अध्यात्म

Dasha Mata Ki Katha: दशा माता की कथा, यहां पढ़ें राजा नल और रानी दमयंती की कहानी

Dasha Mata Ki Katha (दशा माता की कथा): वैदिक पंचांग के अनुसार दशा माता का व्रत हर साल चैत्र महीने के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि पर रखा जाता है। इस साल यह व्रत 13 मार्च को रखा जा रहा है। इस दिन दशा माता की पूजा के साथ-साथ उनकी व्रत कथा का पाठ भी जरूर किया जाता है। यहां से आप दशा माता व्रत कथा पढ़ सकते हैं।

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दशा माता व्रत कथा (pc: pinterest)

Dasha Mata Ki Katha (दशा माता की कथा): दशा माता की कथा अनुसार, एक नल नाम का राजा था जिसकी पत्नी का नाम दमयंती था। उस राजा के राज में समस्त प्रजा सुख से जीवन व्यतीत कर रही थी। एक दिन एक ब्राह्मणी रानी के पास आई। उस ब्रह्माणी ने गले में पीला डोरा बांध रखा था। रानी ने उससे उसके डोरे के बारे में पूछा। जिस पर ब्रह्माणी बोली- ये डोरा दशा माता का है और इसे गले में धारण करने से सुख संपत्ति, अन्न-धन घर में सदैव बना रहता है। उसने रानी को भी एक डोरा दे दिया और रानी ने भी उसे अपने गले में पहन लिया।

रानी के गले में डोरा बंधा देख राजा ने पूछा कि ये कैसा डोरा है। रानी ने सारी बात बता दी। तब राजा बोले- तुम्हें किस चीज की कमी है? इसलिए इसे तोड़कर फेंक दो। रानी ने उसे तोड़ने से मना कर दिया। पर राजा ने जबरदस्ती उसे तोड़कर फेंक दिया। रानी बोली- राजन्! यह आपने ठीक नहीं किया। उसी दिन जब रात्रि में राजा सो रहे थे, तब उन्हें सपने में दशामाता बुढ़िया के रूप में दिखाई दीं और राजा से बोलीं- हे राजा, तेरी अच्छी दशा जा रही है और बुरी दशा आ रही है। तूने मेरा अपमान करके सही नहीं किया। इतना कहते ही बुढ़िया अंतर्ध्यान हो गई।

इस सपने के बाद से ही राजा का धन-धान्य और सुख-चैन सब कुछ नष्ट होने लगा। अब तो भूखे मरने की नौबत आ गई थी। ऐसी हालत देख राजा ने अपनी पत्नी दमयंती से कहा कि तुम दोनों बच्चों को लेकर अपने मायके चली जाओ। रानी ने कहा- मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी। जैसे आप रहेंगे, वैसे ही मैं भी आपके साथ रहूंगी। तब राजा ने कहा कि अपने देश को छोड़कर दूसरे देश में चलते हैं। वहां जो भी काम मिल जाएगा वही कर लेंगे। इस प्रकार नल-दमयंती दूसरे देश में चले गए। चलते-चलते रास्ते में भील राजा का महल पड़ा।

वहां राजा ने अपने दोनों बच्चों को अमानत के तौर पर छोड़ दिया। जब राजा आगे चले तो रास्ते में राजा के किसी मित्र का गांव आया। राजा ने रानी से कहा- चलो, हमारे मित्र के घर चलते हैं। मित्र के घर पहुंचने पर उनका खूब आदर-सत्कार हुआ और उन्हें तरह-तरह के पकवान बनाकर परोसे गए। मित्र ने उन्हें अपने शयन कक्ष में सुलाया। उसी कमरे में एक खूंटी पर मित्र की पत्नी का हीरों का कीमती हार भी टंगा था। मध्यरात्रि में जब रानी की नींद खुली तो उन्होंने देखा कि वह बेजान खूंटी हार को निगल रही है। तब रानी ने तुरंत राजा को जगाया और दोनों इस सोच में पड़ गए कि सुबह होने पर वो अपने मित्र को क्या जवाब देंगे? अत: यहां से इसी समय चले जाने में भलाई है। राजा-रानी दोनों रात्रि को ही वहां से चल दिए।

