‘पैसेंजर पैरेंट’ माता-पिता में से उसे कहा जाता है जो बच्चे की जिंदगी में मौजूद तो है, लेकिन परवरिश की जिम्मेदारियों में सक्रिय भूमिका नहीं निभाता। आसान शब्दों में समझें तो एक पैरेंट बच्चों की परवरिश की गाड़ी चला रहा होता है और दूसरा उसमें सिर्फ पैसेंजेर की तरह बैठा रहता है।
परिवार इस बदलाव को तुरंत पहचान नहीं पाता। शुरुआत में एक पैरेंट जरूरत या आदत के चलते थोड़ा ज्यादा काम संभालता है। धीरे-धीरे यही व्यवस्था सामान्य लगने लगती है और जिम्मेदारियों का अंतर बढ़ता जाता है। कुछ समय बाद दोनों को महसूस होता है कि वे साथ रहते हुए भी बच्चे की परवरिश अलग-अलग कर रहे हैं।
ज्यादा जिम्मेदारी उठाने वाला पैरेंट थकान और नाराजगी महसूस कता है, जबकि दूसरा पैरेंट यह समझ ही नहीं पाता कि समस्या कितनी बड़ी हो चुकी है। बातचीत भी धीरे-धीरे सिर्फ जरूरतों और कामों तक सीमित हो सकती है
बच्चे भले ही अपनी भावनाओं को हमेशा शब्दों में न कह पाएं, लेकिन घर के माहौल को अच्छी तरह महसूस करते हैं। वे यह नोटिस करते हैं कि बीमारी, डर या परेशानी के समय उनके साथ कौन खड़ा होता है। इससे बच्चे का एक पैरेंट के साथ ज्यादा भावनात्मक जुड़ाव हो सकता है, जबकि दूसरे के साथ दूरी बढ़ सकती है।
कम शामिल रहने वाले पैरेंट को यह सोचने की जरूरत नहीं कि उसे बच्चों की परवरिश की हर बात पहले से पता होनी चाहिए। शुरुआत मौजूद रहने से होनी चाहिए। स्कूल छोड़ने जाना, रात में कहानी पढ़ना, खाने की योजना बनाना या बच्चे के साथ बैठकर उसका खेल देखना जैसे छोटे काम जिम्मेदारी साझा करने की शुरुआत हो सकते हैं।
को पैरेंटिंग का मतलब केवल घर के काम बांट लेना नहीं है। बच्चे के साथ बिना किसी खास मकसद के समय बिताना भी उतना ही जरूरी है। उसके साथ खेलना, उसकी बातें सुनना, उसके रोने या परेशान होने पर पास बैठना रिश्ते में भरोसा पैदा करता है। शुरुआत में बच्चा या दूसरा पैरेंट बदलाव को लेकर असहज हो सकता है, लेकिन लगातार कोशिश धीरे-धीरे फर्क ला सकती है।
सबसे जरूरी बात यह है कि बच्चे की परवरिश में योगदान को पार्टनर की मदद के तौर पर न देखा जाए। यह दोनों माता-पिता की साझा जिम्मेदारी है।