महाशिवरात्रि की पूजा का पहला पहर हुआ स्टार्ट, ये 50 मिनट रहने वाले हैं बेहद खास
- Authored by: Mohit Tiwari
- Updated Feb 15, 2026, 07:43 PM IST
Mahashivratri Par Raat ki Puja ka Time: 15 फरवरी की शाम 6 बजकर 11 से महाशिवरात्रि के पूजन का पहला पहर शुरू हो गया है। महाशिवरात्रि का पूजन रात्रि के चार पहरों तक किया जाता है। ऐसे में पहले पहर से लेकर चारों पहर तक जागरण महत्वपूर्ण होता है। पूजा के लिए कुल 50 मिनट बेहद ही खास माने जाते हैं। आइए जानते हैं कि किस समय पर पूजन सर्वश्रेष्ठ रहेगा?
रात में शिवरात्रि की पूजा का समय
Mahashivratri Par Raat ki Puja ka Time: 15 फरवरी 2026 को महाशिवरात्रि का पावन पर्व मनाया जा रहा है। फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की यह रात्रि भगवान शिव को अत्यंत प्रिय मानी जाती है। मान्यता है कि इस रात शिव तत्व विशेष रूप से जागृत रहता है, इसलिए पूरी रात चार अलग-अलग पहरों में पूजा का विधान बताया गया है।
शाम 6 बजकर 11 मिनट से पहला पहर शुरू हो चुका है और हर पहर का अपना अलग आध्यात्मिक महत्व है। इसके साथ ही मध्य रात्रि का 50 मिनट का निशिता काल इस पूरी रात्रि का सबसे विशेष समय माना गया है। आइए जानते हैं कि भगवान शिव की पूजा के लिए सबसे खास समय क्या है?
पहला पहर (शाम 6:11 बजे से रात 9:23 बजे तक)
यह समय सामान्य जीवन से साधना की ओर बढ़ने का संकेत देता है। सबसे पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान को साफ करें और शिवलिंग स्थापित करें। दीपक जलाकर वातावरण को शांत बनाएं। इसके बाद शिवलिंग पर शुद्ध जल चढ़ाएं, फिर गंगाजल अर्पित करें। पंचामृत से अभिषेक करना भी शुभ माना जाता है। बेलपत्र, सफेद पुष्प और धतूरा चढ़ाएं। 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जप करते रहें। पहले पहर की पूजा मन की शांति और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए की जाती है।
दूसरा पहर (रात 9:23 बजे से 12:35 बजे तक)
यह चरण भक्ति को गहराई देने का समय है। इस दौरान दोबारा जल से अभिषेक करें। आप गन्ने के रस या शहद से भी अभिषेक कर सकते हैं। चंदन और अक्षत अर्पित करें। इस समय महामृत्युंजय मंत्र का जप विशेष रूप से फलदायी माना जाता है। दूसरे पहर में की गई प्रार्थना स्वास्थ्य, सुरक्षा और जीवन के संकटों से मुक्ति के लिए की जाती है। ध्यान रखें कि पूजा केवल क्रिया न हो, बल्कि भाव के साथ हो।
निशिता काल (रात 12:09 बजे से 01:01 बजे तक)
यह लगभग 50 मिनट का समय पूरी रात का सबसे पवित्र काल माना गया है। मान्यता है कि इसी मध्य रात्रि में शिव का दिव्य प्राकट्य हुआ था। इस समय जल और दूध की पतली धार से अभिषेक करें। बेलपत्र अवश्य चढ़ाएं। दीपक के सामने बैठकर 'ॐ नमः शिवाय' या महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। निशिता काल में की गई साधना को कई गुना फलदायी बताया गया है। यदि कोई पूरी रात जाग न सके, तो कम से कम इस समय पूजा अवश्य करे।
तीसरा पहर (रात 12:35 बजे से प्रातः 3:47 बजे तक)
यह समय आध्यात्मिक जागरण का माना गया है। शिवलिंग पर जल और दूध से अभिषेक करें। काले तिल और शहद अर्पित करना शुभ रहता है। बेलपत्र की 3 या 11 पत्तियां चढ़ाएं। इस दौरान शांत मन से ध्यान करें और महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। कहा जाता है कि इस पहर की पूजा आयु वृद्धि और भय से मुक्ति का प्रतीक है।
चौथा पहर (प्रातः 3:50 बजे से सुबह 6:58 बजे तक)
अंतिम पहर अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का संकेत देता है। इस समय जल, दूध और थोड़ा घी मिलाकर अभिषेक करें।सफेद पुष्प, भस्म और बेलपत्र अर्पित करें। आरती करें और भगवान शिव से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन और आत्मिक शांति की प्रार्थना करें। सुबह के साथ व्रत का पारण किया जाता है।
डिसक्लेमर: यहां दी गई जानकारी शास्त्रों पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। Times Now Navbharat इसकी पुष्टि नहीं करता है।
