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सावन में ये 9 उपाय दिलाएंगे कालसर्प दोष से मुक्ति, खत्म होंगी परेशानियां

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  • Updated Aug 3, 2026, 09:17 PM IST

Sawan Kalsarp Dosh Upay : सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। ज्योतिष के अनुसार अगर इस महीने में कुछ उपायों को किया जाए तो कालसर्प दोष के प्रभाव को कम किया जा सकता है।

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कालसर्प दोष से मुक्ति दिलाएंगे ये उपाय

Sawan Kalsarp Dosh Upay : सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस पूरे माह में भोलेनाथ की उपासना, रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय मंत्र का जाप और नाग देवता की पूजा विशेष फलदायी होती है। यही कारण है कि जिन लोगों की कुंडली में कालसर्प दोष बताया जाता है, वे भी सावन में भगवान शिव की विशेष पूजा करते हैं और इस दोष की शांति के लिए विभिन्न उपाय अपनाते हैं।

हालांकि, कालसर्प दोष को लेकर समाज में अनेक तरह की धारणाएं प्रचलित हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार किसी भी कुंडली का फल केवल एक योग या दोष से तय नहीं होता है। ग्रहों की शक्ति, भाव, दृष्टि, दशा, योगकारक ग्रह और अन्य अनेक कारक भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। इस कारण कालसर्प दोष को समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि यह वास्तव में क्या है, इसके कितने प्रकार बताए गए हैं और सावन में कौन-से उपाय पारंपरिक रूप से किए जाते हैं।

कालसर्प दोष क्या होता है

वैदिक ज्योतिष में जब जन्म कुंडली के सातों मुख्य ग्रह सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि राहु और केतु के बीच आ जाते हैं, तब उसे कालसर्प दोष या कालसर्प योग कहा जाता है। राहु और केतु स्वयं छाया ग्रह हैं और हमेशा एक-दूसरे से 180 डिग्री की दूरी पर रहते हैं। यदि सभी ग्रह इनके बीच सीमित हो जाएं तो यह विशेष ग्रह स्थिति बनती है।

कुछ ज्योतिषाचार्य इसे कालसर्प योग कहना अधिक उचित मानते हैं, क्योंकि हर व्यक्ति के जीवन में इसके परिणाम समान नहीं होते है। कई सफल, प्रतिष्ठित और प्रभावशाली लोगों की कुंडली में भी कालसर्प योग पाया गया है। इस कारण केवल इस योग के आधार पर भविष्य का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं माना जाता है।

सावन में कालसर्प दोष की शांति के लिए क्या करें

कालसर्प दोष से मुक्ति के लिए आप सावन में कुछ आसान से उपायों को कर सकते हैं। आइए जानते हैं कि वे क्या है।

प्रतिदिन या प्रत्येक सोमवार शिवलिंग का अभिषेक करें

सुबह स्नान के बाद भगवान शिव का जलाभिषेक करें। यदि संभव हो तो पंचामृत से अभिषेक करें और अंत में गंगाजल अर्पित करें। अभिषेक के दौरान ‘ॐ नमः शिवाय’ का निरंतर जप करें।

108 बेलपत्र अर्पित करें

सावन के सोमवार भगवान शिव को 108 बेलपत्र अर्पित करना शुभ माना जाता है। प्रत्येक बेलपत्र चढ़ाते समय ‘ॐ नमः शिवाय’ या बिल्वपत्र मंत्र त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रियायुधम्। त्रिजन्मपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम्॥ का उच्चारण करें।

महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें

कालसर्प दोष की शांति के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जाप सबसे अधिक प्रचलित उपायों में से एक है। श्रद्धानुसार 108, 1008 या सवा लाख जप का संकल्प लिया जाता है।

महामृत्युंजय मंत्र

ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ।

नागपंचमी पर नाग-नागिन का पूजन करें

नागपंचमी के दिन चांदी या तांबे के नाग-नागिन का जोड़ा स्थापित कर पूजा करें। पूजा के बाद इन्हें किसी शिव मंदिर में दान किया जा सकता है। कुछ परंपराओं में बहते जल में विसर्जन का भी उल्लेख मिलता है, लेकिन पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से मंदिर में दान करना अधिक उचित माना जाता है।

रुद्राभिषेक कराएं

यदि संभव हो तो सावन के किसी सोमवार या प्रदोष तिथि पर रुद्राभिषेक कराएं। इसमें श्रीरुद्रम और नमकम-चमकम का पाठ किया जाता है, जिसे शैव परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।

नाग देवता की पूजा करें

नागपंचमी के दिन नाग देवता का पूजन करें। उन्हें दूध चढ़ाने के बजाय नाग प्रतिमा या चित्र का पूजन करना अधिक उपयुक्त माना जाता है। जीवित सर्पों को दूध पिलाना वन्यजीव विशेषज्ञों द्वारा भी उचित नहीं माना जाता है।

शनिवार को करें विशेष उपाय

सावन के शनिवार किसी शिव मंदिर में सरसों के तेल का चौमुखी दीपक जलाएं और उसमें काले तिल अर्पित करें। इसके बाद भगवान शिव का ध्यान कर जीवन की बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना करें।

