शबे मेराज का मतलब क्या है, शबे मेराज को क्या हुआ था, शब-ए-मेराज क्यों मनाया जाता है
- Authored by: Mohit Tiwari
- Updated Jan 16, 2026, 08:43 AM IST
Shab-e-Meraj 2026: 16 जनवरी 2026 को शब-ए-मेराज यानी बेहद पाक रात है। शब-ए-मेराज दो अरबी शब्दों से मिलकर बना है। इसमें शब का मतलब है रात और मेराज का मतलब है ऊंचाई की तरफ उठाया जाना है। इस तरह शबे मेराज का अर्थ हुआ वह मुकद्दस रात, जब अल्लाह ने अपने आखिरी नबी हजरत मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को खास तौर पर अपने करीब बुलाया और उन्हें खास सम्मान अता किया। इस रात को इस्लाम में बहुत पाक और बरकत वाली माना जाता है। आइए जानते हैं कि इस रात को क्या हुआ था।
शब-ए-मेराज की रात क्या हुआ था
Shab-e-Meraj 2026: आज 16 जनवरी 2026 को शब-ए-मेराज की पाक रात है। यह इस्लामिक कैलेंडर के रजब महीने की 27वीं रात होती है। शब-ए-मेराज इस्लाम की सबसे महत्वपूर्ण और चमत्कारी रातों में से एक है। इसका मतलब है ‘मेराज की रात’ या ‘ ऊंचाई की तरफ उठाए जाने की रात’। शब का मतलब फारसी में रात होता है। मेराज का मतलब ऊपर उठना या आसमानों की यात्रा होता है (यह अरबी में "मि'राज" से लिया गया है)। इस रात पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अल्लाह की विशेष कृपा से एक अद्भुत आध्यात्मिक यात्रा की, जिसे अल-इसरा वल-मेराज कहा जाता है।
शब-ए-मेराज की रात को क्या हुआ था?
इस्लामी मान्यताओं के अनुसार, शबे मेराज की रात इसरा और मेराज का वाकया पेश आया। सबसे पहले हजरत मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को मक्का की मस्जिद अल-हरम से यरुशलम की मस्जिद-ए-अक्सा तक रात के सफर पर ले जाया गया, जिसे इसरा कहा जाता है। इसके बाद मेराज हुआ, जिसमें नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को आसमानों की सैर कराई गई। माना जाता है कि इस दौरान उन्होंने अलग-अलग आसमानों में कई नबियों से मुलाकात की और अल्लाह की तरफ से खास रहमत हासिल की।
इस्लामिक स्कॉलर्स की मानें तो उस रात पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मक्का में मस्जिद अल-हरम के पास थे। फरिश्ता जिब्रील अलैहिस्सलाम आए और पैगंबर के सीने को चीरकर उसे ज़मज़म के पानी से धोया। फिर एक सफेद, तेज़ रफ्तार जानवर बुराक पर सवार होकर पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यात्रा शुरू की।
दो हिस्सों में हुई थी यह यात्रा
इसरा (रात की यात्रा): पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मक्का से बैतुल मुकद्दस (यरुशलम में मस्जिद-ए-अक्सा) तक गए। वहां उन्होंने पिछले सभी पैगंबरों (जैसे हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम, हजरत मूसा अलैहिस्सलाम, हजरत ईसा अलैहिस्सलाम) की इमामत में नमाज़ पढ़ी।
मेराज (आसमानों की यात्रा): मस्जिद-ए-अक्सा से जिब्रील अलैहिस्सलाम पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को सातों आसमानों पर ले गए। हर आसमान पर अलग-अलग पैगंबरों से मुलाकात हुई। सातवें आसमान से आगे सिद्ध मुकाम तक पहुंचकर जिब्रील अलैहिस्सलाम रुक गए। पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अकेले आगे बढ़े और अल्लाह से बिना किसी परदे के सीधी बातचीत की। यह किसी इंसान के लिए सबसे बड़ा सम्मान था।
इस रात अल्लाह ने मुसलमानों पर नमाज़ फर्ज़ की। शुरू में ये 50 थीं, लेकिन पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की दुआ से 5 हो गईं। हालांकि सवाब 50 का ही होता है। इसके साथ ही सूरह अल-बक़रा की आखिरी दो आयतें (285-286) नाज़िल हुईं। पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जन्नत-जहन्नम के दृश्य भी देखे।
शब-ए-मेराज क्यों मनाया जाता है?
यह रात इसलिए मनाई जाती है क्योंकि यह अल्लाह और उसके बंदे के बीच गहरे रिश्ते का प्रमाण है। इस रात नमाज़ फर्ज़ हुई, जो इस्लाम का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दुखों के साल ('आम-उल-हुज़न') के बाद अल्लाह ने उन्हें सांत्वना और सम्मान दिया। यह रात ईमान, इबादत और अल्लाह की निकटता की याद दिलाती है।
पूरी रात पढ़ी जाती है नमाज़
इस रात मुसलमान पूरी रात जागकर नमाज़ पढ़ते हैं, कुरान तिलावत करते हैं, तस्बीह और दुआएं मांगते हैं। यह त्योहार नहीं, बल्कि इबादत और तौबा की रात है। कुछ जानकार कहते हैं कि इसे विशेष पर्व की तरह मनाना सुन्नत नहीं है, लेकिन इबादत का खास महत्व जरूर है।
शब-ए-मेराज हमें सिखाती है कि अल्लाह की रहमत हर मुश्किल में मदद करती है और नमाज़ हमारे जीवन का सबसे मजबूत सहारा है। इस रात अल्लाह से दिल से दुआ मांगें, वे कबूल करते हैं।
डिसक्लेमर: यहां दी गईं जानकारियां पब्लिक डोमेन में उपलब्ध जानकारी पर आधारित हैं तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। Times Now Navbharat इसकी पुष्टि नहीं करता है।