सुबह होने पर जब मित्र की पत्नी ने खूंटी पर अपना हार देखा तो वो वहां नहीं था। तब वो अपने पति से कहने लगी कि तुम्हारे मित्र कैसे हैं वो हमारा हार चुराकर भाग गए हैं। मित्र ने अपनी पत्नी को समझाया कि मेरा मित्र ऐसा नहीं कर सकता। फिर आगे चलने पर राजा नल की बहन का गांव आया। राजा ने अपने आने की खबर बहन के घर पहुंचाई। खबर देने वाले से बहन ने पूछा कि भैया-भाभी के हाल-चाल कैसे हैं? उसने बताया कि दोनों अकेले हैं और पैदल ही आए हैं। इतनी बात सुनकर बहन थाली में कांदा-रोटी रखकर उनसें मिलने आई। राजा ने तो अपने हिस्से का खा लिया, परंतु रानी ने जमीन में गाड़ दिया।

जब वो आगे चले तो उन्हें रास्ते में एक नदी मिली। राजा ने नदी में से मछलियां निकालकर रानी से कहा कि तुम मछलियों को भुंज, मैं पास के गांव में से परोसा लेकर आता हूं। उस गांव का सेठ सभी लोगों को भोजन करा रहा था। राजा परोसा लेकर जब वहां से चला तो रास्ते में एक चील ने उस पर झपट्टा मारा तो सारा भोजन नीचे गिर गया। राजा ने सोचा कि रानी अब क्या सोचेगी कि मैं खुद तो भोजन करके आ गया पर उसके लिए कुछ भी नहीं लाया। उधर रानी मछलियां भूंजने लगीं तो दुर्भाग्य से सारी मछलियां जीवित होकर नदी में चली गईं। तब रानी उदास होकर सोचने लगी कि राजा अब सोचेंगे कि ये सारी मछलियां खुद ही खा गई। जब राजा आए तो वो मन ही मन समझ गए और वहां से आगे चल दिए।

चलते-चलते अब रास्ते में रानी के मायके का गांव पड़ा। राजा ने कहा तुम अपने मायके चली जाओ, वहां जाकर दासी का कोई भी काम कर लेना। मैं भी इसी गांव में कहीं कुछ भी काम कर लूंगा। इस प्रकार रानी महल में दासी का काम करने लगी और राजा ने तेली के घाने पर काम शुरू कर दिया। जब होली दसा का दिन आया तब सभी रानियों ने सिर धोकर स्नान किया। साथ में दासी ने भी स्नान किया। इसके बाद दासी ने सभी रानियों का सिर गूंथा। तब राजमाता ने कहा कि दासी ला मैं तेरा भी सिर गूंथ दूं। ऐसा कहकर राजमाता दासी का सिर गूंथने लग गई। तब उन्होंने दासी के सिर में पद्म देखा। जिसे देखकर राजमाता की आंखें भर आईं और उनकी आंखों से आंसू निकलने लगे। आंसू जब दासी की पीठ पर गिरे तो दासी ने पूछा आप रो क्यों रही हैं? राजमाता ने कहा तेरे जैसी मेरी भी बेटी है जिसके सिर में भी पद्म था। यह देखकर मुझे उसकी याद आ गई। तब दासी ने कहा कि मैं ही आपकी बेटी हूं। दशा माता के प्रकोप के कारण मेरा ये हाल हुआ है। माता ने कहा बेटी, तूने यह बात क्यों छिपाई? दासी ने कहा मां अगर मैं ये सब कुछ बता देती तो मेरे बुरे दिन नहीं कटते। आज मैं दशा माता का व्रत करूंगी और अपनी गलती की क्षमा-याचना भी करूंगी।

