कैसे होते हैं पैसेंजर पैरेंट्स? क्यों बच्चों के लिए ऐसी परवरिश को खराब मानते हैं एक्सपर्ट्स

बच्चे की परवरिश बाहर से भले ही दो लोगों की जिम्मेदारी लगे, लेकिन कई घरों में माता पिता में से एख ही बच्चे की ज्यादातर जिम्मेदारी उठाता है। दूसरा पैरेंट घर में मौजूद तो रहता है, लेकिन फैसलों और रोजमर्रा की जिम्मेदारियों में उसकी भागीदारी बहुत कम होती है। ऐसी स्थिति बहुत आम हो चुकी है जिसे पैसेंजर पेरेंटिंग का नाम दिया जा रहा है।

Authored by: Suneet SinghUpdated Sep 5 2026, 10:03 IST
​क्या है Passenger Parenting?​Image Credit : IStock01 / 07

​क्या है Passenger Parenting?​

‘पैसेंजर पैरेंट’ माता-पिता में से उसे कहा जाता है जो बच्चे की जिंदगी में मौजूद तो है, लेकिन परवरिश की जिम्मेदारियों में सक्रिय भूमिका नहीं निभाता। आसान शब्दों में समझें तो एक पैरेंट बच्चों की परवरिश की गाड़ी चला रहा होता है और दूसरा उसमें सिर्फ पैसेंजेर की तरह बैठा रहता है।

​कैसे बनती है ये स्थिति​Image Credit : IStock02 / 07

​कैसे बनती है ये स्थिति​

परिवार इस बदलाव को तुरंत पहचान नहीं पाता। शुरुआत में एक पैरेंट जरूरत या आदत के चलते थोड़ा ज्यादा काम संभालता है। धीरे-धीरे यही व्यवस्था सामान्य लगने लगती है और जिम्मेदारियों का अंतर बढ़ता जाता है। कुछ समय बाद दोनों को महसूस होता है कि वे साथ रहते हुए भी बच्चे की परवरिश अलग-अलग कर रहे हैं।

​रिश्ते में बढ़ने लगती है नाराजगी​Image Credit : IStock03 / 07

​रिश्ते में बढ़ने लगती है नाराजगी​

ज्यादा जिम्मेदारी उठाने वाला पैरेंट थकान और नाराजगी महसूस कता है, जबकि दूसरा पैरेंट यह समझ ही नहीं पाता कि समस्या कितनी बड़ी हो चुकी है। बातचीत भी धीरे-धीरे सिर्फ जरूरतों और कामों तक सीमित हो सकती है

​बच्चे भी सब समझते हैं​Image Credit : IStock04 / 07

​बच्चे भी सब समझते हैं​

बच्चे भले ही अपनी भावनाओं को हमेशा शब्दों में न कह पाएं, लेकिन घर के माहौल को अच्छी तरह महसूस करते हैं। वे यह नोटिस करते हैं कि बीमारी, डर या परेशानी के समय उनके साथ कौन खड़ा होता है। इससे बच्चे का एक पैरेंट के साथ ज्यादा भावनात्मक जुड़ाव हो सकता है, जबकि दूसरे के साथ दूरी बढ़ सकती है।

​अच्छे पैरेंट बनने के लिए पहला कदम​Image Credit : IStock05 / 07

​अच्छे पैरेंट बनने के लिए पहला कदम​

कम शामिल रहने वाले पैरेंट को यह सोचने की जरूरत नहीं कि उसे बच्चों की परवरिश की हर बात पहले से पता होनी चाहिए। शुरुआत मौजूद रहने से होनी चाहिए। स्कूल छोड़ने जाना, रात में कहानी पढ़ना, खाने की योजना बनाना या बच्चे के साथ बैठकर उसका खेल देखना जैसे छोटे काम जिम्मेदारी साझा करने की शुरुआत हो सकते हैं।

​सिर्फ काम नहीं, बच्चे के साथ समय भी जरूरी​Image Credit : IStock06 / 07

​सिर्फ काम नहीं, बच्चे के साथ समय भी जरूरी​

को पैरेंटिंग का मतलब केवल घर के काम बांट लेना नहीं है। बच्चे के साथ बिना किसी खास मकसद के समय बिताना भी उतना ही जरूरी है। उसके साथ खेलना, उसकी बातें सुनना, उसके रोने या परेशान होने पर पास बैठना रिश्ते में भरोसा पैदा करता है। शुरुआत में बच्चा या दूसरा पैरेंट बदलाव को लेकर असहज हो सकता है, लेकिन लगातार कोशिश धीरे-धीरे फर्क ला सकती है।

​‘मदद’ नहीं, अपनी जिम्मेदारी समझें​Image Credit : IStock07 / 07

​‘मदद’ नहीं, अपनी जिम्मेदारी समझें​

सबसे जरूरी बात यह है कि बच्चे की परवरिश में योगदान को पार्टनर की मदद के तौर पर न देखा जाए। यह दोनों माता-पिता की साझा जिम्मेदारी है।

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