर झूम उठा। यह राष्ट्रमंडल खेलों में उनका लगातार दूसरा मेडल था। 4 चाल पहले उन्होंने बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेलों में कांस्य पदक जीता था और अब गोल्ड जीतकर लंबी छलांग लगाई है।
रिंग में उतरने से पहले का संघर्ष
एक बार जब जैस्मिन रिंग में उतरी तो उन्होंने हर मुकाबले में डॉमिनेट किया और पहले बाउट से ही मेडल की मजबूत दावेदार के रूप उभरी। लेकिन इसके पीछे बीते कुछ महीनों का कठिन संघर्ष छिपा था। उनकी मुश्किलें मार्च में एशियाई चैंपियनशिप के दौरान शुरू हुईं, जब तेज बुखार के बावजूद उन्होंने प्रतियोगिता से हटने से इनकार कर दिया। लगातार तीन कठिन मुकाबले जीतकर वह फाइनल में पहुंचीं, जहां रजत पदक जीतने के साथ राष्ट्रमंडल खेलों के लिए सीधे क्वालीफाई किया।
जैस्मिन ने सुनाई आपबीती
जैस्मिन ने ’पीटीआई’ कहा, ’’ पहला मुकाबला खेलने के बाद ही मुझे तेज बुखार हो गया था। मेरी हालत काफी खराब थी। किसी तरह मैं सेमीफाइनल तक पहुंची, जहां मैंने बेहद कठिन मुकाबले में 3-2 से जीत दर्ज की। वे तीनों मुकाबले मेरे लिए बेहद कठिन रहे, लेकिन मैंने अपना सब कुछ झोंक दिया था।’’
एशियाई चैंपियनशिप के फाइनल में उनके सिर पर जोरदार चोट लगी, जिससे उन्हें ’कनकशन’ (अचेत होने जैसी स्थिति) हो गया। डॉक्टरों ने उनका तत्काल स्कैन किया लेकिन राहत की बात यह रही कि सभी रिपोर्ट सामान्य आईं। भारत लौटने के बाद फिर से बीमार पड़ने से उनकी परेशानियां खत्म नहीं हुईं।
उन्होंने कहा, ’’ मैंने भारत लौटने के बाद लगभग 20 दिन अभ्यास किया, लेकिन फिर तेज बुखार की चपेट में आ गईं। हालत इतनी बिगड़ गई कि मुझे अस्पताल में भर्ती होना पड़ा और लंबे समय तक दवाइयां लेनी पड़ीं।’’ जैस्मिन ने कहा, ’’मुझे नहीं पता यह कैसी बीमारी थी। बस यही उम्मीद है कि सब कुछ ठीक हो और मैं पूरी तरह स्वस्थ हो जाऊं।’’

जैस्मिन लंबोरिया (साभार-X)
ट्रेनिंग में नहीं हो पाई शामिल
बीमारी के कारण वह जून में चेक गणराज्य में आयोजित भारत के एक्सपोजर कैंप (विदेश में आयोजित अभ्यास शिविर) में हिस्सा नहीं ले सकीं, जिससे राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियां बुरी तरह प्रभावित हुईं। 57 किग्रा वर्ग एशियाई खेलों के कार्यक्रम में शामिल नहीं है, इसलिए यही प्रतियोगिता उनके लिए वर्ष की सबसे बड़ी चुनौती थी। लंबे समय तक खेल से दूर रहने का असर उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ा। उन्होंने कहा, ’’मेरे मन में काफी नकारात्मक विचार आने लगे थे। मैंने खेल मनोवैज्ञानिक के साथ काम किया और उन्होंने लगातार मेरा उत्साह बढ़ाया।’’
जुलाई में शुरू की प्रैक्टिस
जैस्मिन एक जुलाई से ही दोबारा नियमित प्रशिक्षण शुरू कर सकीं। ऐसे में उन्हें राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी के लिए एक महीने से भी कम समय मिला।
उन्होंने बताया, ’’ सभी कोच ने मेरा पूरा साथ दिया। उन्होंने (कोच) कहा कि धीरे-धीरे फिटनेस हासिल करो और नतीजे की चिंता मत करो। सिर्फ आत्मविश्वास बनाए रखो।’’ महीनों की बीमारी, अधूरी तैयारियों और तमाम चुनौतियों के बीच ग्लास्गो में जीता गया यह स्वर्ण पदक जैस्मिन के लिए किसी भी अन्य खिताब से कहीं अधिक मायने रखता है। उन्होंने कहा, ’’मैं बहुत खुश हूं। मैं यहां अपने पदक का रंग बदलने और भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतने के लक्ष्य के साथ आई थी।’’
