देश में गाय की 2 नई नस्लें तैयार, 10 महीने में देती है 3000 किलो दूध
Indian Two New Cow Breeds: भारत ने पशुपालन क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। देश ने गायों की दो नई कृत्रिम नस्लों का रजिस्ट्रेशन किया है, जो 10 महीने की अवधि में 3,000 किलोग्राम से अधिक दूध देने में सक्षम हैं। यह उत्पादन सामान्य देसी गायों की तुलना में कहीं अधिक है, क्योंकि देसी नस्लों से आमतौर पर 1,000 से 2,000 किलोग्राम दूध ही प्राप्त होता है। इस कदम से देश में दूध उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलेगी।
करन फ्राइज नस्ल की खासियत
रजिस्टर्ड की गई दो कृत्रिम गाय नस्लों में पहली है करन फ्राइज। इस नस्ल का विकास हरियाणा के करनाल स्थित राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई) ने किया है। करन फ्राइज गाय स्वदेशी थारपारकर गाय और विदेशी होल्स्टीन-फ्रिजियन सांड के संकरण से तैयार की गई है। यह नस्ल अधिक दूध देने के साथ-साथ भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल भी है।
वृंदावनी नस्ल का विकास
दूसरी कृत्रिम गाय की नस्ल वृंदावनी है, जिसे उत्तर प्रदेश के बरेली स्थित आईसीएआर–भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) ने विकसित किया है। यह नस्ल होल्स्टीन-फ्रिजियन, ब्राउन स्विस और जर्सी जैसी विदेशी नस्लों तथा स्वदेशी हरियाणा गाय के मिश्रण से बनी है। वृंदावनी नस्ल को उच्च दुग्ध उत्पादन और बेहतर स्वास्थ्य के लिए जाना जाता है।
रजिस्टर्ड पशुधन नस्लों की संख्या 246 हुई
इन दो नई नस्लों के रजिस्ट्रेशन के साथ ही भारत में रजिस्टर्ड पशुधन और कुक्कुट नस्लों की कुल संख्या बढ़कर 246 हो गई है। यह उपलब्धि भारतीय पशुधन अनुसंधान और संरक्षण के क्षेत्र में लगातार हो रहे प्रयासों को दर्शाती है। इससे देश की पशुधन विविधता को पहचान और संरक्षण दोनों मिल रहा है।
कार्यक्रम में 16 नई नस्लों को मिला प्रमाणपत्र
न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा के मुताबिक कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बुधवार को 16 नई पशुधन और कुक्कुट नस्लों के रजिस्ट्रेशन प्रमाणपत्र प्रदान किए। यह कार्यक्रम भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (आईसीएआर-एनबीएजीआर) द्वारा आयोजित किया गया था। इस अवसर पर वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की महत्वपूर्ण उपस्थिति रही।
स्वदेशी नस्लों के संरक्षण पर जोर
इस अवसर पर कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि भारत नई फसल किस्मों और पशु नस्लों के विकास पर ध्यान दे रहा है, लेकिन साथ ही स्वदेशी नस्लों के संरक्षण और संवर्धन को भी प्राथमिकता दे रहा है। उन्होंने कहा कि पशुधन और कुक्कुट क्षेत्र ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को हासिल करने में अहम भूमिका निभाएगा।
जलवायु परिवर्तन और आनुवंशिक संसाधन
आईसीएआर के महानिदेशक एम. एल. जाट ने जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए स्वदेशी नस्लों के संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए उपलब्ध आनुवंशिक संसाधनों को सुरक्षित रखना बेहद जरूरी है, क्योंकि स्वदेशी नस्लें बदलते मौसम में अधिक सहनशील होती हैं।
नई रजिस्टर्ड स्वदेशी नस्लें
नई रजिस्टर्ड 16 नस्लों में से 14 स्वदेशी हैं। इनमें झारखंड और उत्तर प्रदेश की मेदिनी और रोहिखंडी गायें, महाराष्ट्र की मेलघाटी भैंस, झारखंड और उत्तराखंड की पलामू और उदयपुरी बकरियां तथा नगालैंड की नगामी मिथुन शामिल हैं। इसके अलावा विभिन्न राज्यों की मुर्गी, बत्तख और हंस की नस्लों को भी लिस्ट में जोड़ा गया है। राजस्थान की कृत्रिम भेड़ नस्ल ‘अविषाण’ का भी रजिस्ट्रेशन किया गया है।
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