राजमाता ने पूछा बेटी हमारे जमाई राजा कहां हैं? बेटी ने कहा वो इसी गांव में किसी तेली के घर काम कर रहे हैं। इनके बाद उन्हें ढूंढकर महल में लाया गया। इसके बाद जमाई राजा को स्नान कराकर नए वस्त्र पहनाए गए और पकवान बनवाकर उन्हें भोजन कराया गया। दशामाता के व्रत पूजन से राजा नल और दमयंती के अच्छे दिन लौट आए। कुछ दिन बाद उव दोनों ने अपने राज्य में वापस जाने की सोची। दमयंती के पिता ने खूब सारा धन, हाथी-घोड़े आदि देकर बेटी-जमाई की विदाई की। रास्ते में वही जगह आई जहां रानी मछलियों को भूनने वाली थी और राजा के हाथ से चील ने सारा भोजन गिरा दिया था। तब राजा ने कहा- तुमने सोचा होगा कि मैंने अकेले भोजन कर लिया होगा, परंतु चील ने मेरा भोजन गिरा दिया था। तब रानी ने कहा कि मैंने भी मछलियां भूनकर नहीं खाई थी, वे तो जीवित होकर नदी में चली गई थीं।

इसके बाद राजा की बहन का गांव आया। राजा ने फिर अपनी बहन के यहां खबर भेजी। खबर देने वाले से बहन ने पूछा कि उनके हालचाल कैसे हैं? उसने बताया कि वे बहुत अच्छी दशा में हैं। यह सुनकर राजा की बहन मोतियों की थाली सजाकर लाई। तभी दमयंती ने धरती माता से प्रार्थना करके हुए कहा- मां आज मेरी अमानत मुझे वापस दे दो। यह कहकर जब उसने उस जगह को खोदा जहां उसने कांदा-रोटी गाड़ दिया था वहां अब रोटी सोने की और कांदा चांदी का हो गया था। ये दोनों चीजें उसने बहन की थाली में डाल दी। वहां से चलकर राजा अपने मित्र के घर पहुंचे। मित्र ने फिर से उनका पहले के समान ही आदर-सत्कार किया। रात्रि में विश्राम के लिए उन्हें उसी शयन कक्ष में सुलाया गया। दोनों को मोरनी वाली खूंटी के हार निगल जाने वाली बात से नींद नहीं आई। आधी रात के समय वही मोरनी वाली खूंटी हार उगलने लगी। तब राजा ने अपने मित्र को और रानी ने मित्र की पत्नी को जगाया और कहा कि आपका हार तो इसने निगल लिया था। आपने सोचा होगा कि हमनें इसे चुराया है। ये देखकर मित्र की पत्नी को बहुत बुरा लगा कि कैसे उसने उन दोनों पर नाम लगा दिया था।

फिर दूसरे दिन प्रात:काल नित्य कर्म से निपटकर वो दोनों वहां से चल दिए। फिर वे भील राजा के यहां पहुंचे जहां उन्होंने अपने पुत्रों को दिया था। जब उन्होंने राजा से अपने पुत्रों को मांगा तो भील राजा ने उन्हें देने से मना कर दिया। लेकिन गांव के लोगों ने उन बच्चों को वापस दिलाया। नल-दमयंती अपने बच्चों को लेकर अपनी राजधानी पहुंचे। राजा-रानी को आता देख नगरवासियों ने उनका खूब स्वागत किया और गाजे-बाजे के साथ उन्हें महल पहुंचाया। दशा माता की कृपा से राजा का पहले जैसा ठाठ-बाट हो गया।

Srishti
सृष्टिauthor

सृष्टि टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की फीचर डेस्क से जुड़ी कंटेंट राइटर हैं, जो मुख्य रूप से धर्म और लाइफस्टाइल सेक्शन के लिए लिखती हैं। सृष्टि को आध्यात्म, भारतीय संस्कृति और साहित्य में गहरी रुचि है। यही वजह है कि उनके लेखों में परंपरा, आस्था और जीवनशैली की सहज समझ खूबसूरती से दिखाई देती है। वह धार्मिक कथाओं, ग्रंथों से जुड़े विषयों, आध्यात्मिक ट्रेंड्स और समकालीन जीवनशैली पर 5,000 से अधिक लेख लिख चुकी हैं। मॉडर्न लाइफस्टाइल और पारंपरिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाते हुए वह ऐसे कंटेंट गढ़ती हैं, जो प्रेरक होने के साथ-साथ जानकारीपूर्ण भी होता है।

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