Badrinath Temple Facts : बद्रीनाथ मंदिर भारत के सबसे पवित्र और प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है। यह चार धामों में से एक धाम है। छोटी और बड़ी चार धाम यात्रा में यह कॉमन धाम है। उत्तराखंड की ऊंची पहाड़ियों के बीच स्थित यह धाम न सिर्फ आस्था का केंद्र है, बल्कि अपनी अनोखी परंपराओं के लिए भी जाना जाता है।
हर साल लाखों श्रद्धालु यहां भगवान विष्णु के दर्शन करने आते हैं, लेकिन यहां एक ऐसी परंपरा है जो श्रीहरिविष्णु के बाकी सभी मंदिरों से अलग है। यहां शंख नहीं बजाया जाता है। आमतौर पर भगवान श्रीहरिविष्णु के मंदिर में शंखनाद को बेहद शुभ माना जाता है और पूजा-पाठ में इसका विशेष महत्व होता है। शंख भगवान विष्णु स्वयं साथ में रखते हैं। ऐसे में आइए जानते हैं कि भगवान विष्णु के इस खास धाम में शंख बजाना क्यों वर्जित है?
बद्रीनाथ धाम में क्यों नहीं बजाया जाता है शंख? (Why Conch Is Not Blown In Badrinath)
शास्त्रों के अनुसार, भगवान शिव ने शंखचूड़ राक्षस का वध बद्रीनाथ में ही किया था। शंखचूड़ की पत्नी वृंदा भगवान विष्णु के अनन्य भक्त और पतिव्रता थीं। इस कारण उसका वध असंभव हो रहा था। जब शंखचूड़ भगवान शिव से युद्ध में व्यस्त था उस दौरान भगवान विष्णु वृंदा के पति का रूप रखकर गए और उनका पतिव्रत भंग कर दिया।इससे शंखचूड़ का वध हो गया। शंखचूड़ का वध बद्रीनाथ में होने के कारण यहां शंख नहीं बजाया जाता है। दरअसल भगवान विष्णु के शंख को श्राप की वजह से शंखचूड़ राक्षस के रूप में जन्म मिला था।
वहीं, यह भी माना जाता है कि बद्रीनाथ में माता लक्ष्मी तप करती हैं। शंख की आवाजा से उनके तप में विघ्न आ सकता है। इस कारण बद्रीनाथ में शंख नहीं बजाया जाता है।
बद्रीनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना पूरी विधि-विधान से होती है, लेकिन शंखनाद नहीं किया जाता है। यह परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है और आज भी इसका सख्ती से पालन किया जाता है। यहां आने वाले श्रद्धालु भी इस नियम का सम्मान करते हैं।
अतापी और वतापी का हुआ था वध
एक अन्य मान्यता के अनुसार, अगस्त्य मुनि राक्षसों का संहार कर रहे थे। उसी दौरान दो राक्षस अतापी और वतापी भागकर इस क्षेत्र में आ गए। इनमें से वतापी ने खुद को बचाने के लिए एक शंख के भीतर छिपा लिया। ऐसा माना जाता है कि यदि उस समय किसी ने शंख बजाया होता, तो वह राक्षस बाहर निकलकर फिर से उत्पात मचा सकता था। इस कारण से यहां शंख बजाने की मनाही कर दी गई।
क्या हैं वैज्ञानिक कारण?
बद्रीनाथ धाम हिमालय की संवेदनशील घाटियों में स्थित है, जहां सर्दियों में भारी बर्फबारी होती है। यहां का वातावरण काफी नाजुक माना जाता है। जब शंख बजाया जाता है, तो उसकी ध्वनि तरंगें पहाड़ों से टकराकर तेज प्रतिध्वनि पैदा करती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, ऐसी ध्वनि तरंगें बर्फ की परतों में कंपन पैदा कर सकती हैं, जिससे दरारें आ सकती हैं या हिमस्खलन का खतरा बढ़ सकता है। पहाड़ी क्षेत्रों में इस तरह की घटनाएं काफी खतरनाक हो सकती हैं। इसलिए यह माना जाता है कि प्राचीन काल से ही यहां शंख बजाने से परहेज किया जाता रहा है, ताकि प्राकृतिक संतुलन बना रहे।
कैसे पड़ा बद्रीनाथ नाम?
बद्रीनाथ नाम के पीछे भी एक रोचक कहानी जुड़ी है। कहा जाता है कि जब भगवान विष्णु इस स्थान पर ध्यान में लीन थे, तब अत्यधिक हिमपात होने लगा। उस समय माता लक्ष्मी ने बद्री यानी बेर के पेड़ का रूप धारण कर लिया और भगवान विष्णु को बर्फ से बचाया। जब भगवान विष्णु ने यह देखा, तो वे भावुक हो गए और इस स्थान का नाम ;बद्रीनाथ’ रख दिया, जिसका अर्थ है बद्री (बेर) के स्वामी। इस घटना के बाद यह स्थान और भी पवित्र माना जाने लगा।