शिव पंचाक्षरी मंत्र का जप

प्रतिदिन कम से कम 108 बार ॐ नमः शिवाय का जाप करें। शैव परंपरा में इसे भगवान शिव का सबसे प्रभावशाली मंत्र माना गया है।

दान और सेवा करें

सावन में अन्नदान, वस्त्रदान, गौसेवा, गरीबों की सहायता तथा शिव मंदिर में पूजा सामग्री का दान भी शुभ माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि दान से पुण्य की वृद्धि होती है और मन में सकारात्मकता आती है।

क्या कालसर्प दोष हमेशा अशुभ होता है

ऐसा बिल्कुल नहीं है। यह सबसे बड़ी भ्रांति है कि कालसर्प दोष होने पर जीवन केवल संघर्षों से भरा रहेगा। वास्तव में इसका प्रभाव व्यक्ति की संपूर्ण जन्मकुंडली पर निर्भर करता है। यदि शुभ ग्रह मजबूत हों, राजयोग बन रहे हों या गुरु और शुक्र की शुभ दृष्टि मिल रही हो, तो कालसर्प योग का प्रभाव काफी कम हो सकता है। पारंपरिक मान्यता के अनुसार इस योग के कारण कुछ लोगों को बार-बार रुकावटें, मानसिक तनाव, निर्णय लेने में कठिनाई, करियर में उतार-चढ़ाव, विवाह में देरी या आर्थिक अस्थिरता जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।

कितने प्रकार का होता है कालसर्प दोष

ज्योतिष ग्रंथों में राहु और केतु की स्थिति के आधार पर कालसर्प दोष के 12 प्रकार बताए जाते हैं।

1. अनंत कालसर्प दोष

जब राहु प्रथम और केतु सप्तम भाव में हो। यह आत्मविश्वास, वैवाहिक जीवन और व्यक्तित्व से जुड़ी चुनौतियां दे सकता है।

2. कुलिक कालसर्प दोष

राहु द्वितीय और केतु अष्टम भाव में होने पर बनता है। पारिवारिक मतभेद और आर्थिक उतार-चढ़ाव से जोड़ा जाता है।

3. वासुकी कालसर्प दोष

राहु तृतीय और केतु नवम भाव में हो। भाग्य, भाई-बहनों और साहस से जुड़े उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकते हैं।

4. शंखपाल कालसर्प दोष

राहु चतुर्थ और केतु दशम भाव में होने पर यह दोष बनता है। यह गृह सुख और करियर में अस्थिरता दे सकता है।

5. पद्म कालसर्प दोष

राहु पंचम और केतु एकादश भाव में हो। ऐसे में व्यक्ति को शिक्षा, संतान और निवेश के मामलों में सावधानी बरतनी होती है।

6. महापद्म कालसर्प दोष

राहु षष्ठ और केतु द्वादश भाव में हो। ऐसे में जातक के जीवन में स्वास्थ्य, ऋण और शत्रु पक्ष से जुड़े अनुभव सामने आ सकते हैं।

7. तक्षक कालसर्प दोष

राहु सप्तम और केतु प्रथम भाव में। यह काल सर्पदोष दांपत्य और साझेदारी के मामलों में परेशानियां दे सकता है।

8. कर्कोटक कालसर्प दोष

राहु अष्टम और केतु द्वितीय भाव में। अचानक होने वाले बदलाव और पारिवारिक मामलों से इसका संबंध माना जाता है।

9. शंखचूड़ कालसर्प दोष

राहु नवम और केतु तृतीय भाव में। भाग्य, यात्रा और धर्म संबंधी मामलों में बाधाएं आ सकती है।

10. घातक कालसर्प दोष

राहु दशम और केतु चतुर्थ भाव में। करियर और सामाजिक प्रतिष्ठा में संघर्ष का संकेत माना जाता है।

11. विषधर कालसर्प दोष

राहु एकादश और केतु पंचम भाव में। आय, मित्रों और संतान पक्ष से जुड़े मामलों पर इसका प्रभाव होता है।

12. शेषनाग कालसर्प दोष

राहु द्वादश और केतु षष्ठ भाव में। इसमें व्यक्ति को खर्च, विदेश और मानसिक तनाव से जुड़े अनुभव होते हैं।

सावन में कालसर्प दोष की शांति के लिए भगवान शिव की पूजा क्यों की जाती है

धार्मिक परंपरा के अनुसार भगवान शिव को नागों के स्वामी और काल के भी अधिपति माना गया है। शिवजी के गले में वासुकी नाग विराजमान हैं। इसी कारण राहु-केतु और नाग तत्व से जुड़े दोषों की शांति के लिए शिव आराधना का विशेष महत्व माना जाता है। सावन का पूरा महीना शिव उपासना के लिए समर्पित होने के कारण इस दौरान किए गए उपाय अधिक श्रद्धा के साथ किए जाते हैं।

डिसक्लेमर: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। Times Now Navbharat इसकी पुष्टि नहीं करता है।

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