Sant Kabir Jayanti 2025: संत कबीर दास न केवल एक प्रसिद्ध कवि थे, बल्कि एक प्रभावशाली संत और विचारशील समाज सुधारक भी थे। उन्होंने अपने समय की सामाजिक कुरीतियों और आडंबरों का खुलकर विरोध किया और भक्ति के माध्यम से ईश्वर प्राप्ति का सरल मार्ग बताया। संत कबीर दास जी की दोहों के माध्यम से कम शब्दों में गहरी बात कहने की अनोखी शैली आज भी लोगों को गहराई से प्रभावित करती है। बता दें इनकी जयंती के शुभ दिन पर भक्त मठों और सत्संगों में एकत्र होते हैं, पाठ, कीर्तन और दोहों का गायन किया जाता है। चलिए आपको बताते हैं कबीर दास जी के सबसे लोकप्रिय दोहों के बारे में।
संत कबीर दास के प्रसिद्ध दोहे (Sant Kabir Das Ke Dohe In Hindi)
1. "ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय ।
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय ॥"
अर्थ: ऐसी भाषा बोलें कि आपकी वाणी सुनने वाले को शीतलता दे और स्वयं भी सुकून का अनुभव हो

कबीर दास जी के दोहे
2. "जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ ।
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ ॥"
अर्थ: जो लोग गहराई तक प्रयास करते हैं, उन्हें सफलता मिलती है; वहीं जो डर के कारण किनारे ही रहें, वे कुछ नहीं पाते
3. "बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥"
अर्थ: जब मैं संसार में बुराई खोजने चला तो कोई बुरा नहीं मिला। जब मैंने अपने दिल में झाँका, तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं।
4. "पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥"
अर्थ: किताबें पढ़ते-पढ़ते लोग जीवनभर मर गए, पर असली ज्ञानी कोई नहीं हुआ। जो प्रेम के सिर्फ ढाई अक्षर पढ़ ले, वही सच्चा ज्ञानी है।

संत कबीर दास के दोहे
5. "काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब॥"
अर्थ: जो काम कल करने की सोच रहे हो, उसे आज ही कर लो; और जो आज करना है, उसे अभी करो। समय का भरोसा नहीं, अगले ही पल प्रलय हो सकती है।
6. "दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय॥"
📖 अर्थ: लोग दुख में भगवान को याद करते हैं, सुख में नहीं। यदि वे सुख में भी सुमिरन करें तो दुख आए ही क्यों?

कबीर के दोहे
7. "साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहे, थोथा देई उड़ाय॥"
अर्थ: सच्चा साधु वही है जो सूप की तरह सार को ग्रहण करे और निरर्थक चीज़ों को उड़ा दे।
8. "माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर॥"
अर्थ: वर्षों से माला फेरने पर भी मन नहीं बदला। बाहरी मनकों को छोड़ो और अपने अंदर के मन को बदलो।

कबीर दोहे
9. "जहां दया तहां धर्म है, जहां लोभ तहां पाप।
जहां क्रोध तहां काल है, जहां क्षमा तहां आप॥"
अर्थ: जहां दया है, वहीं धर्म है; जहां लालच है, वहीं पाप है; जहां क्रोध है, वहां मृत्यु है; और जहां क्षमा है, वहीं परमात्मा है।
10. "निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय॥"
अर्थ: आलोचक को अपने पास ही रखना चाहिए, क्योंकि वह बिना साबुन और पानी के ही हमारे स्वभाव को साफ कर देता है।
