न्यूज एजेंसी पीटीआई भाषा के मुताबिक वैज्ञानिकों और जलवायु शोधकर्ताओं के गैर-लाभकारी समूह, क्लाइमेट सेंट्रल, की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के प्रमुख कॉफी उत्पादक देशों में तापमान तेजी से बढ़ रहा है। ऊंचे तापमान और सूखे की स्थिति से कॉफी की पैदावार घट रही है। इसका सीधा असर किसानों की आमदनी और कॉफी की कीमतों पर पड़ रहा है।
दुनिया में सबसे ज्यादा कॉफी ब्राजील, वियतनाम, कोलंबिया, इथियोपिया और इंडोनेशिया में उगाई जाती है। ये देश वैश्विक कॉफी आपूर्ति का करीब 75 प्रतिशत हिस्सा देते हैं। लेकिन अब ये देश हर साल औसतन 144 दिन तक ऐसी गर्मी झेल रहे हैं जो कॉफी की फसल के लिए नुकसानदेह है।
क्लाइमेट सेंट्रल ने वर्ष 2021 से 2025 तक के तापमान का विश्लेषण किया और इसे एक ऐसे काल्पनिक दुनिया से तुलना की जहां कार्बन प्रदूषण नहीं होता। इस विश्लेषण में देखा गया कि जलवायु परिवर्तन के कारण अतिरिक्त गर्म दिनों की संख्या हर साल करीब 57 दिन ज्यादा हो गई है।
बढ़ता तापमान कॉफी पौधों की वृद्धि, फूल आने और फल के विकास को प्रभावित करता है। जब तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाता है, तो कॉफी के पौधों की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों घटते हैं। इस वजह से किसानों को कम पैदावार मिलती है।
सिर्फ गर्मी ही नहीं, बारिश के पैटर्न में बदलाव भी कॉफी के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं। अनियमित बारिश और सूखे की स्थिति से फसल कम हो सकती है। इसका सीधा असर किसानों की आय पर पड़ता है और उनके जीवन स्तर पर दबाव बढ़ता है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कम फसल और बढ़ती कीमतों का सबसे बड़ा असर छोटे किसानों पर पड़ता है। ये किसान अक्सर बड़े कॉफी निर्यातकों और ब्रांड्स के मुकाबले कमजोर होते हैं। उत्पादन घटने पर उनकी आमदनी कम हो जाती है और उनका रोजगार असुरक्षित हो जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव नहीं होता, तो गर्म दिनों की संख्या कम होती और फसल पर इतना दबाव नहीं पड़ता। इसके बावजूद, अगर वर्तमान तापमान और बारिश के रुझान जारी रहे, तो आने वाले वर्षों में कॉफी की वैश्विक आपूर्ति पर गंभीर संकट आ सकता है।