Krishna Kalki Dwadashi Vrat Katha (कृष्ण कल्कि द्वादशी की व्रत कथा): हिंदू पंचांग के अनुसार आज आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि के दिन पर कृष्ण कल्कि द्वादशी का व्रत रखा जा रहा है। आज 7 अक्टूबर को रात 11 बजकर 16 मिनट तक द्वादशी तिथि रहेगी। कृष्ण कल्कि द्वादशी के दिन पर अनेक भक्तगण इस अवसर पर भगवान विष्णु अथवा भगवान कल्कि की पूजा-अर्चना करते हैं।
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द्वादशी तिथि पर भगवान विष्णु की आराधना करने से मनुष्य के सङ्कटों का निवारण होता है तथा उसे आत्मिक शान्ति की प्राप्ति होती है। अतः भगवान विष्णु की प्रियता हेतु द्वादशी व्रत का पालन अवश्य करना चाहिए। आज कृष्ण कल्कि द्वादशी पर पढ़ें व्रत कथा, कृष्ण कल्कि द्वादशी की कहानी।
Krishna Kalki Dwadashi Vrat Katha, कृष्ण कल्कि द्वादशी की व्रत कथा
ऋषि दुर्वासा ने सत्यतपा व्याध से कहा कि जिस प्रकार अन्य पवित्र व्रतों का विशेष महत्व बताया गया है, उसी तरह कल्कि द्वादशी का व्रत भी अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। इस व्रत की महिमा समझने के लिए राजा विशाल की कथा सुनो।
बहुत समय पहले काशी में विशाल नाम के एक पराक्रमी राजा राज्य करते थे। वे वीर और धर्मप्रिय थे। लेकिन समय ने ऐसा करवट लिया कि उनके ही गोत्र के कुछ लोगों ने छल-कपट से उनका राज्य और सारी संपत्ति अपने अधिकार में ले ली। राजपाट छिन जाने के बाद राजा विशाल ने सांसारिक मोह छोड़ दिया और भगवान विष्णु की आराधना करने के लिए गंधमादन पर्वत के पवित्र बदरीवन में चले गए।
वहां उन्होंने लंबे समय तक कठिन तपस्या की। वे पूरी श्रद्धा से भगवान विष्णु का ध्यान करते रहे। एक दिन संयोग से वहां नर और नारायण ऋषि पहुंचे। राजा को लंबे समय से तपस्या में लीन देखकर उन्होंने मन ही मन सोचा कि भगवान के प्रति इतनी गहरी भक्ति रखने वाले इस भक्त की इच्छा अवश्य पूरी होनी चाहिए।
नर-नारायण राजा के पास पहुंचे और बोले, "हे राजन! तुम्हारी तपस्या और भगवान के प्रति तुम्हारी श्रद्धा से हम प्रसन्न हैं। हम तुम्हें वरदान देना चाहते हैं। तुम अपनी मनोकामना बताओ।"
राजा विशाल ने दोनों ऋषियों को देखकर कहा, "हे महात्माओं! मैं आपको पहचान नहीं पा रहा हूं। मेरी इच्छा है कि जिस भगवान की मैं आराधना करता हूं, उन्हीं की कृपा से मुझे वर प्राप्त हो।" तब नर-नारायण ने उनसे पूछा कि वे किस देवता को अपना आराध्य मानते हैं और उनके मन में कौन सी इच्छा है। राजा ने उत्तर दिया, "मैं भगवान विष्णु का भक्त हूं। मैं चाहता हूं कि उनकी कृपा से मुझे ऐसे यज्ञ करने का अवसर मिले, जिनमें विधिपूर्वक दक्षिणा दी जा सके। यही मेरी सबसे बड़ी इच्छा है।" राजा की बात सुनकर नर ऋषि ने उन्हें भगवान नारायण के दिव्य स्वरूप का परिचय कराया। उन्होंने बताया कि यही भगवान नारायण सृष्टि के पालनकर्ता हैं और समय-समय पर धर्म की रक्षा के लिए अलग-अलग रूपों में पृथ्वी पर प्रकट होते हैं।
उन्होंने कहा कि भगवान ने मत्स्य, वराह, नृसिंह, वामन और परशुराम जैसे अवतार लेकर अधर्म का नाश किया। वे ही श्रीराम के रूप में प्रकट हुए और राक्षसों का अंत कर पृथ्वी को उनके अत्याचार से मुक्त कराया। बाद में श्रीकृष्ण के रूप में अवतरित होकर उन्होंने दुष्ट शक्तियों का विनाश किया और धर्म की स्थापना की।
नर ऋषि ने यह भी बताया कि भगवान के अलग-अलग स्वरूपों की उपासना मनुष्य अपनी इच्छा के अनुसार कर सकता है। संतान की कामना रखने वाला भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप का ध्यान करे, सौंदर्य और आकर्षण की इच्छा रखने वाला बुद्ध स्वरूप की आराधना करे और शत्रुओं के नाश की कामना रखने वाला कल्कि स्वरूप का स्मरण करे।
इसके बाद नर ऋषि ने राजा विशाल को भाद्रपद शुक्ल द्वादशी के व्रत का महत्व और विधि बताई। राजा ने पूरी श्रद्धा और नियम के साथ इस व्रत को किया। भगवान की कृपा से उनकी मनोकामना पूरी हुई और उन्हें फिर से राजवैभव प्राप्त हुआ। वे एक शक्तिशाली चक्रवर्ती राजा के रूप में प्रसिद्ध हुए।
ऋषि दुर्वासा आगे कहते हैं कि राजा विशाल की इसी कथा के कारण वह पवित्र बदरीवन आगे चलकर "बदरी विशाल" के नाम से प्रसिद्ध हुआ। राजा ने जीवनभर सुख और धर्मपूर्वक राज्य किया। अंतिम समय में वे फिर बदरीवन पहुंचे और वहां अनेक दिव्य यज्ञ किए। इसके बाद भगवान श्रीहरि की भक्ति में लीन होकर उन्होंने परम पद प्राप्त किया।
इस तरह कल्कि द्वादशी का व्रत श्रद्धा, भक्ति और भगवान विष्णु की कृपा से जुड़ा हुआ माना गया है। राजा विशाल की कथा यह संदेश देती है कि कठिन परिस्थितियों में भी सच्ची आस्था और धैर्य बनाए रखने से जीवन में नई राह खुल सकती है।
