Nirjala Ekadashi Vrat Katha in Hindi : हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। इनमें ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। इसे निर्जला एकादशी के नाम से जाना जाता है। साल 2026 में निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून को रखा जा रहा है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत करने से सभी एकादशियों के बराबर पुण्य फल प्राप्त होता है। बिना एकादशी व्रत कथा को पढ़े या सुने, इस व्रत का पूरा फल नहीं मिलता है। निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी और पांडव एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इसके पीछे एक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है, जिसका संबंध पांडव पुत्र भीमसेन और महर्षि वेदव्यास से है।
निर्जला एकादशी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भीमसेन ने महर्षि वेदव्यास से कहा, 'हे पितामह! मेरे भाई युधिष्ठिर, माता कुंती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव सभी एकादशी का व्रत रखते हैं और मुझे भी व्रत करने के लिए कहते हैं। लेकिन मैं भगवान की पूजा कर सकता हूं, दान कर सकता हूं, परंतु बिना भोजन किए रहना मेरे लिए बहुत कठिन है।'
भीमसेन ने कहा कि उन्हें बहुत तेज भूख लगती है और भोजन के बिना रहना उनके लिए संभव नहीं है। उन्होंने महर्षि व्यास से ऐसा व्रत बताने के लिए कहा, जिसे करने से उन्हें पुण्य प्राप्त हो और जिसे वह साल में केवल एक बार कर सकें।
नरक से बचाता है निर्जला एकादशी व्रत
भीमसेन की बात सुनकर महर्षि वेदव्यास ने कहा कि यदि तुम स्वर्ग की इच्छा रखते हो और नरक से बचना चाहते हो तो प्रत्येक माह आने वाली दोनों एकादशियों का व्रत करना चाहिए, लेकिन भीमसेन ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा कि वह हर महीने दो बार व्रत नहीं कर सकते हैं। इसके बाद व्यासजी ने कहा कि ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी का व्रत करो। इस एकादशी को निर्जला एकादशी कहा जाता है। इस व्रत में बिना जल ग्रहण किए भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। केवल स्नान और आचमन के लिए ही जल का प्रयोग किया जाता है। महर्षि व्यास ने बताया कि जो व्यक्ति निर्जला एकादशी का व्रत श्रद्धा से करता है, उसे पूरे साल की सभी एकादशियों के व्रत के समान फल प्राप्त होता है।
भीमसेन ने रखा निर्जला एकादशी व्रत
व्यासजी के कहने पर भीमसेन ने निर्जला एकादशी का व्रत करने का संकल्प लिया। उन्होंने पूरे विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा की और बिना जल ग्रहण किए व्रत पूरा किया। इसी वजह से यह एकादशी भीमसेनी एकादशी के नाम से भी प्रसिद्ध हुई। मान्यता है कि निर्जला एकादशी के दिन भगवान विष्णु का ध्यान करने, 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करने और दान-पुण्य करने से व्यक्ति को विशेष फल प्राप्त होता है।
निर्जला एकादशी व्रत का फल
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, निर्जला एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के पापों का नाश होता है और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। इस दिन जल से भरा हुआ कलश, वस्त्र, अन्न और जरूरतमंद लोगों को दान करने का विशेष महत्व बताया गया है। व्रत के अगले दिन यानी द्वादशी तिथि को स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए और ब्राह्मणों या जरूरतमंद लोगों को भोजन कराकर व्रत का पारण करना चाहिए। मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति के साथ निर्जला एकादशी व्रत कथा को सुनता या पढ़ता है, उसे भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
