Rath Saptami Vrat Katha: इस कथा के बिना अधूरा है रथ सप्तमी का व्रत, पढ़ें सांब और गणिका की कथा हिंदी में
- Authored by: Mohit Tiwari
- Updated Jan 25, 2026, 07:41 AM IST
Rath Saptami Vrat Katha In Hindi (रथ सप्तमी व्रत कथा): आज 25 जनवरी को रथ सप्तमी का व्रत रखा जा रहा है। इस दिन भगवान भास्कर यानी सूर्यदेव की पूजा की जाती है। माना जाता है इस व्रत की पूजन के दौरान कथा को पढ़ना या सुनना जरूरी होता है। इसके बिना व्रत का फल अधूरा रहता है। आइए जानते हैं रथ सप्तमी की व्रत कथा क्या है?
रथ सप्तमी की व्रत कथा
Rath Saptami Vrat Katha In Hindi (रथ सप्तमी व्रत कथा): सनातन धर्म में सूर्यदेव को जीवन का स्रोत और आरोग्य का प्रदाता माना गया है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाया जाने वाला रथ सप्तमी पर्व विशेष रूप से सूर्य उपासना का पर्व है। इसे अचला सप्तमी भी कहा जाता है। पुराणों के अनुसार, इसी दिन भगवान सूर्य सात घोड़ों वाले रथ पर सवार होकर आकाश में प्रकट हुए थे। आज 25 जनवरी 2026 को रथ सप्तमी का पर्व मनाया जा रहा है।
यह पर्व केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य, जीवन शक्ति, धन और संतान की प्राप्ति का मार्ग भी माना गया है।रथ सप्तमी के दिन किया गया व्रत, स्नान, पूजा और दान विशेष पुण्य प्रदान करते हैं। सनातन ग्रंथों में बताया गया है कि विधिपूर्वक इस व्रत को करने से रोग, दुर्भाग्य और जीवन की कठिनाइयां दूर होती हैं। माना जाता है कि बिना व्रत कथा को पढ़ें या सुने यह व्रत अधूरा माना जाता है। आइए जानते हैं कि रथ सप्तमी की व्रत कथा क्या है?
रथ सप्तमी व्रत की पौराणिक कथा
पुराणों के अनुसार भगवान श्री कृष्ण के पुत्र सांब अत्यधिक बलशाली और अभिमानी हो गए थे। उनके शारीरिक बल के चलते उन्हें अपने आप में घमंड था। एक बार प्रख्यात ऋषि दुर्वासा तपस्या के बाद कृष्ण से मिलने आए। उनके दुर्बल शरीर को देखकर सांब हंसी में उड़ाने लगा और उनका अपमान किया। दुर्वासा ऋषि क्रोधित हुए और सांब को कुष्ठ रोग का श्राप दे दिया। सांब की यह स्थिति देखकर भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें सूर्यदेव की उपासना करने का मार्ग दिखाया।
सांब ने पिता की आज्ञा मानते हुए सूर्य व्रत शुरू किया। उन्होंने विधिपूर्वक सूर्य देव की आराधना की, स्नान किया और दीपक जलाए। कुछ ही समय में उनका कुष्ठ रोग समाप्त हो गया और सूर्य व्रत और भक्ति के फलस्वरूप उनका सौंदर्य, स्वास्थ्य और तेज फिर से प्राप्त हुआ। इस कथा से स्पष्ट होता है कि रथ सप्तमी के दिन सूर्य देव की आराधना करने से आरोग्य, संतान सुख और जीवन में समृद्धि की प्राप्ति होती है।
गणिका और अचला सप्तमी की पुण्य कथा
एक अन्य कथा अनुसार एक महिला गणिका ने अपने जीवन में कभी दान-पुण्य नहीं किया था। जब उसका अंतकाल आया, तो वह ऋषि वशिष्ठ के पास गई।महिला ने मुनि से पूछा कि ‘मैंने जीवन में कोई पुण्य नहीं किया, अब मुझे मुक्ति कैसे मिलेगी?’ वशिष्ठ मुनि ने उत्तर दिया कि माघ मास की शुक्ल सप्तमी, जिसे अचला सप्तमी कहा जाता है, विशेष पुण्यकारी तिथि है। इस दिन किए गए दान-पुण्य और व्रत का फल अन्य दिनों की तुलना में हजार गुना मिलता है।
उन्होंने बताया कि इस दिन पवित्र नदी में स्नान करें, सूर्यदेव को जल अर्पित करें, दीपक दान करें और दिन में एक बार नमक रहित भोजन करें। गणिका ने मुनि के निर्देशानुसार यह व्रत और दान किए। कुछ ही समय में उन्हें पुण्य और मोक्ष की प्राप्ति हुई। उनकी आत्मा को स्वर्ग प्राप्त हुआ और वे स्वर्ग की अप्सराओं की प्रधान बन गईं।