Saraswati Mata Mandir Story: सृष्टि के रचियता भगवान ब्रह्मा की बेटी और आदिशक्ति स्वरूप माता सरस्वती को ज्ञान की देवी माना जाता है। मां को देवी शारदा के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है मां की पूजा से ज्ञान, धन और संपत्ति में वृद्धि होती है। मान्यता है कि भारत में एक ऐसा शक्तिपीठ है, जिसे माता शारदा का घर माना जाता है। मान्यता है कि देवी सरस्वती इस जगह पर स्वयं निवास करती हैं। यहां माता सती का हार गिरा था, इस कारण ही यह जगह मैहर कहलाई।
मध्य प्रदेश के सतना जिले में स्थित मैहर में शारदा माता मंदिर सरस्वती माता का प्रमुख धाम है। शारदा मां सरस्वती का ही नाम है। मंदिर त्रिकुटा पर्वत की चोटी पर बसा है, जहां दर्शन मात्र से भक्तों की किस्मत चमक जाती है। यहां मां के दर्शन से ज्ञान, संतान सुख, धन-समृद्धि आती है और हर संकट से मुक्ति मिलती है। माना जाता है कि बुंदेलखंड के आल्हा-उदल ने भी यहां माता के दर्शन किए थे।
क्या है मंदिर का इतिहास और कैसे बना शक्तिपीठ?
इस मंदिर के इतिहास को लेकर कई कथाएं प्रचलित है। हालांकि इस शक्तिपीठ पर माता सती के गले का हार गिरा था। पौराणिक कथा के अनुसार, राजा दक्ष प्रजापति की बेटी सती शिव से विवाह करना चाहती थीं, लेकिन पिता राजी नहीं थे। इसके बाद भी माता सती से कठोर तप से भगवान शिव को प्राप्त किया और उनसे विवाह किया। इसके बा एक बार राजा दक्ष ने बड़ा यज्ञ किया, जिसमें सभी देवताओं को बुलाया लेकिन शिव को नहीं बुलाया। वहीं, जब सती को यज्ञ के बारे में पता चला तो वे बिना बुलाएं उस यज्ञ आयोजन में जा पहुंचीं। वहां जाकर उन्होंने पिता से उनके पति भगवान शिव को आमंत्रित न करने का कारण पूछा तो राजा दक्ष ने उनका तिरस्कार किया। भगवान शिव का तिरस्कार माता सती को सहन नहीं हुआ और वे यज्ञ कुंड में समा गईं।
जब यह बात भगवान शिव को पता चली तो उन्होंने अपनी जटाओं से निकालकर वीरभद्र को भेजा। वीरभद्र ने वहां जाकर दक्ष का गला काट दिया। हालांकि देवताओं के समझाने पर भगवान शिव ने दक्ष को बकरे का सिर लगाकर जीवित कर दिया। वहीं, खुद माता सती के जले हुए शरीर को लेकर तीनों लोकों में भटकने लगे। जब भगवान शिव इस दुख में डूब गए तो भगवान विष्णु ने सृष्टि के कल्याण के लिए सुदर्शन चक्र से माता सती की देह के नष्ट किया। इससे देह के 52 टुकड़े पृथ्वी पर गिरे। जहां भी माता की देह के टुकड़े गिरे, वहां शक्तिपीठ बन गए। मान्यता है कि मैहर में माता सती के गले का हार गिरा था। इसी कारण यह जगह मैहर के नाम से जानी गई। मैहर का अर्थ मां का हार है।
आल्हा-उदल आज भी करते हैं पूजा
एक कथा के अनुसार बुंदेलखंड के सबसे बड़े योद्धा आल्हा-उदल ने यहां पर तपस्या की थी और माता शारदे ने उन्हें दर्शन दिए थे। आल्हा ने यहां 12 वर्षों तक यहां कठोर तपस्या की थी, जिससे उन्हें अमरत्व का वरदान मिला। माना जाता है कि आज भी आल्हा माता की पूजा सबसे पहले करते हैं। इसका प्रमाण यह है कि जब भी रात के बाद मंदिर के पट खोले जाते हैं तो पूजन पहले से ही हुआ मिलता है।
आदिगुरु शंकराचार्य ने की थी पूजा
