Ravi Pradosh Vrat Katha In Hindi (रवि प्रदोष व्रत कथा): एक गांव में अति दीन ब्राह्मण निवास करता था। जिसकी पत्नी प्रदोष व्रत किया करती थी। उसका एक पुत्र भी था। एक समय जब उसका पुत्र गंगा स्नान करने के लिए गया तो रास्ते में चोरों ने उसे घेर लिया और चोर कहने लगे कि हम तुम्हें मारेंगे नहीं बस तुम अपने पिता के गुप्त धन के बारे में हमें जानकारी दे दो। बालक दीनभाव से कहने लगा हे बंधुओं! हम अत्यंत दु:खी दीन हैं। हमारे पास धन कहां से आयेगा? तब चोरों ने कहा कि तूने इस पोटली में क्या रखा है? बालक ने नि:संकोच कहा कि इस पोटली में मेरी मां द्वारा दी गई रोटियां हैं। यह सुनकर चोर चले गए।
फिर बालक चलते-चलते एक नगर में पहुंचा। नगर में एक बरगद का पेड़ था क्योंकि बालक बहुत थक गया था तो वो उसके नीचे जाकर सो गया। तभी वहां उस नगर के सिपाही चोरों को खोजते हुए पहुंचे और उन्होंने बालक को चोर समझकर उसे बंदी बनाकर राजा के पास ले गए। जिसके बाद राजा ने उसे कारावास में बंद कर दिया। जब लड़का घर नहीं लौटा तो उसके माता-पिता को चिंता होने लगी। अगले दिन प्रदोष व्रत था। ब्राह्मणी ने विधि विधान प्रदोष व्रत किया और भगवान शंकर से अपने पुत्र की कुशलता की प्रार्थना की।
भगवान शंकर ने उस ब्राह्मणी की प्रार्थना सुन ली और उसी रात भगवान राजा के सपने में आए और उसे आदेश दिया कि वह बालक चोर नहीं है। अत: उसे प्रात:काल छोड़ दें अन्यथा तुम्हारा सबकुछ नष्ट हो जाएगा। प्रात:काल राजा ने उस बालक को कारावास से मुक्त कर दिया गया। तब बालक ने राजा को सारी बात बताई। सारा वृत्तांत सुनकर राजा ने अपने सिपाहियों को उसके माता-पिता को राजदरबार में बुलाने का आदेश दिया। उसके माता-पिता बहुत ही भयभीत थे। राजा ने कहा कि आप भयभीत न हो। मैं जानता हूं आपका बालक निर्दोष है। राजा ने उस बालक को तो छोड़ा ही साथ ही उसके परिवार को 5 गांव दान में दिए जिससे कि वे सुखपूर्वक रह सकें। शिव जी की दया से उसकी दरिद्रता दूर हो गई। अत: जो भी मनुष्य रवि प्रदोष व्रत को करता है वे सुखपूर्वक और निरोगी होकर अपना जीवन व्यतीत करता है।
