Shani Pradosh Vrat Katha in Hindi: इन दो व्रत कथाओं के बिना अधूरा है शनि प्रदोष व्रत, आज की शाम पूजा में जरूर पढ़ें या सुनें
- Authored by: Mohit Tiwari
- Updated Feb 14, 2026, 01:04 PM IST
Phalgun Maas Krishna Paksha Shani Pradosh Vrat Katha in Hindi, शनि प्रदोष व्रत पूजा कथा 2026: आज 14 फरवरी 2026 दिन शनिवार को फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि है। इस कारण आज के दिन ही शनि प्रदोष व्रत रखा जा रहा है। इस कारण यह व्रत भगवान शिव और शनिदेव दोनों की कृपा पाने के लिए जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत की कथा को पढ़ने या सुनने से सभी प्रकार की समस्याओं का नाश हो जाता है। आइए जानते हैं कि इस दिन की व्रत कथा क्या है?
शनि प्रदोष व्रत कथा
Phalgun Maas Krishna Paksha Shani Pradosh Vrat Katha in Hindi: 14 फरवरी 2026, शनिवार के दिन फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि पड़ रही है। इस कारण शनिवार को पड़ने वाला प्रदोष व्रत विशेष रूप से शनि प्रदोष व्रत कहलाता है। यह व्रत भगवान शिव और शनिदेव दोनों की कृपा प्राप्त करने के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना गया है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत तथा पूजन करने से जीवन की बाधाएं, कर्ज, रोग और शनि दोष से जुड़ी परेशानियां कम होती हैं।
14 फरवरी को प्रदोष काल शाम लगभग 5:45 बजे से रात 8:15 बजे तक रहेगा (स्थान के अनुसार समय में हल्का अंतर संभव है)। इसी समय भगवान शिव की पूजा करना विशेष फलदायी माना जाता है। जब यह शनिवार को पड़े तो इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है।
धार्मिक मान्यता है कि प्रदोष काल में भगवान शिव अपने भक्तों की मनोकामनाएं शीघ्र स्वीकार करते हैं। शनिवार होने के कारण इस दिन शनिदेव की भी विशेष कृपा प्राप्त होती है। जिन लोगों की कुंडली में शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या या शनि दोष चल रहा हो, उनके लिए यह व्रत अत्यंत शुभ फलदायी माना गया है। व्रत के दिन विधिपूर्वक पूजा के साथ कथा का श्रवण या पाठ करना आवश्यक माना गया है। इसके बिना प्रदोष व्रत अधूरा माना जाता है।
शनि प्रदोष व्रत कथा (Shani Pradosh Vrat Katha)
प्राचीन काल में एक निर्धन ब्राह्मण की पत्नी अत्यंत कठिन परिस्थितियों में अपने परिवार का पालन-पोषण कर रही थी। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि एक समय का भोजन जुटाना भी मुश्किल था। ब्राह्मण पत्नी अपने पुत्रों के साथ दर-दर भटकने को विवश थी।
एक दिन वह अपनी दयनीय स्थिति लेकर ऋषि शाण्डिल्य के आश्रम पहुंची। ऋषि ने उसकी व्याकुलता का कारण पूछा। तब उसने बताया कि उसका बड़ा पुत्र ‘धर्म’ वास्तव में एक राजकुमार है, परंतु पिता का राज्य छिन जाने के कारण वह उसके साथ दरिद्रता का जीवन जी रहा है। उसका छोटा पुत्र ‘शुचिव्रत’ धर्मनिष्ठ और सदाचारी है। ब्राह्मण पत्नी ने ऋषि से दरिद्रता दूर करने का उपाय पूछा।