मान्यता है कि एक राजा को स्वप्न आया जिसमें एक वृद्धा ने कहा कि वे आदि शक्ति शारदा हैं। इस पर राजा ने त्रिकुटा पर्वत पर मंदिर बनवाया। आदि शंकराचार्य ने यहां पूजा की और मंदिर में उनकी मूर्ति भी है। यह भारत का एकमात्र शारदा मंदिर है, जो कर्नाटक के श्रृंगेरी शारदाम्बा मंदिर का वैकल्पिक धाम माना जाता है। यहां पंचधातु (सोना, चांदी, तांबा, पीतल, सीसा) की मूर्ति काली रंग की है, जिसमें मां पुस्तक और मधुपात्र यानी शहद से भरा कलश धारण किए हैं। माता के हाथ की इस मुद्रा को चिन मुद्रा भी कहा जाता है। मंदिर परिसर में बाल गणपति, कार्तिकेय (मुरुगन) और शंकराचार्य के छोटे मंदिर हैं। इसके साथ ही बाहर हनुमान जी और भैरव बाबा विराजमान हैं। मंदिर से नीचे उतरकर दाएं ओर रास्ते पर चलने पर एक भैरव मंदिर भी है। कुछ लोगों की मान्यता है कि यहां भैरव दर्शन मां के दर्शन के बाद जरूरी हैं।
दर्शन से खुलती है किस्मत
मां शारदा सरस्वती का रूप हैं, इसलिए दर्शन से बुद्धि तेज होती है, संतान सुख मिलता है और संकट नष्ट होते हैं। भक्त बच्चों को शिक्षा शुरू करने पर यहां लाते हैं। मां की कृपा से सफलता निश्चित होती है। नवरात्रि में विशेष पूजा होती है, जब मूर्ति को भव्य आभूषण पहनाए जाते हैं। मंदिर के पीछे अल्हा तालाब है, जहां आल्हा सुबह 4 बजे आते हैं, इसके बाद मंदिर में पूजा करते हैं। मान्यता है कि मान्यता है कि मैहर का शारदा माता मंदिर 502 ईस्वी (विक्रम संवत 559) में स्थापित हुआ। मंदिर 9वीं-10वीं शताब्दी के शिलालेख भी देखने को मिलते हैं। से सिद्ध है।
ऐसे करें दर्शन?
माता का मंदिर जमीन से 600 फीट ऊंचाई पर स्थित है। यहां पहुंचने के लिए 1063 सीढ़ियां हैं। इसके अलावा रोपवे की भी सुविधा मौजूद है।
कैसे पहुंचें मैहर?
मैहर सतना जिले में है, जो प्रयागराज-मुंबई रेल मार्ग पर है। यहां पहुंचना बहुत आसान है। मंदिर से मैहर रेलवे स्टेशन सिर्फ 5 किमी दूर है। यहां से ऑटो-रिक्शा या टैक्सी से पहुंचा जा सकता है। स्टेशन से रोजाना ट्रेनें आती हैं। दिल्ली, कोलकाता, मुंबई से सीधी कनेक्टिविटी मिल जाती है। मैहर बस स्टैंड मंदिर से 3-4 किमी है। जबलपुर (117 किमी), प्रयागराज (140 किमी), भोपाल (400 किमी) से बसें उपलब्ध हैं। एनएच-30 से जुड़ा होने से कार से आना भी आसान है। यहां से निकटतम एयरपोर्ट जबलपुर (117 किमी) है, जहां से टैक्सी से 2.5 घंटे लगते हैं। खजुराहो एयरपोर्ट (134 किमी) भी विकल्प है, लेकिन फ्लाइट्स कम हैं।
दर्शन का समय
मंदिर सुबह से शाम तक खुला रहता है। मंदिर साल भर (12 महीने) खुला रहता है। मंदिर खुलने का समय: सुबह 5:00 बजे है। मॉर्निंग दर्शन/पूजा: 5:00 से 12:00 बजे। वहीं, शाम का दर्शन: 3:00 से 9:00 बजे तक। आरती का समय: मॉर्निंग आरती 5:30 बजे, शाम की आरती 8:00 बजे।
मंदिर में आने पर बरतें ये सावधानियां
दर्शन के बाद मां को चुनरी, फूल, मिठाई चढ़ाएं। संतान प्राप्ति के लिए विशेष मंत्र जप ('ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः') करें। परिसर में गणेशजी, कार्तिकेय और शंकराचार्य के दर्शन करें। यहां के आसपास मैहर किला, चंदी माता मंदिर, राम-लक्ष्मण-सीता मंदिर हैं। ठहरने के लिए धर्मशालाएं या होटल का उपयोग करें। नीचे प्रसाद की दुकान वाले भी रुकने की फ्री सुविधा का वादा करते हैं, लेकिन उनमें न रुकें। दरअसल फ्रेश होने और नहाने को भले ही फ्री दें, लेकिन उनसे 1000 रुपये से ऊपर का प्रसाद लेना अनिवार्य कर देते हैं। मतलब आप बेवजह ठगे जा सकते हैं। इस कारण होटल या धर्मशाला ही लें। बगल में अन्नपूर्णा रसोई है, वहां भी आप भोजन कर सकते हैं।
डिसक्लेमर: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। Times Now Navbharat इसकी पुष्टि नहीं करता है।