ऋषि शाण्डिल्य ने कहा, 'हे देवी, आप शनि प्रदोष व्रत का नियमपूर्वक पालन करें। श्रद्धा से यह व्रत करने पर आपके जीवन में सुख-समृद्धि अवश्य आएगी।' ब्राह्मण पत्नी ने ऋषि की आज्ञा मानकर विधिपूर्वक शनि प्रदोष व्रत आरंभ कर दिया।
व्रत के प्रभाव से एक दिन छोटे पुत्र शुचिव्रत को गांव के समीप एक कुएं के पास सोने के सिक्कों से भरा कलश प्राप्त हुआ। इससे परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरने लगी। ब्राह्मण पत्नी ने सोने के सिक्कों को दोनों पुत्रों में बांटने की इच्छा जताई, पर बड़े पुत्र धर्म ने विश्वास के साथ कहा कि भगवान शिव उचित समय पर उसका भी उद्धार करेंगे।
कुछ समय बाद धर्म की मुलाकात अंशुमति नामक एक अत्यंत सुंदर और गुणवान गंधर्व कन्या से हुई। अंशुमति भगवान शिव की परम भक्त थी और प्रदोष व्रत रखती थी। वार्तालाप के दौरान दोनों ने अपनी-अपनी भक्ति का उल्लेख किया और एक-दूसरे के प्रति आकर्षित हो गए।
एक दिन अंशुमति के पिता विद्रविक को स्वप्न में भगवान शिव के दर्शन हुए। शिवजी ने उन्हें आदेश दिया कि वे अपनी पुत्री का विवाह धर्म से कर दें। भगवान की आज्ञा का पालन करते हुए विद्रविक ने अंशुमति और धर्म का विवाह संपन्न कराया। विवाह के पश्चात धर्म को अपना खोया हुआ राजपाट पुनः प्राप्त हो गया और उसके जीवन में सुख-समृद्धि लौट आई। इस प्रकार शनि प्रदोष व्रत के प्रभाव से ब्राह्मण परिवार के सभी कष्ट दूर हो गए।
प्रदोष व्रत की धनी सेठ वाली कथा
एक नगर में एक धनी सेठ रहता था। उसके घर में हर प्रकार की सुख-सुविधाएं थीं, पर संतान न होने के कारण सेठ और सेठानी सदैव दुःखी रहते थे। बहुत विचार-विमर्श के बाद उन्होंने तीर्थयात्रा पर जाने का निश्चय किया और अपना व्यापार नौकरों को सौंप दिया।
नगर से बाहर निकलने पर उन्हें एक साधु ध्यानमग्न अवस्था में बैठे मिले। सेठ-सेठानी उनके पास बैठ गए और साधु के जागने की प्रतीक्षा करने लगे। जब साधु ने नेत्र खोले, तो उन्होंने कहा कि वे दोनों लंबे समय से आशीर्वाद की प्रतीक्षा कर रहे हैं और उनकी पीड़ा वे समझते हैं।
साधु ने कहा, 'तुम शनि प्रदोष व्रत करो। इस व्रत के प्रभाव से तुम्हें संतान सुख प्राप्त होगा।' साधु ने उन्हें व्रत की विधि समझाई और भगवान शंकर की यह स्तुति बताई—
हे रुद्रदेव शिव नमस्कार ।
शिवशंकर जगगुरु नमस्कार ॥
हे नीलकंठ सुर नमस्कार ।
शशि मौलि चन्द्र सुख नमस्कार ॥
हे उमाकांत सुधि नमस्कार ।
उग्रत्व रूप मन नमस्कार ॥
ईशान ईश प्रभु नमस्कार ।
विश्वेश्वर प्रभु शिव नमस्कार ॥
सेठ और सेठानी साधु से आशीर्वाद लेकर लौट आए। उन्होंने श्रद्धा और नियमपूर्वक शनि प्रदोष व्रत करना आरंभ किया। प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा, दीप प्रज्वलन और स्तुति पाठ करने लगे। कुछ समय पश्चात उनके घर एक सुंदर पुत्र का जन्म हुआ और उनका जीवन आनंद और संतोष से भर गया।
